पटना. बिहार की राजनीति में एक बड़ा मोड़ तब आया जब वर्ष 2005 अक्टूबर नवंबर में हुए विधानसभा चुनाव में एनडीए को बहुमत मिला और जनता दल यूनाइटेड के नेता नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने. रोचक तथ्य यह है कि जब नीतीश कुमार पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बने थे, तब उन्होंने दिल्ली की राजनीति छोड़ी थी. उस समय वे लोकसभा सांसद भी थे, लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने संसद की सदस्यता छोड़ दी और पूरी तरह राज्य की राजनीति पर ध्यान केंद्रित कर लिया. नीतीश कुमार के उसी फैसले से बिहार की राजनीति में एक नया दौर शुरू हुआ और दो दशक तक वही सत्ता के केंद्र भी रहे और प्रदेश की सत्ता के शीर्ष पर विराजमान भी रहे. लेकिन, बीते 5 मार्च को उन्होंने एक बार फिर केंद्र की राजनीति में जाने की इच्छा जताते हुए राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन कर पूरे राजनीतिक जगत को चौंका दिया.
दरअसल, उनका यह फैसला केवल एक पद का त्याग भर नहीं है, बल्कि बिहार की सक्रिय राजनीति से एक बार फिर केंद्र की ओर उनके बढ़ते कदम हैं. अब लगभग 20 साल बाद वह फिर उसी दिल्ली की राजनीति की ओर लौट रहे हैं जिसको उन्होंने मोटे तौर पर अपने से दूर कर दिया था. अब जब वह एक बार फिर दिल्ली की ओर लौट रहे हैं तो ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र की राजनीति में उनकी नई भूमिका कैसी रहती है. लेकिन, बीते बीस वर्षों में हजारों दिनों तक बिहार की सत्ता के सिरमौर रहे नीतीश कुमार की यह राजनीतिक यात्रा बेहद रोचक है.
2005 का वो इस्तीफा और पॉलिटिकल ट्विस्ट
कहानी शुरू होती है नवंबर 2005 से उस समय नीतीश कुमार केंद्र की राजनीति में एक बड़ा चेहरा थे और 14वीं लोकसभा के सदस्य थे. वह बिहार की नालंदा लोकसभा सीट से सांसद थे. बता दें कि वर्ष 2004 के आम चुनाव में उन्होंने नालंदा और बाढ़, दोनों सीटों से चुनाव लड़ा था. लेकिन बाढ़ लोकसभा सीट से वह चुनाव हार गए थे. हालांकि, उस वर्ष नालंदा की जनता ने उन्हें अपना प्रतिनिधि चुनकर संसद भेजा था. इसके बाद 24 नवंबर 2005 को जब उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, तब वह किसी सदन के सदस्य नहीं थे. मुख्यमंत्री पद की गरिमा और संवैधानिक नियमों के तहत उन्होंने अपनी लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. यह वह समय था जब उन्होंने बिहार को ‘जंगलराज’ से बाहर निकालने का संकल्प लिया था.
2005 में सांसद की कुर्सी छोड़ी और बिहार के मुख्यमंत्री बनकर दो दशक तक बिहार की सत्ता के शीर्ष पर नीतीश कुमार ही रहे हैं. (फाइल फोटो)
7416 दिनों की लंबी यात्रा और बदलती भूमिकाएं
24 नवंबर 2005 से लेकर आज 16 मार्च 2026 तक, नीतीश कुमार के इस सफर को अगर दिनों में गिना जाए तो यह लगभग 7416 दिन (बीच के 9 महीनों के मांझी कार्यकाल को छोड़कर) बैठता है. बता दें कि बीच में मई 2014 से फरवरी 2015 तक का लगभग 9 महीने का समय ऐसा था, जब उन्होंने जीतन राम मांझी को कुर्सी सौंपी थी, लेकिन सत्ता की चाबी उन्हीं के पास ही रही थी. इस बीच इन 20 वर्षों में नीतीश कुमार की भूमिकाएं लगातार बदलती रहीं और हर बदलाव ने बिहार की दिशा बदली. आइए इस पर नजर डालते हैं.
विकास पुरुष की छवि और सुशासन बाबू
वर्ष 2005 से 2013 के बीच मुख्यमंत्री रहते हुए शुरुआत के आठ सालों में नीतीश कुमार ने ‘सुशासन बाबू’ की पहचान बनाई. प्रदेश में सड़कों का जाल बिछाना, स्कूलों में साइकिल योजना शुरू करना और पंचायती राज में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देना उनके मास्टरस्ट्रोक थे. इस दौर में भाजपा और जदयू का तालमेल बेमिसाल था और राज्य की आम जनता को इस गठबंधन पर पूर्ण भरोसा था.
