OPINION: ईरान तो सिर्फ बहाना है, अमेरिका का असली निशाना चीन का खजाना है! ट्रंप के जाल में फंस गया ड्रैगन


वीरेंद्र पंडित, नई दिल्ली: किसी कंपनी की बैलेंस शीट में ऊपर दिखने वाला भारी मुनाफा अक्सर असलियत को छिपा लेता है. असल सच ‘बॉटम लाइन’ यानी टैक्स के बाद बचने वाले नेट प्रॉफिट में होता है. यही नियम युद्ध पर भी लागू होता है. ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी घमासान की हेडलाइंस के पीछे असली सवाल यह है कि आखिर में किसे फायदा होगा और कौन बर्बाद होगा? मौजूदा हालातों को देखें तो ट्रंप के नेतृत्व वाला अमेरिका सबसे बड़ा गैनर और चीन यानी मंदारिन सबसे बड़ा लूजर बनकर उभर सकते हैं. इजरायल इस पूरी प्रक्रिया में ‘ग्रेटर इजरायल’ बनने की ओर अग्रसर है, लेकिन इस बिसात के पीछे के खिलाड़ी बीजिंग और वाशिंगटन हैं.

ट्रंप 1.0 से 2.0 तक: क्या यह सिर्फ संयोग है?

साल 2020 में कोविड-19 की दस्तक ने दुनिया को बायोलॉजिकल वार के खतरे से रूबरू कराया था. डोनाल्ड ट्रंप ने उस समय इसे ‘चीनी वायरस’ करार दिया था. हालांकि वे चुनाव हार गए थे, लेकिन 2025 में उनकी सत्ता में वापसी ने समीकरण बदल दिए हैं. दुनिया ट्रंप को एक मजाकिया या अनप्रिडिक्टेबल लीडर मान सकती है, लेकिन वे एक बेहद ठंडे और माहिर कैलकुलेटर हैं. वे अपनी रैलियों और बयानों से मीडिया को उलझाए रखते हैं, जबकि पीछे उनका प्लान पूरी तरह तैयार रहता है.

ट्रंप कभी अपमान नहीं भूलते. उन्होंने 2026 में ओबामा परिवार को लेकर जो विवादास्पद वीडियो साझा किया, वह उनके पुराने हिसाब चुकता करने की फितरत को दर्शाता है. लेकिन उनकी राजनीति सिर्फ बदले तक सीमित नहीं है. उनका फोकस ‘रियलपोलिटिक’ पर है, जहां देश दोस्त या दुश्मन नहीं, बल्कि सिर्फ बिजनेस के पार्टनर होते हैं. ट्रंप एक ऐसे ब्रांड एंबेसडर हैं जो खुद को अराजकता के बीच एक व्यवस्था की तरह पेश करते हैं.

क्या ईरान का तेल कब्जाने की अमेरिकी योजना सफल होगी?

ट्रंप की रणनीति का एक हिस्सा दशकों पुराना है. 1987 के एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि अमेरिका को ईरान में घुसकर उसके तेल पर कब्जा कर लेना चाहिए. आज वे ठीक वही कर रहे हैं.

वे जानते हैं कि ईरान को उलझाकर न केवल मिडिल ईस्ट में अमेरिकी पकड़ मजबूत होगी, बल्कि चीन की एनर्जी सप्लाई भी ठप की जा सकती है. ट्रंप के लिए विचारधारा कोई मायने नहीं रखती.

वे वेनेजुएला पर दबाव बनाते हैं, तो दूसरी तरफ रूस को कच्चा तेल बेचने की ‘सीक्रेट’ छूट भी दे देते हैं.

ईरान का तेल चीन की रगों में दौड़ने वाले खून जैसा है. यदि अमेरिका फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण कड़ा करता है, तो चीन की औद्योगिक रफ्तार को ब्रेक लग जाएगा.

ट्रंप का ‘अमेरिका फर्स्ट’ असल में ‘चीन लास्ट’ की नीति पर टिका है. वे जानते हैं कि बिना युद्ध लड़े किसी महाशक्ति को हराने का सबसे अच्छा तरीका उसकी सप्लाई लाइन काट देना है. ईरान इस खेल में सिर्फ एक भौगोलिक बाधा है जिसे अमेरिका अब हटाने की दिशा में बढ़ रहा है.

डीप स्टेट और रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों का असली कनेक्शन क्या है?

