भारत में भी ऐसा ही हुआ है। पिछले कुछ सालों से, निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों में स्थायी कर्मचारियों की संख्या कम होती जा रही है, जबकि अस्थायी कर्मचारी बढ़ रहे हैं। इसमें ठेके पर काम करने वाले, प्रवासी, अस्थायी और कैजुअल कर्मचारी शामिल होते हैं।
मुख्यतः बिजली और निर्माण क्षेत्रों में जनवरी से मार्च 2026 के बीच कम-से-कम 28 बड़े हड़ताल और विरोध प्रदर्शन दर्ज किए गए। 2026 में अब तक हुई 28 बड़ी हड़तालें ठेका मजदूरों ने की हैं। उनकी मुख्य मांगें आठ घंटे की शिफ्ट और महीनों से बकाया मजदूरी का भुगतान हैं। ये प्रदर्शन और हड़तालें सरकारी क्षेत्र (पब्लिक सेक्टर) और टाटा, अंबानी और अडानी जैसे बड़े घरानों की निजी कंपनियों, दोनों में हुई हैं।
इनके बारे में आम लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है, क्योंकि मुख्यधारा के मीडिया, क्षेत्रीय मीडिया और यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी इन्हें कवरेज नहीं मिला।
क्या पूरे भारत में फैक्ट्रियों के बंद होने की बढ़ती संख्या के लिए मजदूर जिम्मेदार हैं? कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के संसदीय डेटा से पता चलता है कि 2020–21 और 2024–25 के बीच 2,04,000 से ज्यादा निजी कंपनियां बंद हो गईं। हालांकि, इस रुझान को सीधे तौर पर पुनर्गठन, दिवालियापन और बाजार दबाव से जोड़ा जा सकता है, न कि मजदूरों की अशांति से।





