Explained: 3000 बैलस्टिक मिसाइलों के बावजूद, US-इज़राइल को नहीं रोक पाया ईरान


मध्य पूर्व में ईरान के पास अलग अलग मिसाइलों का सबसे बड़ा भंडार है, बावजूद इसके ईरान अमेरिका, इजराइल को डराने, रोकने में ना कामयाब रहा. Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) की प्रोपगंडा वीडियो में बार-बार लंबी दूरी की मिसाइलों और भूमिगत ठिकानों को दिखाया जाता रहा है, लेकिन असली टकराव के समय यह शक्ति प्रदर्शन, किसी भी सैन्य बढ़त में पूरी तरह तब्दील नहीं हुआ. ज़मीन पर ठोस सामरिक उपलब्धि के बजाय यह ताकत अधिकतर प्रचार तक सीमित रह गई.

3,000 मिसाइ: प्रोपगंडा 100%, लक्ष्य 0%
2022 में United States Central Command के जनरल Kenneth McKenzie ने कहा था कि ईरान के पास 3,000 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें हैं. जून 2025 में Israel के साथ हुए छोटे युद्ध और 2024 में दो बार हुई मिसाइल झड़पों के दौरान ईरान ने सैकड़ों मिसाइलें दागीं थी. जवाब में इज़राइल ने ईरान के मिसाइल गोदाम, लॉन्चर और बनाने वाली जगहों पर हमले किए. 2025 के जून में 12 दिन चले युद्ध के अंत तक ईरान के पास करीब 1,500 मिसाइलें और 200 लॉन्चर थे.

ईरान, अली हुसैनी खामेनेई हमेशा से US के खिलाफ एक Strategic Counter तैयार करना चाहते थे, उसे अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) का विकास ही आगे बढ़ा सकता था. ईरान का अंतरिक्ष कार्यक्रम भी इसमें मददगार था, क्योंकि रॉकेट से सैटेलाइट लॉन्च करने वाली तकनीक और ICBM की तकनीक काफी हद तक मिली-जुली होती है. 2008 से ईरान ने Safir और Simorgh जैसे दो-स्टेज रॉकेट लॉन्च परीक्षण किए. इनका इस्तेमाल लंबी दूरी की मिसाइल तकनीक को परखने के लिए भी किया जा सकता है.

ईरान ने Qiam-1 और Fateh-110 जैसी छोटी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें विकसित की हैं. उसने Shahab-3 की रेंज बढ़ाने का भी दावा किया है और ठोस ईंधन वाली Sejjil मिसाइल तैनात करने की बात कही है. 2015 में ईरान ने Emad-1 के परीक्षण की जानकारी दी, जिसे वह ज्यादा सटीक लंबी दूरी की मिसाइल बताता है. बाद में उसने Khorramshahr-2 को भी पेश किया, जिसे उसकी सबसे घातक लंबी दूरी की मिसाइल बताया गया. इसके अलावा, ईरान जमीन से दागी जाने वाली क्रूज़ मिसाइल (LACM) भी विकसित कर रहा था, जो दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमला करने के लिए बनाई जाती है.

1. ईरान का मिसाइल ‘किल-चेन’ अधूरा
हथियारों का बड़ा भंडार होना और उन्हें प्रभावी तरीके से इस्तेमाल करना, दो अलग स्तर की क्षमता हैं. बैलिस्टिक मिसाइल संचालन केवल लॉन्च क्षमता नहीं, बल्कि पूरे ‘किल-चेन’ (Kill Chain) की विश्वसनीयता पर निर्भर करता है. यानी लक्ष्य की पहचान (ISR), रियल-टाइम इंटेलिजेंस, सटीक लक्ष्य निर्धारण, सुरक्षित कमांड-एंड-कंट्रोल, सैटेलाइट/नेविगेशन सपोर्ट, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर कवर और बैटल-डैमेज असेसमेंट. यदि इन कड़ियों में समन्वय कमजोर हो, तो मिसाइलों की संख्या रणनीतिक परिणाम में तब्दील नहीं हो पाती.

ईरान, Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) इस समन्वित ढांचे को निर्णायक बढ़त में बदलने में संघर्ष करता दिखा. मिसाइलें रिहायशी व सैन्य इलाकों की दिशा में दागी गईं, लेकिन रणनीतिक प्रभाव (deterrence by punishment या deterrence by denial) न के बराबर हासिल हुआ. Iran की मिसाइलों और ड्रोन हमलों ने खाड़ी क्षेत्र में एयरपोर्ट, लग्ज़री होटल और अन्य नागरिक ठिकानों को निशाना बनाया है. हमले बहरीन, इराक, जॉर्डन, कुवैत, क़तर, सऊदी अरब, UAE पर किये गए. इन हमलों के बाद खाड़ी देशों में तीखी नाराज़गी है, सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने की बात कही.

इसे “अंधेरे में तीर” चलना कहते हैं क्योंकि लक्ष्य-चयन की प्राथमिकता और अपेक्षित सैन्य परिणाम के बीच स्पष्ट संबंध दिखाई नहीं दिया. ऐतिहासिक संदर्भ में इसकी तुलना जर्मनी के V-2 rocket अभियानों से की जाती है, जो London सहित ब्रिटेन के शहरों पर गिरे. वे तकनीकी रूप से उन्नत थे, पर निर्णायक सैन्य परिणाम के बजाय अधिकतर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने वाले थे. इसी तरह, यदि मिसाइल हमले विरोधी की कमांड, वायु-शक्ति या लॉजिस्टिक लाइनों को ठोस नुकसान नहीं पहुँचाते, तो वे सिग्नल तो करते हैं, पर निर्णायक बढ़त नहीं दिलाते. प्रश्न मिसाइलों की संख्या का नहीं, बल्कि नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर, सटीकता (CEP), सर्वाइवेबिलिटी, और एस्केलेशन-मैनेजमेंट का है.

