अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने गुरुवार को कहा कि अमेरिका तेल की कीमतों को कंट्रोल में रखने के लिए ईरानी तेल पर लगे कड़े सैंक्शन हटा सकता है. इससे समुद्र में जहाजों पर पहले से ही लदे लगभग 14 करोड़ बैरल ईरानी तेल को तुरंत बाजार में उतारा जा सकेगा. एक ऐसे समय में जब पूरी दुनिया में प्रतिदिन लगभग 10 करोड़ बैरल तेल की खपत हो रही है, यह अतिरिक्त तेल सप्लाई चेन में एक बड़ा गेम-चेंजर साबित होगा और कीमतें कम करने में मदद करेगा. लेकिन अगर सच में ऐसा हो गया तो भारत की बल्ले-बल्ले होगी. क्योंकि रूस से तेल खरीदने की पहले ही छूट है, अब ईरान का तेल मिल गया तो खर्चा कम और मोटा मुनाफा तय है.
ईरान का लगभग 140 मिलियन बैरल क्रूड ऑयल पानी के जहाजों में भरा हुआ समंदर में तैर रहा है. प्रतिबंधों के कारण ईरान इसे खुले बाजार में बेच नहीं पा रहा था और स्टोरेज का भारी खर्च उठा रहा था. जैसे ही अमेरिका इन प्रतिबंधों को हटाएगा या ढील देगा, ईरान इस तेल को जल्द से जल्द बेचना चाहेगा.
भारत को दे सकता है ऑफर
बाजार का सीधा नियम है कि जब सप्लाई अचानक बढ़ती है और बेचने वाले को जल्दी होती है, तो कीमतें गिरती हैं. भारत इस मौके का भरपूर फायदा उठा सकता है. जिस तरह रूस ने प्रतिबंधों के बाद भारत को भारी डिस्काउंट पर तेल दिया था, उसी तरह ईरान भी अपना स्टॉक खाली करने के लिए भारत को बेहद सस्ते दाम पर तेल ऑफर कर सकता है. भारत की तेल कंपनियां एकमुश्त बड़ी खरीदारी कर सकती हैं.
ट्रांसपोर्टेशन में आसानी: रूस से सस्ता और अमेरिका से तेज
भारत के लिए ईरानी तेल खरीदने का सबसे बड़ा फायदा लॉजिस्टिक्स का है. ईरान की खाड़ी से भारत के पश्चिमी तट गुजरात और महाराष्ट्र के बंदरगाहों तक तेल के जहाजों को पहुंचने में महज 3 से 4 दिन का समय लगता है. इसके विपरीत, अगर भारत अमेरिका से तेल मंगाता है, तो जहाजों को हफ्तों लग जाते हैं और भाड़े का खर्च बहुत अधिक आता है.
यहां तक कि रूस से आने वाले तेल को भी लंबा समुद्री रास्ता तय करना पड़ता है. ईरान से तेल आने पर ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट यानी ढुलाई खर्च न के बराबर रह जाएगी, जिससे तेल की लैंडिंग कॉस्ट यानी भारत पहुंचने पर कीमत) और भी ज्यादा सस्ती हो जाएगी.
यूरोप के बाजार में मोटा मुनाफा
अब आते हैं उस रणनीति पर जिससे भारत सबसे ज्यादा पैसा बना सकता है. भारत केवल अपनी घरेलू जरूरतों के लिए तेल नहीं खरीदता, बल्कि भारत दुनिया का एक बहुत बड़ा रिफाइनिंग हब है. गुजरात में दो रिफाइनरियां भारी और खट्टे कच्चे तेल को रिफाइन करने में दुनिया में सबसे हाईटेक हैं. ईरानी कच्चा तेल भी इसी श्रेणी में आता है.
मुनाफे का गणित ऐसे काम करेगा
भारत ईरान से ‘कौड़ियों के दाम’ पर कच्चा तेल खरीदेगा. भारतीय रिफाइनरियां उस कच्चे तेल को प्रोसेस करके पेट्रोल, डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल में बदलेंगी. यूरोपियन यूनियन में ऊर्जा का भारी संकट है और वहां रिफाइंड उत्पादों की कीमतें आसमान छू रही हैं. अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अनुसार, जब किसी भी देश का कच्चा तेल किसी दूसरे देश में रिफाइन हो जाता है, तो वह उस देश का उत्पाद बन जाता है. इस तरह, भारत उस सस्ते ईरानी तेल से बना महंगा डीजल और पेट्रोल सीधे यूरोप के मार्केट में निर्यात करेगा. खर्चा कम और कमाई यूरो में… यही वह चक्र है जिससे भारतीय तेल कंपनियों की कमाई रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकती है.
जब ईरान था भारत का ‘नंबर वन’ सप्लायर
भारत और ईरान के बीच तेल व्यापार का इतिहास बहुत पुराना और मजबूत रहा है. साल 2018-2019 में जब तक अमेरिका ने ईरान परमाणु समझौते से बाहर निकलकर कड़े प्रतिबंध नहीं लगाए थे, तब तक ईरान भारत के लिए दूसरा या तीसरा सबसे बड़ा ऑयल सप्लायर हुआ करता था.
भारत को ऑफर्स देता था ईरान
- ईरान भारत को तेल के पैसे चुकाने के लिए 60 दिन का समय देता था, जो अन्य देशों के मुकाबले बहुत ज्यादा था.
- ईरान अक्सर भारत तक तेल पहुँचाने के लिए जहाजों का भाड़ा और इंश्योरेंस का खर्च खुद उठाता था.
- दोनों देशों ने डॉलर की निर्भरता कम करने के लिए ‘रुपया-रियाल’ व्यापार तंत्र भी विकसित किया था.
भारत क्यों बन सकता है पसंद?
अगर अब प्रतिबंध हटते हैं, तो पूरी संभावना है कि ईरान अपने सबसे बड़े और पुराने ग्राहक यानी भारत को वापस पाने के लिए फिर से वैसी ही आकर्षक शर्तें और छूट पेश करेगा. क्योंकि तेल रिफाइन करने की जितनी क्षमता भारत के पास है, उतनी इस इलाके में चीन के अलावा किसी के पास नहीं.





