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Why Old Indian Railway Tickets Had Holes : क्यों होते थे पुराने भारतीय रेल टिकटों में छेद? जानें ‘स्प्रॉकेट होल्स’ और डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर का वह दिलचस्प कनेक्शन, जिसने सालों तक बिना किसी गलती के लाखों रेल यात्रियों के टिकट छापने में मदद की.
बचपन में हममें से ज्यादातर लोग यही समझते थे कि यह कोई खास डिजाइन है या फिर टिकट को आसानी से फाड़ने के लिए बनाया गया है.
Why Old Indian Railway Tickets Had Holes : आज का दौर डिजिटल टिकटिंग का है. हम मोबाइल पर एक क्लिक करते हैं और क्यूआर कोड या ई-टिकट लेकर सफर पर निकल पड़ते हैं. लेकिन क्या आपको वो दौर याद है जब रेलवे काउंटर से एक कड़क कागज वाला टिकट मिलता था? अगर आपने 90 के दशक या उसके बाद रेल का सफर किया है, तो आपने गौर किया होगा कि उन टिकटों के दोनों किनारों पर छोटे-छोटे छेद (Holes) लाइंस में बने होते थे.बचपन में हममें से ज्यादातर लोग यही समझते थे कि यह कोई खास डिजाइन है या फिर टिकट को आसानी से फाड़ने के लिए बनाया गया है. लेकिन ठहरिए! रेलवे का कोई भी काम बिना वजह नहीं होता. टिकट के किनारों पर बने उन मामूली से दिखने वाले छेदों के पीछे एक कमाल की तकनीक छिपी थी. आइए जानते हैं इसका पूरा सच.
डिजाइन नहीं, छपाई की ‘लाइफलाइन’ थे ये छेद
इंटरनेट और आधुनिक कंप्यूटर आने से पहले भारतीय रेलवे में रोजाना लाखों यात्रियों के लिए टिकट छापना एक बेहद मुश्किल काम था. आज की तरह तब लेजर या डिजिटल प्रिंटर नहीं हुआ करते थे. उस दौर में टिकटों की छपाई के लिए ‘डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर’ (Dot Matrix Printers) का इस्तेमाल किया जाता था, जो चलते समय ‘चिररर-चिररर’ की तेज आवाज करते थे.
टिकटों के किनारों पर दिखने वाले इन छोटे छेदों को तकनीकी भाषा में ‘स्प्रॉकेट होल्स’ (Sprocket Holes) कहा जाता है. पुराने समय में टिकट आज की तरह अलग-अलग पन्नों के रूप में नहीं छपते थे, बल्कि एक बहुत लंबे और लगातार जुड़े हुए रोल (Continuous Paper Roll) के रूप में प्रिंटर के अंदर जाते थे.
प्रिंटर के अंदर छोटे-छोटे दांतों वाले पहिये या गियर्स (Gears) लगे होते थे. जब प्रिंटिंग शुरू होती थी, तो ये दांत कागज के किनारों पर बने छेदों में फंसकर उसे बिल्कुल सटीक स्पीड और सीधे एलाइनमेंट के साथ आगे की तरफ खींचते थे.
अगर ये छेद न होते तो हो जाती बड़ी गड़बड़!
अब सवाल उठता है कि कागज को तो बिना छेद के भी रोलर की मदद से आगे खिसकाया जा सकता था, फिर इन छेदों की क्या जरूरत थी? दरअसल, लगातार छपाई के दौरान बिना छेद वाला लंबा कागज बार-बार फिसल जाता या अपनी जगह से तिरछा हो जाता.
रेलवे टिकट पर ट्रेन नंबर, सफर की तारीख, स्टेशन का नाम, किराया और कोच/सीट नंबर जैसी बेहद संवेदनशील जानकारियां छपती हैं. अगर छपाई के दौरान कागज थोड़ा सा भी अपनी जगह से हिल जाता, तो यह सारी जानकारी गलत जगह पर या कटी-फटी छपती. इससे यात्रियों के साथ-साथ टीटीई (TTE) के लिए भी भारी भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती. ये स्प्रॉकेट होल्स ही यह सुनिश्चित करते थे कि लाखों की संख्या में छपने के बावजूद हर एक टिकट पर जानकारी बिल्कुल परफेक्ट जगह पर प्रिंट हो.
वक्त के साथ भारतीय रेलवे का सिस्टम भी पूरी तरह बदल गया. धीरे-धीरे पुराने और भारी-भरकम डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर्स की जगह बेहद शांत और तेज काम करने वाले थर्मल प्रिंटर्स (Thermal Printers) ने ले ली. इन नए प्रिंटर्स को कागज आगे बढ़ाने के लिए किसी दांत वाले पहिये या छेद की जरूरत नहीं होती, ये रोलर्स के दबाव से काम करते हैं. यही वजह है कि नई तकनीक आते ही टिकटों से वे ऐतिहासिक छेद भी गायब हो गए.
आज भले ही यह तकनीक इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुकी है, लेकिन यह हमारे रेलवे के शानदार और दिलचस्प सफर की एक खूबसूरत गवाह है.
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मैंने लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर वूमन से अपनी ग्रेजुएशन और मिरांडा हाउस से मास्टर्स की डिग्री पूरी की है. पत्रकारिता करियर की शुरुआत दूरदर्शन(2009) से की, जिसके बाद दैनिक भास्कर सहित कई प्रमुख अख़बारों में मेनस्ट्र…और पढ़ें




