US Passport Vs India Love : ‘हिंदुस्तानी बनकर ही मरना चाहती हूं’, भारत लौटने को महिला ने US पासपोर्ट ठुकराया, दिल छू लेगा वीडियो


आजकल जहां डॉलर कमाने और अमेरिका-कनाडा भागने की अंधी होड़ मची है, वहीं 94 साल की एक दादी ने देशप्रेम की दिल छू लेने वली मिसाल दी है. आंध्र प्रदेश की रहने वाली कोंड्रगुंटा महालक्ष्मम्मा ने अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर अमेरिका के आलीशान ऐशो-आराम और वहां के तगड़े पासपोर्ट को लात मार दी है. उनका एक बेहद भावुक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें वे सिर्फ ‘हिंदुस्तानी’ बनकर मरने की जिद कर रही हैं. पति की मौत के बाद डॉक्टर बेटा उन्हें अमेरिका ले गया था पर दो दशक बाद भी उनका मन अपने गांव की गलियों के लिए छटपटता है.

भारत की मिट्टी के लिए ठुकरा दिया US पासपोर्ट

आंध्र प्रदेश के बापटला जिले में एक ऐसा वाकया हुआ है, जो हर हिंदुस्तानी का दिल छू लेगा. विदेश जाना, वहां का ग्रीन कार्ड हासिल करना या वहां की नागरिकता पाना कामयाबी का पैमाना माना जाता है. लोग इसके लिए अपनी जमीन, अपना घर तक छोड़ देते हैं. लेकिन आंध्र प्रदेश की रहने वाली एक 94 साल की बुजुर्ग महिला ने इस पूरी सोच को एक झटके में पलट कर रख दिया है. अपनी ढलती उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर उन्होंने अमेरिकी नागरिकता और वहां के आलीशान ऐशो-आराम को ठुकरा दिया है. उन्होंने ऐसा सिर्फ इसलिए किया ताकि वे अपने वतन में आखिरी सांस ले सकें. उनका मानना है कि चाहे इंसान दुनिया के किसी भी अमीर कोने में क्यों न रह ले, लेकिन जो सुकून अपने देश की मिट्टी और अपनी जड़ों में मिलता है, वो दुनिया के किसी और हिस्से में कभी नहीं मिल सकता.

भारतीय अधिकारियों के सामने कही दिल की बात

94 वर्षीय बुजुर्ग महिला कोंड्रगुंटा महालक्ष्मम्मा ने खुद भारत सरकार से ये गुहार लगाई है कि उनकी भारतीय नागरिकता को वापस बहाल किया जाए. जब बापटला के जिला कलेक्टर विनोद कुमार के सामने इस मामले की फाइल खुली और खुद बुजुर्ग महिला वहां पहुंचीं तो वहां का नजारा देखने लायक था. वहां मौजूद हर छोटे-बड़े सरकारी अधिकारी महालक्ष्मम्मा की देशभक्ति की तारीफें करते दिख रहे थे. बुजुर्ग महिला ने अधिकारियों से कहा कि वे अपने जीवन के अंतिम दिनों में किसी विदेशी नागरिक के ठप्पे के साथ नहीं जीना चाहती हैं. उनकी बस एक ही जिद है कि वो एक सच्ची ‘हिंदुस्तानी’ के रूप में अपनी जिंदगी के बचे हुए दिन गुजारें और जब उनका अंतिम समय आए तो उनका अंतिम संस्कार भी भारतीय मिट्टी पर हिंदू रीति-रिवाजों के साथ किया जाए.

पति की मौत के बाद गई थीं सात समंदर पार

महालक्ष्मम्मा मूल रूप से चिनागंजम मंडल के चिंतगुमपला गांव की रहने वाली हैं. उनका जीवन अपने गांव में बेहद सादगी से बीत रहा था, लेकिन जिंदगी के एक मोड़ पर उनके पति नागभूषणम का साथ हमेशा के लिए छूट गया. पति की मौत के बाद वे गांव में काफी अकेली पड़ गई थीं, जिसके बाद उनके बेटे डॉ. के. बुचैया चौधरी उन्हें संभालते हुए अपने साथ अमेरिका ले गए. उनके बेटे अमेरिका में एक बेहद प्रतिष्ठित और जाने-माने कैंसर एक्सपर्ट हैं. बेटे के साथ अमेरिका में रहते हुए महालक्ष्मम्मा को जुलाई 2000 में आधिकारिक रूप से अमेरिका की नागरिकता भी मिल गई थी. अमेरिका में उनके पास हर वो चीज मौजूद थी जिसकी कोई भी इंसान कल्पना करता है, खूब पैसा, समाज में रुतबा, आधुनिक सुख-सुविधाएं और पूरे परिवार का साथ लेकिन इन सब के बीच भी महालक्ष्मम्मा का दिल हमेशा अपने छोटे से गांव की गलियों और अपनी मातृभूमि के लिए ही धड़कता रहा.

दो दशक का आलीशान सफर छोड़ लौटी वतन

अमेरिका में करीब दो दशक यानी पूरे 20 साल तक शानदार और आलीशान जिंदगी गुजारने के बाद भी महालक्ष्मम्मा का मन वहां नहीं लगा. आखिरकार, साल 2018 में उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया और भारत लौटने की ठान ली. वे वापस आकर अपने उसी पुराने पैतृक गांव में बेहद सादगी से रहने लगीं. भारत लौटने के बाद से ही उनके मन में एक बात लगातार चुभ रही थी कि उनके हाथों में अमेरिकी पासपोर्ट है और वो तकनीकी रूप से अपने ही देश में एक विदेशी नागरिक बनकर रह रही हैं. वो अपने देश में टूरिस्ट या विदेशी पहचान पत्र के साथ नहीं रहना चाहती थीं. इसी वजह से उन्होंने खुद आगे बढ़कर अपनी अमेरिकी नागरिकता को स्वेच्छा से छोड़ने का ऐतिहासिक फैसला किया और दोबारा से भारतीय नागरिकता हासिल करने के लिए ऑनलाइन आवेदन डाल दिया.

तेलुगु भाषा में ली भारत मां के प्रति निष्ठा की शपथ

महालक्ष्मम्मा की उम्र 94 साल हो चुकी है, इसलिए जिला प्रशासन के अफसरों ने उनके आराम का पूरा ख्याल रखा. उन्होंने दादी के लिए खास तौर पर उनकी अपनी मातृभाषा तेलुगु में देश के प्रति वफादारी की शपथ का एक बड़ा सा प्रिंटआउट तैयार करवाया था, ताकि उन्हें पढ़ने और समझने में कोई दिक्कत न हो.

बहुत ज्यादा उम्र होने के कारण महालक्ष्मम्मा को चलने-फिरने और ठीक से पढ़ने में दिक्कत आ रही थी, ऐसे में उनके डॉक्टर बेटे ने शपथ पत्र को जोर से पढ़ने में अपनी बुजुर्ग मां की पूरी मदद की. अधिकारियों और जिला कलेक्टर की मौजूदगी में महालक्ष्मम्मा ने भारत के संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा और अटूट वफादारी रखने की कसम खाई. उन्होंने पूरी गंभीरता से संकल्प लिया कि वे एक भारतीय नागरिक के तौर पर अपने सारे कर्तव्यों को पूरी तरह निभाएंगी.

शपथ लेने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, जिला प्रशासन के कर्मचारियों ने कानूनी दस्तावेजों की पूरी जांच की. उन्होंने बुजुर्ग महिला को बहुत ही आराम से संभालते हुए दस्तावेजों पर तय जगहों पर उनके हस्ताक्षर करवाए. इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट और कलेक्टर साहब की उपस्थिति में एक अधिकारी ने अंग्रेजी में ये घोषणा की कि निष्ठा की शपथ लेने की यह कानूनी प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हो चुकी है.



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