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Kanpur News : यह तकनीक ऐसे लोगों के लिए वरदान है जिन्हें धीरे-धीरे कम सुनाई देना शुरू हो गया है, लेकिन वे समय पर जांच नहीं करा पाते. आजकल ईयरफोन का ज्यादा इस्तेमाल, तेज आवाज और ध्वनि प्रदूषण की वजह से लोगों में सुनने की समस्या तेजी से बढ़ रही है. लोकल 18 से शोधकर्ता डॉ. याजुषी देओल बताती हैं कि यह तकनीक लोगों को शुरुआती स्तर पर ही सुनने की समस्या पहचानने में मदद करेगी. इससे समय रहते इलाज शुरू किया जा सकेगा, ताकि वह आगे चलकर गंभीर दिक्कतों में न बदले. गांव और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा.
कानपुर. यूपी स्थित कानपुर के लोगों के लिए राहत भरी खबर है. अब कान की सुनने की क्षमता जांचने के लिए अस्पतालों के लंबे चक्कर लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) ने मिलकर एक खास एआई ऑडियोमीटर टूल तैयार किया है, जिससे लोग अपने मोबाइल फोन से ही सुनने की जांच कर सकेंगे. यह तकनीक खासतौर पर उन लोगों के लिए मददगार होगी जिन्हें धीरे-धीरे कम सुनाई देना शुरू हो गया है, लेकिन वे समय पर जांच नहीं करा पाते. अब सिर्फ क्यूआर कोड स्कैन करना होगा या वेब लिंक खोलना होगा. इसके बाद मोबाइल सीधे एआई टूल से जुड़ जाएगा और जांच शुरू हो जाएगी.
इतने हर्ट्ज तक जांच
इस नए सिस्टम में व्यक्ति को अलग-अलग ध्वनियां सुनाई जाएंगी. जैसे ही आवाज साफ सुनाई देगी, मोबाइल स्क्रीन पर क्लिक करना होगा. इसके बाद पूरी रिपोर्ट तैयार होकर सेव हो जाएगी. यह जांच 500 से 2000 हर्ट्ज की ध्वनि आवृत्ति तक सुनने की क्षमता को माप सकेगी. शोधकर्ता डॉ. याजुषी देओल ने बताया कि यह तकनीक लोगों को शुरुआती स्तर पर ही सुनने की समस्या पहचानने में मदद करेगी. इससे समय रहते इलाज शुरू किया जा सकेगा और गंभीर दिक्कतों से बचाव होगा.
इनके लिए भी फायदेमंद
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के ईएनटी विभागाध्यक्ष डॉ. एस के कनौजिया ने बताया कि यह एआई आधारित टूल नवजात बच्चों, बुजुर्गों और कम सुनने वाले मरीजों के लिए काफी उपयोगी साबित होगा. इससे अस्पतालों की ओपीडी में भी मरीजों की स्क्रीनिंग तेजी से की जा सकेगी. उन्होंने कहा कि आजकल ईयरफोन का ज्यादा इस्तेमाल, तेज आवाज और ध्वनि प्रदूषण की वजह से लोगों में सुनने की समस्या तेजी से बढ़ रही है. ऐसे में यह तकनीक समय रहते समस्या पकड़ने में बड़ी भूमिका निभाएगी.
कब से इस्तेमाल
इस रिसर्च प्रोजेक्ट को इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) का भी समर्थन मिला है. रिसर्च टीम के मुताबिक यह टूल करीब 80 प्रतिशत तक सटीक परिणाम देने में सफल रहा है. उम्मीद है कि इस साल के अंत तक इसे पूरी तरह इस्तेमाल के लिए तैयार कर दिया जाएगा. डॉक्टरों का मानना है कि आने वाले समय में यह तकनीक कान की बीमारियों की जांच और इलाज की प्रक्रिया को काफी आसान बना देगी. खासतौर पर गांव और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा.
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प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें





