इससे एक बार फिर ‘सत्ता-विरोधी लहर’ की ओर ध्यान जाता है। हालांकि सरकार के प्रति कुछ जगहों पर असंतोष हो सकता है, लेकिन एकजुट विपक्ष के अभाव में, यह असंतोष एक निर्णायक चुनावी ताकत में तब्दील होता नहीं दिखता। इसके बजाय, यह असंतोष कई पार्टियों- जैसे एआईडीएमके, बीजेपी, पीएमके और विजय के राजनीतिक मंच- के बीच बंट जाने की संभावना है; और ये सभी पार्टियां एक ही तरह के मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कोशिश करेंगी। जैसा कि एक अनुभवी विश्लेषक कहते हैं, असंतोष तो मौजूद है, लेकिन इस बात पर कोई सहमति नहीं कि इसका फायदा किसे मिलने जा रहा। और यह डीएमके के पक्ष में जाने वाला सबसे बड़ा फायदा है।
जैसे-जैसे तमिलनाडु चुनावों के करीब पहुंच रहा है, बड़ी तस्वीर में एक असंतुलन दिख रहा है। जैसा कि राजनीतिक विश्लेषक एस. सुंदर राजन ने संक्षेप में कहा है, तमिलनाडु में चुनाव केवल ताकत के बारे में नहीं, बल्कि एकजुटता के बारे में होते हैं। फिलहाल, केवल एक ही पक्ष के पास वह एकजुटता मौजूद है।
जब तक एआईएडीएमके के भीतर और विपक्षी दलों के बीच कोई बड़ा फेरबदल नहीं होता, या किसी नई ताकत के इर्द-गिर्द कोई अप्रत्याशित एकजुटता नहीं बनती, एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली डीएमके के सत्ता में बने रहने की स्थिति मजबूत नजर आ रही है।





