अयातुल्ला खामनेई की हत्या करना अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार गलत है या सही


अमेरिका और इजरायल को जैसे ही पता लगा कि ईरान के सर्वोच्च धार्मिक गुरु अयातुल्ला अली खामनेई तेहरान में एक हाईलेवल मीटिंग करने वाले हैं. इसकी जगह की जानकारी उन्हें सीआईए के जासूस दे चुके थे. जैसे ही सब वहां इकट्ठे हुए तो इजरायल ने बगैर एक भी मिनट गंवाएं मिसाइल ठीक वहीं दागी. और खामनेई की मृत्यु हो गई. इस अचानक हमले के साथ अमेरिका-इजरायल ने ईरान के खिलाफ युद्ध की शुरुआत की. खामनेई को मारे जाने की प्रतिक्रिया दुनिया में अलग अलग तरह से हो रही है. कुछ लोग इसे एक देश द्वारा दूसरे देश के राष्ट्रप्रमुख की जानबूझकर की गई हत्या मानते हुए आरोप लगा रहे हैं. इस पर कानूनी सवाल उठा रहे हैं. ये सवाल उठ रहा है कि कैसे एक देश दूसरे देश के राष्ट्रप्रमुख की इस तरह हत्या कर सकता है.

न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस पर एक विश्लेषण छापा है. चूंकि अमेरिकी कांग्रेस या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से इस हमले को मंजूरी नहीं दी थी तो इस पूरे हमले और अयातुल्ला की हत्या को गैरकानूनी और गलत माना जा रहा है. किसी देश द्वारा जानबूझकर और खुलेआम किसी अन्य संप्रभु राष्ट्र के नेता की हत्या करना अत्यंत दुर्लभ घटना है – ऐसा तो कानूनी तौर पर और युद्ध के दौरान भी नहीं होता. इसलिए ऐसा करने पर सही या गलत को लेकर शायद ही सवाल उठा हो. एक दुर्लभ उदाहरण मार्च 2003 में देखने को मिला था, जब बुश प्रशासन ने इराक युद्ध की शुरुआत से ठीक पहले सद्दाम हुसैन को मारने की कोशिश की लेकिन इसे अमेरिकी कांग्रेस ने हरी झंडी दे दी थी. तब सद्दाम पर हवाई हमला हुआ लेकिन वो अपने टारगेट से चूक गया.

व्हाइट हाउस ने एक बयान में कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने कमांडर इन चीफ के रूप में अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल किया है. इसके पीछे ईरान द्वारा दशकों से की जा रही गतिविधियों का तर्क दिया गया. लेकिन इस पूरे बयान में खामनेई की हत्या का उल्लेख तक नहीं किया गया.

क्या हुआ?

ट्रंप के नेतृत्व में संयुक्त राज्य अमेरिका और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व में इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ संयुक्त रूप से युद्ध शुरू किया, जिसमें ईरानी नेतृत्व पर अचानक हमला किया गया, जिसमें कट्टरपंथी शिया धर्मगुरु और करीब चार दशकों तक ईरान के शासक रहे अयातुल्ला खामेनेई मारे गए.

अधिकारियों के मुताबिक, सीआईए उनकी गतिविधियों पर नज़र रख रही थी. उसने खामनेई के ठिकाने की जानकारी इज़राइल को दे दी, जिसके बाद इज़राइल ने उस पर मिसाइल से हमला किया, जिसमें वह मारे गए. अयातुल्ला खामनेई ईरान के सशस्त्र बलों के सर्वोच्च नेता थे. ठीक वैसे ही जैसे ट्रंप अमेरिकी सेना के कमांडर इन चीफ भी हैं. ये स्थिति जटिलता पैदा करती है.

किसे टारगेट नहीं बनाया जाता

ये तो खैर दीगर है कि युद्धकाल में किसी देश के सैन्य कमांडर के वैध लक्ष्य होते हैं लेकिन ये भी माना जाता रहा है कि यु्द्ध में राष्ट्रप्रमुख और स्वास्थ्य मंत्री को टारगेट नहीं बनाया जाएगा, जब तक कि वे प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में भाग न ले रहे हों.

कानून एक्सपर्ट इसे सही ठहराते हैं. बकौल उनके, बेशक किसी सैन्य बल का नेतृत्व करने वाले नागरिक नेता की स्थिति अधिक जटिल होती है. फिर भी सशस्त्र संघर्ष के कानूनों के तहत, सैन्य बलों को नियंत्रित करने वाला नागरिक नेता को सक्रिय युद्ध में वैध तो टारगेट किया जा सकता है. उसे अपने देश के सशस्त्र बलों का हिस्सा भी माना जाएगा और सीधे तौर पर युद्ध में सक्रिय तौर पर हिस्सा लेने वाले नागरिक के रूप में भी.

