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अमेरिका में इस वक्त जो खौफनाक हालात बने हैं, उन्होंने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है क्योंकि कभी दूसरों के घरों में विद्रोह की आग देखने वाले राष्ट्रपति ट्रंप आज खुद अपने ही घर में बुरी तरह घिर गए हैं. ‘नो किंग्स’ रैली के नाम पर 90 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतर आए हैं और ट्रंप को ‘राजा’ या ‘तानाशाह’ बताकर उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, जो बिल्कुल वैसा ही मंजर है जैसा अक्सर ईरान की सड़कों पर खामेनेई के खिलाफ देखा जाता रहा है.
अमेरिका में नो-किंग्स रैली
वॉशिंगटन: दुनिया ने कभी नहीं सोचा था कि जिस अमेरिका की मिसाल लोकतंत्र के लिए दी जाती है, वहां के हालात एक दिन ईरान जैसे हो जाएंगे. आज अमेरिका की सड़कों पर ईरान की तरह ही लाखों लोग उतर आए हैं. राष्ट्रपति ट्रंप ने हमेशा ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामेनेई के खिलाफ जिस खौफनाक प्रोटेस्ट को हवा दी थी, ठीक वैसा ही विद्रोह अब ट्रंप के अपने घर में घुस चुका है. ट्रंप को भी वही झेलना पड़ रहा है, जो अमेरिका ने एक वक्त पर खामेनेई को झेलने के लिए मजबूर किया था. अब देखना होगा कि वो ईरान की तरह यहां फोर्स का इस्तेमाल करते हैं या नहीं.
ट्रंप के खिलाफ उतरे लाखों लोग
दरअसल, अमेरिका की सड़कों पर आज ‘नो किंग्स’ का शोर सुनाई दे रहा है. 90 लाख से ज्यादा लोग विद्रोह पर उतर आए हैं, जिनका संदेश साफ है कि अमेरिका को ‘राजा’ नहीं, राष्ट्रपति चाहिए. ट्रंप को काम करने के तरीको को लोग ‘तानाशाही’ का नाम दे रहे हैं. आयोजकों का दावा है कि अमेरिका के इतिहास में शायद ही कभी इतनी बड़ी भीड़ एक साथ सड़कों पर उतरी हो. पूरे देश में 3,100 से ज्यादा कार्यक्रम हुए और हर छोटे-बड़े शहर में ट्रंप के खिलाफ गुस्सा फूट रहा है.
लोग कह रहे हैं कि ट्रंप ने देश को युद्ध की आग में धकेल दिया है और वो अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं. शिकागो से लेकर डेट्रायट तक, सड़कों पर सिर्फ एक ही नारा है ‘जब अन्याय कानून बन जाए, तो बगावत करना फर्ज है.’ यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा हम तेहरान की सड़कों पर देखते आए हैं.
नो किंग्स रैली
नो-किंग्स रैली में अमेरिका का ईरान वाला हाल
इस रैली का नाम ‘नो किंग्स’ इसलिए रखा गया है क्योंकि प्रदर्शनकारियों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप अब राष्ट्रपति की तरह नहीं, बल्कि एक पुराने जमाने के किंग की तरह व्यवहार कर रहे हैं. जनता का पैसा युद्ध में खर्च करना और विरोधियों की आवाज को दबाना, लोगों को ईरान के उस सिस्टम की याद दिला रहा है जिसे अमेरिका हमेशा ‘बुरा’ कहता आया है. ट्रंप को वही कड़वा घूंट पीना पड़ रहा है जो वो दूसरों के लिए तैयार करते थे.
यहां है ‘भूकंप का सेंटर’
इस पूरे आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र मिनेसोटा का सेंट पॉल शहर बना है. यहां 1.5 लाख से ज्यादा लोग इकट्ठा हुए हैं. वजह यह है कि यहां फेडरल एजेंटों ने इमिग्रेशन कानून लागू करते वक्त दो लोगों की जान ले ली थी. इस घटना ने लोगों के सब्र का बांध तोड़ दिया. यहां ब्रूस स्प्रिंगस्टीन जैसे बड़े कलाकार भी जनता के साथ सुर में सुर मिला रहे हैं.
व्हाइट हाउस ने वही किया जिसका डर था
हैरानी की बात ये है कि ट्रंप, वैसा ही बर्ताव कर रहे हैं जिसका डर था. व्हाइट हाउस इन लाखों लोगों की आवाज सुनने के बजाय उनका मजाक उड़ा रहा है. ट्रंप की टीम इसे ‘लेफ्टिस्ट फंडिंग’ का नाम दे रही है. बिल्कुल वैसे ही जैसे दुनिया के तानाशाह अपनी जनता के गुस्से को ‘विदेशी साजिश’ बताकर खारिज कर देते हैं. ये गुस्सा अब सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि ट्रंप के अपने गढ़ यानी ग्रामीण इलाकों और छोटे कस्बों तक फैल चुका है. लोग अब ‘महंगे युद्ध’ से ऊब चुके हैं.
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Utkarsha Shrivastava is a seasoned digital journalist specializing in geo-politics, currently writing for World section of News18 Hindi. With over 10 years of extensive experience in digital media, she has buil…और पढ़ें