अमेरिका की असली ताकत वहां का ‘डीप स्टेट’ है. यह सुपर-गवर्नमेंट पर्दे के पीछे से लंबी अवधि की रणनीतियां बनाती है. इसे डेमोक्रेट्स पर ज्यादा भरोसा नहीं रहता क्योंकि वे अक्सर मानवाधिकारों और सार्वजनिक राय के दबाव में सैन्य जोखिम लेने से डरते हैं. यही कारण है कि डीप स्टेट ने रोनाल्ड रीगन को सोवियत संघ खत्म करने और जॉर्ज बुश को ‘वॉर ऑन टेरर’ के लिए चुना था. अब ट्रंप को चीन के उभार को रोकने की जिम्मेदारी मिली है.

ट्रंप के लिए गाजा, पाकिस्तान या पश्चिम एशिया सिर्फ एक व्यापारिक सौदे की तरह हैं. उन्होंने रूस के पूर्वी यूक्रेन पर कब्जे को एक सच्चाई की तरह स्वीकार कर लिया है. अमेरिका और रूस अब प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के मददगार बन रहे हैं. यह एक बहुत बड़ा रणनीतिक बदलाव है जिसे दुनिया अभी पूरी तरह समझ नहीं पाई है. अमेरिका ने रूस को यूक्रेन का हिस्सा देने के बदले में चीन के खिलाफ उसका मौन समर्थन हासिल कर लिया है.

रूस और अमेरिका के बीच क्या कोई गुप्त समझौता हुआ है?

  1. एक समय जो रूस और अमेरिका कट्टर दुश्मन थे, वे अब एक-दूसरे के सहयोगी नजर आ रहे हैं. यूक्रेन का एक बड़ा हिस्सा रूस के पास जाना अब एक हकीकत बन चुका है.
  2. ट्रंप की नजर में नाटो (NATO) अब अप्रासंगिक हो चुका है. अमेरिका ने यूरोप को उसके हाल पर छोड़ दिया है. अब यूरोप को या तो रूस से ऊर्जा की भीख मांगनी होगी या ईरान के सामने हाथ फैलाने होंगे.
  3. अमेरिका की असली योजना ईरान के टुकड़े करके एक नया ‘कुर्दिस्तान’ बनाने की हो सकती है. यह नया ‘कुर्दिस्तान’ ईरान, सीरिया, इराक और तुर्की के हिस्सों से मिलकर बन सकता है.
  4. यह मिडिल ईस्ट में दूसरे इजरायल की तरह काम करेगा जो अमेरिकी हितों की रक्षा करेगा. रूस ने भी शायद यह मान लिया है कि चीन एक अविश्वसनीय पड़ोसी है.
  5. 4,200 किलोमीटर लंबी सीमा पर चीन की विस्तारवादी नीति से रूस हमेशा सशंकित रहता है. इसलिए वह अमेरिका के साथ मिलकर चीन को सीमित करने के गेमप्लान में शामिल हो गया है.

चीन को घेरने का चक्रव्यूह और पाकिस्तान की भूमिका क्या है?

अमेरिका के लिए असली चुनौती चीन है. ड्रैगन को काबू में करने के लिए वाशिंगटन ने मॉस्को को एक ‘स्लीपिंग पार्टनर’ बना लिया है. रूस भी चीन की बढ़ती दादागिरी और सीमा विस्तार की नीति से परेशान है. चीन ने ईरान और सऊदी अरब के बीच समझौता कराकर मिडिल ईस्ट में अपनी धाक जमाने की कोशिश की थी. इस कदम ने अमेरिकी ‘डीप स्टेट’ को सतर्क कर दिया.

ट्रंप ने आते ही पाकिस्तान को चीन के कैंप से निकालकर फिर से पुराने रिश्तों की ओर मोड़ा है. पाकिस्तान को सऊदी अरब के साथ डिफेंस पैक्ट में शामिल करना ईरान के खिलाफ एक बड़ी चाल है. जनवरी 2026 में अमेरिका ने दिवालिया पाकिस्तान को गाजा पुनर्निर्माण बोर्ड में शामिल कर लिया. मजे की बात यह है कि उसे खुद के पुनर्निर्माण के लिए एक पैसा नहीं दिया गया. यह पाकिस्तान को चीन के सीपेक (CPEC) प्रोजेक्ट से दूर रखने की अमेरिकी कोशिश का हिस्सा है.



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