हवाई हमले में महमूद अहमदीनेजाद की भी मौत हो गई है, जिन्होंने 2005 से 2013 तक ईरान के राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया. वो तो सीधे तौर पर यु्द्ध या शत्रुतापूर्ण कार्रवाई में शामिल नहीं थे. लिहाजा किस आधार पर उन्हें फिर जानबूझकर निशाना बनाकर मारा गया. इसकी वैधता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.

क्यों खामनेई की हत्या युद्ध नियमों का उल्लंघन

चूंकि ईरान की ओर से युद्ध और हमले की शुरुआत नहीं की गई थी, इसलिए भी खामनेई की हत्या को वैध नहीं माना जा सकता. शांति काल में किसी विदेशी सैन्यकर्मी या किसी भी सरकारी अधिकारी की हत्या करना, जो किसी होने वाले सशस्त्र हमले में शामिल नहीं हो, उसको हत्या माना जाएगा, इस तरह देखें तो अमेरिका – इजरायल दोनों ने युद्ध के नियमों से परे जाकर काम किया. जानबूझकर एक देश के राष्ट्रप्रमुख की हत्या की.

यूएन चार्टर क्या कहता है

संयुक्त राष्ट्र चार्टर एक संधि जिसे संयुक्त राज्य अमेरिका भी मानता है, वो ये प्रावधान करता है कि कोई भी राष्ट्र किसी अन्य देश के संप्रभु क्षेत्र पर उसकी सहमति, आत्मरक्षा के तर्क या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्राधिकरण के बिना बल का प्रयोग नहीं कर सकता है.

न्यूयार्क टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, कार्डोज़ो स्कूल ऑफ़ लॉ की प्रोफेसर और विदेश विभाग की पूर्व वरिष्ठ वकील रेबेका इंगबर ने कहा, “चाहे सशस्त्र संघर्ष के कानून के अनुसार कोई व्यक्ति वैध सैन्य लक्ष्य हो या नहीं, यदि हमला संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन करता है, तो वह हमला अवैध है. कोई भी देश गैरकानूनी रूप से सशस्त्र संघर्ष शुरू करके किसी राष्ट्राध्यक्ष की हत्या को उचित नहीं ठहरा सकता.”

ईरान की ओर से तब तक कोई हमला नहीं हुआ 

अगर इजरायल और अमेरिका इस हत्या को लेकर आत्मरक्षा का दावा करते हों तो भी संयुक्त राष्ट्र चार्टर उन्हें गलत ठहराता है, इसके अनुसार सशस्त्र हमला होना जरूरी है, जो ईरान की ओर से बिल्कुल नहीं हुआ था. जाहिर सी बात है कि संयुक्त राष्ट्र संघ और इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के लिहाज से खामनेई और ईरान के दूसरे नेताओं को निशाना करके हमला करना और उन्हें मारना चार्टर और कानूनों के खिलाफ जाता है.

किस तर्क से ट्रंप ने इसे सही ठहराया

हालांकि हमले के बाद ट्रंप ने अपने पक्ष को सही ठहराने के लिए बहुत ही लचीली परिभाषा पर आधारित तर्क दिए हैं. शनिवार को एक वीडियो में ट्रंप ने घोषणा की कि उद्देश्य “ईरानी शासन से उत्पन्न होने वाले आसन्न खतरों को समाप्त करके अमेरिकी लोगों की रक्षा करना” था. लेकिन उन्होंने यह संकेत नहीं दिया कि हमलों से पहले ईरान सशस्त्र हमले की तैयारी में था बल्कि उन्होंने कहा कि ईरान को परमाणु हथियार और लंबी दूरी की मिसाइलें बनाने की अनुमति देना असहनीय होगा.

वहीं अमेरिकी विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मार्को रुबियो ने पत्रकारों से कहा कि “वास्तव में एक आसन्न खतरा था.” उन्होंने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका का मानना ​​था कि इज़राइल ईरान पर हमला करने वाला था. इसमें अमेरिकी ठिकानों पर हमला करने की आशंका थी. इसलिए देश ने इज़राइल के हमले में “सक्रिय रूप से, रक्षात्मक तरीके से, उनका साथ दिया ताकि उन्हें अधिक नुकसान पहुंचाने से रोका जा सके.”

जाहिर सी बात है कि ट्रंप और इजरायल प्रशासन को अंतरराष्ट्रीय कानूनों की कोई परवाह नहीं है. जनवरी में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार करने के लिए अमेरिकी सेना द्वारा वेनेजुएला पर किया गया आक्रमण भी संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन जैसा ही था. हालांकि अमेरिका ने इसे लेकर भी दावा किया था कि घरेलू कानून के अनुसार, राष्ट्रपति को चार्टर के विपरीत काम करने का संवैधानिक अधिकार हासिल है.

खामनेई को मारने को लेकर अंतरराष्ट्रीय कानून कहते हैं कि यदि कोई देश जानबूझकर किसी अन्य राष्ट्र को अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करने में सहायता करता है, तो दोनों राष्ट्र उस गलत काम के लिए दोषी माने जाते हैं. इस तर्क के अनुसार, यदि अयातुल्ला की हत्या गैरकानूनी थी.



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