अमेरिका ने 60 के दशक के शुरू में वियतनाम के खिलाफ केवल इसलिए युद्ध छेड़ दिया, क्योंकि उसे लग रहा था कि वियतनाम पड़ोसी देशों सोवियत संघ और चीन के प्रभाव में कहीं कम्युनिस्ट देश ना बन जाए. ये युद्ध करीब 15 सालों तक चला. इस युद्ध के दौरान 1961 ले 1971 के बीच अमेरिका ने एजेंट ऑरेंज का इस्तेमाल शुरू किया, जो इतना घातक था कि उसका असर अब भी इस देश में देखा जा सकता है. वहां अब भी पीढ़ियां अपंग हो रही हैं और बहुत बड़ा खेतीहर इलाका बंजर में बदल चुका है.
आज भी जब एजेंट ऑरेंज की बात होती है तो मानवता के खिलाफ किया गये बेहद क्रूर हमले के तौर पर याद किया जाता है. इस युद्ध में अमेरिका ने वियतनाम के लाखों लोगों को मारा. खेती को चौपट कर दिया. वियतनाम को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. इस एजेंट का असर तब वहां लोगों पर ऐसा हुआ कि लोग बुरी तरह तड़प तड़प कर मरे. ये असर डीएनए और गर्भ तक जा पहुंचा, जिससे कुछ इलाकों में आज भी पीढ़ियों दर पीढ़ियां अपंग पैदा हो रही हैं.
आज भी लोग जब इसके क्रूर और अमानवीय असर की एक झलक तस्वीरों के जरिए हो ची मिन्ह के वार मेमोरियल म्युजियम में देखते हैं तो उनकी आंखों से आंसू निकल आते हैं.
1961 से लेकर 1971 तक अमेरिका विमान से पूरे वियतनाम में एजेंट आरेंज का छिड़काव करता रहा, जिससे वहां बहुत तबाही हुई. बच्चे अपंग हुए. खेत, खलिहान, जंगल जल गए. धरती बंजर हो गई.
ये युद्ध पूरी तरह 30 अप्रैल 1975 को समाप्त हुआ. लेकिन अमेरिका को कभी मानवता विरोधी कामों के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया गया. ना ही ये मामले किसी इंटरनेशनल कोर्ट में पहुंचे.
वियतनाम युद्ध के इतिहास में ‘एजेंट ऑरेंज’ का नाम एक ऐसे काले अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसने न केवल युद्ध के मैदान को बदला, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के डीएनए और वियतनाम की धरती की तासीर को भी हमेशा के लिए जख्मी कर दिया. ये महज एक खरपतवार नाशक नहीं था, बल्कि ऐसा रासायनिक हथियार था जिसने इंसान और प्रकृति दोनों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था.
क्या था एजेंट ऑरेंज?
एजेंट ऑरेंज एक शक्तिशाली शाकनाशी और ‘डिफोलिएंट’ यानि पत्तियों को गिराने वाला रसायन था. इसका नाम उन ड्रमों पर लगी नारंगी रंग की पट्टियों के कारण पड़ा, जिनमें इसे भरकर लाया जाता था. अमेरिकी सेना ने 1961 से 1971 के बीच ‘ऑपरेशन रैंच हैंड’ के तहत इसका इस्तेमाल किया.
एजेंट ऑरेंज में दो रसायनों का मिश्रण था – 2,4-D और 2,4,5-T. उत्पादन प्रक्रिया के दौरान इसमें अनजाने में TCDD (2,3,7,8-tetrachlorodibenzo-p-dioxin) नामक एक उप-उत्पाद मिल गया. यह ‘डाइऑक्सिन’ दुनिया के सबसे घातक रसायनों में एक माना जाता है. यह पानी में नहीं घुलता, बल्कि वसा में जमा हो जाता है और दशकों तक पर्यावरण में बना रहता है.
वियतनाम की राजधानी हो ची मिन्ह सिटी में वार मेमोरियल म्युजियम है, जहां इस फोटो के जरिए दिखाया गया कि एजेंट आरेंज ने कैसे आने वाली पीढ़ियों तक को विकलांग कर दिया. (photo – sanjay srivastava)
क्यों हुआ इसका इस्तेमाल
इसका मुख्य उद्देश्य दोतरफा था. वियतनामी क्रांतिकारियों के छिपने की जगह खत्म कर देना. वियतनाम के घने जंगलों को सुखा देना ताकि ‘वियत कांग’ के लड़ाकों को छिपने के लिए प्राकृतिक कवर ही नहीं मिल पाए. खाद्यान पैदा ही नहीं हो सके, फसलें नष्ट कर दी जाएं जिससे विद्रोहियों को खाने के लिए भोजन ही नहीं मिल सके.
बंजर हो गई जमीन, प्रकृति उजड़ गई
वियतनाम की भूमि बहुत उपजाऊ मानी जाती है, उस युद्ध के दौरान ये जमीन भरपूर धान और सब्जियां उगाती थी. यहां खूब फल पैदा होते थे. भरपूर जंगल थे. इस रसायन के छिड़काव के बाद सबकुछ श्मशान जैसा दिखने लगा. बहुत बड़े पैमाने पर जमीन बंजर हो गई. पेड़ – पौधे जले और लंबे समय तक उनका असर बना रहा.
अमेरिका के एजेंट ऑरेंज का भयावह असर. अब भी कुछ इलाकों में अपंग और मानसिक तौर पर विकलांग बच्चे पैदा हो रहे हैं. (courtesy Philip Jones Griffiths)
रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी वायुसेना ने लगभग 45 लाख एकड़ भूमि पर 1.9 करोड़ गैलन से अधिक रसायन छिड़के. इसके कारण करोड़ों पेड़ सूख गए. जंगल का पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो गया.
छिड़काव के बाद डाइऑक्सिन मिट्टी की निचली परतों तक पहुंच गया. वियतनाम के कई ‘हॉटस्पॉट्स’ आज भी इतने जहरीले हैं कि वहां खेती करना मौत को दावत देने जैसा है. मिट्टी से यह जहर नदियों और झीलों की मछलियों में पहुंचा. फिर उन मछलियों को खाने वाले इंसानों के शरीर में.
कैसे पीढ़िया इससे अपंग हुईं
एजेंट ऑरेंज का सबसे डरावना पहलू इसका टेराटोजेनिक प्रभाव है, यानी भ्रूण के विकास को विकृत करने की क्षमता. वियतनाम रेड क्रॉस के अनुसार, करीब 30 लाख वियतनामी लोग इसके दुष्प्रभावों से प्रभावित हुए.
छिड़काव के संपर्क में आए सैनिकों और नागरिकों में प्रोस्टेट कैंसर, ल्यूकेमिया, टाइप-2 मधुमेह और सांस संबंधी गंभीर बीमारियां देखी गईं. इस जहर का सबसे क्रूर प्रहार आने वाली पीढ़ियों पर हुआ. वियतनाम में आज भी तीसरी और चौथी पीढ़ी के बच्चे ऐसे विकारों के साथ पैदा हो रहे हैं जो रूह कंपा देने वाले हैं. उनमें ये लक्षण पाए जा रहे हैं
– हाथ-पैरों का न होना या टेढ़े-मेढ़े होना
– चेहरे की गंभीर विकृतियां और अंधापन
– मानसिक मंदता और रीढ़ की हड्डी के विकार
– त्वचा की असाध्य बीमारियां.
वियतनाम के कई अस्पतालों में आज भी ऐसे ‘विशेष वार्ड’ हैं जहां इन बच्चों की देखभाल की जाती है, जो इस रासायनिक युद्ध की जीवित गवाही हैं. वियतनाम के लाखों आम नागरिक आज भी न्याय और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
ये तस्वीर बता रही है कि कैसे अमेरिका ने युद्ध के दौरान एजेंट ऑरेंज से जंगल से जंगल जला दिया. खेतों को बंजर बना दिया. इसका असर आज भी है.
हालांकि हाल के वर्षों में अमेरिका ने वियतनाम के कुछ हवाई अड्डों जैसे दा नांग को ‘डाइऑक्सिन मुक्त’ करने के लिए धन और तकनीक उपलब्ध कराई है लेकिन उस नुकसान की भरपाई असंभव है जो पीढ़ियों ने सहा है.
डाइऑक्सिन हॉटस्पॉट्स
वियतनाम के उन इलाकों को ‘डाइऑक्सिन हॉटस्पॉट्स’ कहा जाता है, जहां अमेरिकी सेना ने एजेंट ऑरेंज की स्टोरेज कर रखी थी, जहां से इसे विमानों में भरा जाता था. इन जगहों पर मिट्टी और पानी में जहर की मात्रा सामान्य से सैकड़ों गुना ज्यादा पाई गई. दा नांग हवाई अड्डा सबसे खतरनाक हॉटस्पॉट माना जाता था क्योंकि यहां से सबसे ज्यादा छिड़काव अभियान चलाए गए.
कैसे फिर हुई इसकी सफाई
2012 में अमेरिका और वियतनाम सरकार ने मिलकर एक बड़ी परियोजना शुरू की. इसमें ‘थर्मल डिसॉर्प्शन’ तकनीक का इस्तेमाल किया गया, जिसमें मिट्टी को लगभग 335°C तक गर्म करके जहर को वाष्पित किया जाता है और फिर उसे फिल्टर किया जाता है. इसकी वजह से 2018 में इस हवाई अड्डे की करीब 30 एकड़ जमीन को पूरी तरह साफ घोषित कर दिया गया. अब ये सुरक्षित है.
दा नांग के बाद यह दूसरा और वर्तमान में सबसे बड़ा हॉटस्पॉट है. ये हो ची मिन्ह सिटी के पास है. विशेषज्ञों का मानना है कि बिएन होआ में दा नांग की तुलना में चार गुना ज्यादा डाइऑक्सिन मौजूद है. यहां की करीब 5 लाख घन मीटर मिट्टी जहरीली है.
यहां सफाई का काम 2019 में शुरू हुआ. इसके 10 साल तक चलने का अनुमान है. इसमें अमेरिका करीब 30 करोड़ डॉलर से अधिक की मदद दे रहा है. हालांकि ये तकनीक बहुत जटिल है.
मध्य वियतनाम के कई ग्रामीण इलाकों में, जहां विमानों से एजेंस ऑरेंज का सीधे छिड़काव किया गया, वहां की मिट्टी आज भी पूरी तरह उपजाऊ नहीं हो पाई है. रसायनों ने मिट्टी के सूक्ष्म पोषक तत्वों को खत्म कर दिया. जो लोग इन हॉटस्पॉट्स के पास रहते हैं, उनके शरीर में आज भी डाइऑक्सिन के अंश मिलते हैं, जो सीधे तौर पर नई पीढ़ी को अपंग बना रहे हैं.