2. एयरक्राफ्ट कैरियर पर गलत हथियार का इस्तेमाल
गौर से समझें तो आपको पता चलेगा कि ईरान, Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC), मिसाइल क्षमता को गलत तरीके से इस्तेमाल कर रहा है. गलत मिसाइल का गलत टारगेट पर इस्तेमाल. IRGC के अनुसार, उसने अमेरिकी विमानवाहक पोत USS Abraham Lincoln को चार बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाया. ऑपरेशन “ट्रू प्रॉमिस 4” (Operation True Promise 4) के संबंध में जारी घोषणा में IRGC ने दावा किया. हांलाकि US सेंट्रल कमांड ने इसे सिरे से खरिज कर दिया है, ‘लिंकन को कोई चोट नहीं लगी, लॉन्च की गई मिसाइलें पास भी नहीं आईं’.

बैलिस्टिक मिसाइल आम तौर पर परमाणु मिसाइल ले जाने के लिए बनी होती हैं. दूसरा उदाहरण देखें तो यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) अपनी मिसाइल क्षमता का सामरिक दृष्टि से सही उपयोग कर रहा है? “गलत मिसाइल का गलत लक्ष्य” पर इस्तेमाल रणनीतिक दक्षता पर प्रश्न खड़े करता है. पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलें मूल रूप से लंबी दूरी पर हाई-विस्फोटक या सामरिक (कुछ मामलों में परमाणु) वारहेड ले जाने के लिए विकसित की जाती हैं. उनका उपयोग आम तौर पर बड़े स्थिर ठिकानों, जैसे एयरबेस, सैन्य ढांचे या रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाने के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है.

समुद्र में लगातार गतिशील लक्ष्य, विशेषकर विमानवाहक पोत जैसे हाई-सुरक्षा और मल्टी-लेयर रक्षा वाले प्लेटफॉर्म, को निशाना बनाना तकनीकी रूप से कहीं अधिक जटिल है और इसके लिए अत्यंत सटीक रियल-टाइम ट्रैकिंग, गाइडेंस और नेटवर्क-सेंट्रिक सपोर्ट की आवश्यकता होती है. कोई भी देश समुद्र में चल रहे लक्ष्य जैसे USS Abraham Lincoln को निशाना बनाने के लिए आम तौर पर एंटी-शिप मिसाइल का इस्तेमाल करेगा, खासकर sea-skimming cruise missiles. ये मिसाइलें समुद्र की सतह से बेहद कम ऊँचाई पर उड़ती हैं, रडार से बचती हैं और अंतिम चरण में लक्ष्य को सटीक तरीके से हिट करने के लिए एक्टिव रडार/इन्फ्रारेड गाइडेंस का इस्तेमाल करती हैं.

इसके विपरीत, पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइल ऊँची बैलिस्टिक ट्रैजेक्टरी (ऊपर जाकर गिरने वाली) पर उड़ती है. समुद्र में तेज़ी से आगे बढ़ रहे और बहु-स्तरीय वायु-रक्षा से लैस विमानवाहक पोत पर इनका प्रभावी उपयोग तकनीकी रूप से कहीं अधिक जटिल है. अगर इस दावे को देखें तो ईरान मनोवैज्ञानिक रूप से कमज़ोर पड़ चुका है, शक्ति-प्रदर्शन (power projection) की हड़बड़ी में गलत हथियार का इस्तेमाल कर रहा है.

3. मनोवैज्ञानिक रूप से कमज़ोर, मरता क्या न करता?
क्या मनोवैज्ञानिक दबाव में फंसा तेहरान ‘मरता क्या न करता’ वाली स्थिति में पहुंच चुका है? 28 फरवरी और 1 मार्च के हमलों में केवल एक-दो ठिकाने नहीं, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र में फैले रणनीतिक और नागरिक लक्ष्य निशाने पर लिए गए. जहां तहां मिसाइल दाग रहा है ईरान, इराक में एरबिल के पास इंटरसेप्शन, कुवैत के अली अल-सलेम एयरबेस को नुकसान, क़तर के अल उदीद एयरबेस को टार्गेट किया जाना, बहरीन की राजधानी मनामा में हमलों की आवाज़, यूएई में दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास विस्फोट और ओमान के बंदरगाहों पर ड्रोन हमले—ये सब दर्शाते हैं कि दायरा क्षेत्रीय था. सऊदी अरब में रियाद के पास धमाकों की रिपोर्ट और अमेरिकी पांचवें बेड़े (US Navy 5th Fleet) के मुख्यालय को निशाना बनाए जाने का दावा भी है.

यह पैटर्न बताता है कि हमले केवल सैन्य संतुलन बदलने के लिए नहीं, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र में असुरक्षा का माहौल बनाने के लिए थे. नागरिक ढांचे, एयरपोर्ट, होटल, पोर्ट और सैन्य अड्डों को साथ-साथ टार्गेट करना “एरिया-वाइड सिग्नलिंग” की रणनीति दिखाता है. कुल मिलकर ईरान की 3000 मिसाइल के ज़खीरे का फ़ोर्स प्रोजेक्शन 100% और अचीवमेंट 0% रहा.



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