वैचारिक अलगाव से बदली अपनी राजनीति
फिर आया वर्ष 2013, उस समय गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा ने पीएम उम्मीदवार घोषित किए गए तो नीतीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया. कहा जाता है कि यह उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा जोखिम था. यह बात वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में तब साबित भी हुई जब उनकी पार्टी जदयू करारी हार हुई. इस हार बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया, लेकिन 278 दिनों के भीतर ही जीतन राम मांझी से विवाद के बाद उन्हें वापस कमान संभालनी पड़ी.
2009 की एनडीए की लुधियाना रैली यह तस्वीर 2010 में बिहार के अखबारों में प्रकाशित हुई और नीतीश कुमार का भाजपा से सियासी अलगाव का दौर शुरू हो गया.
गठबंधन के प्रयोग और ‘पालाबदल’ पॉलिटिक्स
इसके बाद नीतीश कुमार की राजनीति का नया दौर 2015-2024 तक सियासी तौर पर उथल पुथल वाला रहा. साल 2015 में उन्होंने धुर विरोधी लालू प्रसाद यादव के साथ हाथ मिला लिया और महागठबंधन बनाया. इस गठबंधन को जीत भी मिली, लेकिन अंदरूनी खींचतान के कारण वर्ष 2017 में फिर भाजपा के साथ हो लिए. इसके बाद वर्ष 2022 में फिर पाला बदल लिए और साल 2024 के चुनाव से ठीक पहले एक बार फिर एनडीए में शामिल हो गए. बार-बार पाला बदलने के बावजूद बिहार की राजनीति का केंद्र बिंदु नीतीश कुमार ही बने रहे. आज जब वह राज्यसभा जा रहे हैं तो उनके विरोधी भी मानते हैं कि बिहार में उनकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था.
अब राज्यसभा क्यों और क्या होगी नई भूमिका?
राजनीति के जानकारों की मानें तो नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना उनके व्यक्तिगत राजनीतिक जीवन का एक ‘फुल सर्कल’ पूरा होने जैसा है. माना जा रहा है कि 75 वर्ष की आयु में अब वह बिहार की रोजाना की भागदौड़ और गठबंधन की खींचतान से थोड़ा विश्राम का जीवन चाहते हैं. लेकिन तथ्य यह भी है कि यह विश्राम सन्यास नहीं है. राजनीति के जानकारों का यह भी मानना है कि केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर नीतीश कुमार राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए की रणनीतियों को धार देंगे.
‘सम्मानजनक विदाई’ या कोई रणनीतिक रोल?
दरअसल, यह बदलाव अवश्यंभावी भी लगतती है क्योंकि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के परिणामों ने साफ कर दिया है कि राज्य में अब भाजपा बड़े भाई की भूमिका में है. ऐसे में राजनीति के जानकारों की नजर में नीतीश कुमार का यह कदम एक ‘सम्मानजनक विदाई’ और केंद्र में किसी बड़ी संवैधानिक या रणनीतिक भूमिका की तैयारी माना जा रहा है. राजनीति के गलियारों में चर्चा है कि संभव है कि उन्हें केंद्र में कोई बड़ा मंत्रालय या एनडीए के संयोजक जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाए.
करीब दो दशक बाद फिर दिल्ली की राजनीति में लौटेंगे नीतीश कुमार तो बिहार की राजनीति पर भी बड़ा प्रभाव अवश्यंभावी है.
बिहार की राजनीति में क्या बदलेगा?
हालांकि, बड़ा राजनीतिक तथ्य यह भी है कि नीतीश कुमार के दिल्ली प्रस्थान का मतलब है बिहार में एक बड़े पॉलिटिकल वैक्यूम (राजनीतिक रूप से खालीपन) का पैदा होना. दरअसल, पिछले दो दशकों से बिहार की राजनीति ‘नीतीश बनाम लालू’ के इर्द-गिर्द घूमती रही है. वहीं, अब जब नीतीश केंद्र की पारी शुरू करेंगे तो बिहार में भाजपा और राजद के बीच सीधी टक्कर देखने को मिलेगी. दूसरी ओर जदयू के अस्तित्व और उसके भविष्य पर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या नीतीश कुमार के बिना यह पार्टी एकजुट रह पाएगी?
20 साल बाद फिर राष्ट्रीय भूमिका में नीतीश
नीतीश कुमार राज्यसभा जाने के फैसले ने पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को भावुक जरूर किया है, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उनके अनुभव का लाभ उठाने के लिए दिल्ली का दरबार तैयार है. नालंदा से निकलकर पटना के ‘एक अणे मार्ग’ होते हुए वे अब देश की संसद के उच्च सदन में बिहार की आवाज बनने जा रहे हैं. केंद्र की राजनीति के बाद दो दशक पहले वर्ष 2005 में शुरू हुआ नीतीश कुमार के ‘सुशासन’ का यह अध्याय अब एक बार फिर दिल्ली की राजनीति के नए पन्नों पर अपना इतिहास लिखेगा. 7416 दिन पूरे होने पर नीतीश का सफर नया रूप ले रहा है, वे अब संसद में सक्रिय रहेंगे और बिहार को केंद्र से जोड़ेंगे.





