USS जेराल्ड आर फोर्ड: यह पिछले करीब 11 महीनों से समुद्र में है. वियतनाम युद्ध के बाद किसी भी विमान वाहक पोत की यह सबसे लंबी तैनाती है. मार्च में इसमें आग लग गई थी, जिसके बाद मरम्मत के लिए यह भूमध्य सागर में रुका और फिर वापस रेड सी पहुंच गया. वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, अब इसे लंबे समय से अटकी मरम्मत के लिए घर वापस भेजा जा रहा है.
USS जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश: यह 31 मार्च को वर्जीनिया के नॉर्फोक से निकला और अफ्रीका का चक्कर लगाकर 24 अप्रैल को इस इलाके में पहुंचा. इसकी खासियत यह है कि यह F-35 फाइटर जेट उड़ाने में सक्षम है जो फोर्ड नहीं कर सकता. सैन्य जानकारों का मानना है कि दो F-35 वाले विमान वाहक पोतों के होने से अमेरिका की, ईरान पर हमले की ताकत कई गुना बढ़ गई है.
कितनी ताकत: इन तीनों पोतों को मिलाकर 200 से ज्यादा लड़ाकू विमान और 15,000 सैनिक अमेरिका के समुद्र में तैनात हैं. इनमें F-35C, सुपर हॉर्नेट और दुश्मन के रडार जाम करने वाले ‘ग्रौलर’ विमान शामिल हैं. साथ ही, इनकी सुरक्षा में कम से कम 9 गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर यानी विध्वंसक जहाज भी चल रहे हैं.
7 मई की झड़प: ईरान का दावा है कि कल रात उसने होर्मुज की गोलाबारी में तीन अमेरिकी जहाज, USS ट्रक्सटन, USS राफेल पेराल्टा और USS मेसन को निशाना बनाकर अमेरिका का नुकसान किया है. ईरान ने इन पर मिसाइलों और ड्रोनों से हमला किया, जिसके जवाब में अमेरिका ने ईरान के बंदर अब्बास, क़ेशम और बंदर कर्गन में उनके ठिकानों को निशाना बनाया.
खाड़ी देशों का रुख: अमेरिका के लिए कब बंद हुए दरवाजे और कब खुले?
इस पूरे संघर्ष की सबसे दिलचस्प कहानी युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि कूटनीति के मेज पर लिखी गई. फरवरी और मार्च की शुरुआत में जब युद्ध की आहट तेज हुई, तो अमेरिका को अपने ही दोस्तों से बड़ा झटका लगा. सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत और बहरीन ने साफ कह दिया कि वे अपनी जमीन या आसमान का इस्तेमाल ईरान पर हमले के लिए नहीं होने देंगे. सऊदी अरब और कुवैत ने तो अपने एयरबेस तक बंद कर दिए, क्योंकि उन्हें डर था कि अगर अमेरिका उनके यहां से उड़ान भरेगा, तो ईरान पलटवार में उन्हीं को निशाना बनाएगा.
तनाव तब और बढ़ गया जब 5 मई को राष्ट्रपति ट्रंप ने ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ का ऐलान किया. ट्रंप चाहते थे कि अमेरिकी नौसेना वहां से गुजरने वाले जहाजों को रास्ता दिखाए, लेकिन सऊदी अरब और कुवैत इसके लिए तैयार नहीं थे. उन्होंने तुरंत अपने बेस के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी, जिससे ट्रंप बैकफुट पर आ गए और उन्हें महज 36 घंटे के भीतर अपना यह बड़ा मिशन रोकना पड़ा.
लेकिन 7 मई की रात जब ईरान ने सीधे अमेरिकी जहाजों पर गोलीबारी की, तो पूरी तस्वीर बदल गई. ताजा रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस हमले के बाद सऊदी अरब और कुवैत का रुख नरम पड़ गया है. उन्होंने अपनी पाबंदियां हटा ली हैं और अब अमेरिका को ईरान के खिलाफ कार्रवाई के लिए अपने ठिकानों के इस्तेमाल की छूट दे दी है.
अमेरिका इन अहम ठिकानों से अपनी ताकत दिखा रहा
सबसे पहले कतर का अल-उदेद एयरबेस है, जो मिडिल ईस्ट में अमेरिका का सबसे बड़ा अड्डा है और जहां ब्रिटिश विमान भी तैनात हैं. ईंधन भरने और आधुनिक F-35 विमानों के लिए यूएई का अल-धफरा बेस काम आ रहा है. वहीं, इजरायल के ओवदा बेस पर पहली बार अमेरिका ने अपने सबसे घातक F-22 शिकारी विमान तैनात किए हैं. इनके साथ ही जॉर्डन का मुवाफ्फाक साल्टी एयरबेस भी हाई अलर्ट पर है, जहां से खतरनाक F-15E स्ट्राइक ईगल विमान उड़ान भरने के लिए तैयार खड़े हैं.
ईरान की रणनीति ‘छिपकर वार’ और समुद्री घेराबंदी
ईरान जानता है कि वह सीधे तौर पर अमेरिका की विशाल सेना का मुकाबला नहीं कर सकता, इसलिए उसकी पूरी रणनीति ‘अचानक हमला कर छिप जाने’ की है. वह आमने-सामने की जंग के बजाय स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में चार चालाकियों से दबाव बनाता है. सबसे पहले, वह अपनी छोटी और तेज नावों का इस्तेमाल करता है जो अचानक मिसाइल दागकर गायब हो जाती हैं. इसके साथ ही, वह समुद्र के पानी में बारूदी सुरंगें बिछा देता है और GPS जैमिंग के जरिए जहाजों का रास्ता भटकाने की कोशिश करता है. यही नहीं, वह रेडियो पर जहाजों को डरावनी चेतावनियां भी देता है ताकि घबराकर बीमा कंपनियां वहां जहाज भेजना ही बंद कर दें.
भले ही पिछले हमलों में ईरान का 60-70% मिसाइल भंडार और 90% एयर डिफेंस सिस्टम मिट्टी में मिल चुका है, लेकिन रिपोर्ट्स बताती हैं कि सीजफायर के दौरान ईरान ने हार नहीं मानी. उसने अपने टूटे हुए भूमिगत ठिकानों की मरम्मत शुरू कर दी है और दोबारा मिसाइलें व ड्रोन तैयार करने में जुट गया है. ईरान ने अब होर्मुज में एक “डिजिटल टोल टैक्स” जैसा सिस्टम भी बना दिया है यानी अब बिना ईमेल से इजाजत लिए और मोटी फीस चुकाए, कोई भी जहाज वहां से नहीं निकल पाएगा.





