भारत में क्यों आ रहा है ‘टूरिज्म बम’? क्‍या है 38 बिलियन डॉलर की ओर बढ़ रही इस इंडस्ट्री का पूरा सच


एक दौर था जब भारत में घूमने का मतलब सिर्फ दो ही चीजें होती थीं. या तो पूरा परिवार लेकर किसी तीर्थ स्थान जैसे तिरुपति या वैष्णो देवी की यात्रा पर न‍िकलते थे. या फिर किसी गोवा के बीच और मनाली की पहाड़‍ियों पर छुट्टियां मनाने चले जाते थे. अगर विदेशी टूर‍िस्‍टों की बात करें तो उनके ल‍िए भारत का मतलब सिर्फ ताजमहल या राजस्थान के क‍िले रेग‍िस्‍तान ही हुआ करता था. टूरिज्म तब भी था, लेकिन आज कहानी बदल चुकी है.

जिस भारतीय पर्यटन को कभी ‘अनछुई संभावना’ कहा जाता था, वह आज एक सुपरहिट ब्लॉकबस्टर बन चुका है. फर्स्‍टपोस्‍ट की एक र‍िपोर्ट की मानें तो साल 2024 में भारत का ट्रेवल और टूरिज्म मार्केट 22 बिलियन डॉलर यानी करीब 1.8 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का हो चुका है और 2033 तक इसके 38 बिलियन डॉलर यानी लगभग ₹3.49 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है. पर द‍िलचस्‍प है कि धार्मिक यात्राओं वाला देश धीरे-धीरे अब ‘एक्सपीरियंस टूरिज्म’ का ग्लोबल हब बनता जा रहा है.

ज‍ितनी बड़ी ये इंडस्‍ट्री हो रही है, क्‍या हम इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के तौर पर इसके ल‍िए तैयार हैं? (PTI Photo)

विदेशी नहीं, देसी टूर‍िस्‍ट बदल रहे हैं तस्‍वीर
भारत के टूरिज्म बूम का सबसे बड़ा कारण विदेशी पर्यटक नहीं, बल्कि खुद भारतीय हैं. 2019 से 2023 के बीच, भारतीयों ने देश के भीतर घूमने में विदेशियों से कहीं ज्यादा पैसा खर्च किया है. अब चाहे इसे रील्‍स में ट्रेवल की महिमा पर म‍िलने वाले ज्ञान का असर मानें या फिर कोरोना में घरों में फंसने वाले लोगों का घूमने का दृढ़ न‍िश्‍चय. पर अब लोकल ट्रेवल में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है. इसके पीछे तीन बड़ी वजहें हैं. मिडिल क्लास अब अब घूमने के लिए ‘एक्स्ट्रा बजट’ तैयार कर रहा है. अब ट्रैवल की प्‍लान‍िंग और उसकी बुकिंग काफी आसान हो गई है. मोबाइल पर दो टैप करते ही फ्लाइट और होटल बुक हो जाते हैं. तीसरा कारण कहा जा सकता है इंस्टाग्राम इफेक्ट. अब लोग सिर्फ मशहूर जगहों पर नहीं जाते. इंस्टाग्राम की एक रील किसी गुमनाम झरने या पहाड़ी गांव को रातों-रात ‘बकेट लिस्ट’ डेस्टिनेशन बना देती है.

कुल्‍लू में बर्फबारी की खूबसूरत तस्‍वीरें. (फोटो साभार PTI)

इन्फ्रास्ट्रक्चर ने बदली रफ्तार
2025 के कुछ दिनों में भारतीय एयरलाइंस ने एक ही दिन में 5 लाख से ज्यादा घरेलू यात्रियों को सफर कराया. यह कोई छोटी बात नहीं है. अब टियर-2 और टियर-3 शहरों (जैसे इंदौर, लखनऊ, रांची) से सीधे फ्लाइट्स मिल रही हैं. नए एक्सप्रेस-वे और वंदे भारत जैसी ट्रेनों ने रात भर के सफर को कुछ घंटों का बना दिया है. अब ‘वीकेंड ट्रिप’ प्लान करना पहले से कहीं ज्यादा आसान है.

‘गोल्डन ट्रायंगल’ से आगे निकली दुनिया
पहले विदेशी सैलानी सिर्फ दिल्ली-आगरा-जयपुर (गोल्डन ट्रायंगल) या केरल और गोवा तक सिमटे रहते थे. लेकिन अब उत्तर प्रदेश (अयोध्या और वाराणसी की वजह से) और तमिलनाडु टूरिज्म के नए दिग्गज बनकर उभरे हैं. यहां तक कि केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम भी अब ग्लोबल मैप पर टॉप चॉइस बन रही है.

आज का टूरिज्म सिर्फ फोटो खिंचवाने तक सीमित नहीं है. अब लोग ‘महसूस’ करना चाहते हैं. जंगल सफारी और पुराने किलों में रुकने का क्रेज बढ़ रहा है. यही वजह है कि ‘डार्क टूरिज्म’ का क्रेज भी लगातार बढ़ रहा है. लोग अब जलियांवाला बाग, सेलुलर जेल (काला पानी) या यूनियन कार्बाइड प्लांट (भोपाल) जैसी जगहों पर जाकर इतिहास और त्रासदियों को समझना चाहते हैं. इतना ही नहीं, अब धार्मिक पर्यटन का भी रूप बदल गया है. अब तीर्थस्थलों पर भी 5-स्टार होटल खुल रहे हैं और महीनों पहले ही ‘हेलीकॉप्टर यात्रा’ बुक हो जाती है.

गोवा में 25 द‍िसंबर को यूं जमा हुई भीड़. (PTI Photo)

आंकड़ों की बात करें तो टूरिज्म सेक्टर भारत की जीडीपी में 6 से 10% का योगदान देता है. अगले दशक में यह आंकड़ा दोगुना होने की उम्मीद है. इसी पोटेंशियल को देखते हुए मैरियट और हिल्टन जैसे बड़े ग्लोबल होटल ग्रुप्स भारत के छोटे शहरों में तेजी से अपने होटल खोल रहे हैं. हालांकि पिछले कुछ द‍िनों में मनाली, लद्दाख जैसे पहाड़ी इलाकों से जो तस्‍वीरें आई हैं, वो इस ट्रेंड की परेशान‍ियां भी सामने रख रही हैं. बड़ा सवाल है कि ज‍ितनी बड़ी ये इंडस्‍ट्री हो रही है, क्‍या हम इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के तौर पर इसके ल‍िए तैयार हैं? क्या हम पर्यटन के ल‍िए आती इस भीड़ के लिए तैयार हैं?

ओवरक्राउडिंग एक ऐसी समस्‍या है, ज‍िनसे कई इलाके जूझ रहे हैं. ट्रैफिक जाम और भरे हुए होटलों की तस्‍वीरें हर क‍िसी को डरा रही हैं. मशहूर जगहों पर पैर रखने की जगह नहीं बची है. वहीं विदेशी सैलानियों के लिए आज प्रदूषण और सुरक्षा एक बड़ी चिंता है. अब कई अलग-अलग जगह लोग जा रहे हैं पर व‍िकास की गति हर जगह एक जैसी नहीं है. कहीं बहुत ज्यादा सुविधाएं हैं, तो कहीं बुनियादी ढांचे का भी अभाव है.



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