मिडिल ईस्ट से भागा दुनिया का सबसे बड़ा वॉरशिप, ईरान ने तोड़ा अमेरिका का गुरूर, 1 लाख टन का ‘ब्रह्मास्त्र’ फेल


वॉशिंगटन. मिडिल ईस्ट में जंग के बीच अब हालात बदलते दिख रहे हैं. और इसकी सबसे बड़ी निशानी बनकर सामने आया है USS Gerald R. Ford (CVN-78) का पीछे हटना. दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे आधुनिक अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर, जो ईरान के खिलाफ हमलों में अहम भूमिका निभा रहा था, अब ग्रीस के क्रीट स्थित नौसैनिक बेस की ओर लौट गया है. यह वही युद्धपोत है जिसे अमेरिका ने अपनी ‘फायरपावर’ का प्रतीक बनाकर मिडिल ईस्ट में उतारा था, लेकिन अब वही जहाज मरम्मत, थकान और अंदरूनी समस्याओं के कारण पीछे हटता दिख रहा है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 12 मार्च को जहाज में आग लग गई, जिसमें कई सैनिक घायल हुए. इसके अलावा, लंबे समय से चल रही 9 महीने की तैनाती ने क्रू के मनोबल और ऑपरेशनल क्षमता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. यह घटनाक्रम ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जंग को फिलहाल रोकने का आदेश दिया है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह सिर्फ तकनीकी समस्या है या फिर अमेरिका की रणनीतिक थकान का संकेत?

युद्ध के दौरान हजारों हमलों में शामिल यह कैरियर अब खुद समस्याओं से जूझता नजर आ रहा है. और यही वह मोड़ है, जहां ईरान के बढ़ते दबाव और लगातार हमलों के बीच अमेरिका को अपने सबसे ताकतवर हथियार को भी पीछे हटाना पड़ रहा है. रणनीतिक नजरिए से देखें तो यह सिर्फ एक जहाज की वापसी नहीं, बल्कि जंग के रुख में बदलाव का संकेत है. अगर दुनिया का सबसे बड़ा वॉरशिप ही फ्रंटलाइन से हट रहा है, तो यह सीजफायर की ओर बढ़ते दबाव और जमीनी हकीकत दोनों को उजागर करता है.

यूएसएस गेराल्ड फोर्ड के पीछे लौटने के कई मायने हैं:
1. तकनीकी खराबी और मरम्मत: सबसे बड़ा और तात्कालिक कारण जहाज पर लगी आग है. 12 मार्च 2026 को इस एयरक्राफ्ट कैरियर के लॉन्ड्री रूम में भीषण आग लग गई थी, जिसे बुझाने में करीब 30 घंटे लगे. इस आग के कारण चालक दल के रहने की जगह (Sleeping Berths) और अन्य सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचा है. जहाज को गहरे समुद्र से हटाकर क्रीट लाया गया है ताकि वहां करीब एक हफ्ते तक इसकी मरम्मत की जा सके. इसके प्रोपल्शन सिस्टम (इंजन) को कोई नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन क्रू के रहने लायक स्थिति बनाने के लिए यह ब्रेक जरूरी था.

2. ऑपरेशनल दबाव और थकान: यूएसएस गेराल्ड फोर्ड पिछले 9-10 महीनों से लगातार तैनात है (आमतौर पर यह अवधि 6 महीने होती है. ईरान के खिलाफ ‘Operation Epic Fury’ में शामिल होने से पहले यह कैरिबियन में तैनात था. लंबे समय तक समुद्र में रहने और जहाज पर खराब टॉयलेट सिस्टम जैसी तकनीकी समस्याओं के कारण सैनिकों के मनोबल पर असर पड़ने की खबरें हैं. क्रीट में रुकना उन्हें एक छोटा ‘रीसेट’ समय भी देगा.

3. युद्ध की रणनीति में बदलाव: ईरान के साथ जारी सीधे संघर्ष के बीच दुनिया के सबसे बड़े युद्धपोत का पीछे हटना एक “इन्फ्लेक्शन पॉइंट” माना जा रहा है. यह जहाज इजरायल के पास तैनात रहकर एक ‘ढाल’ का काम कर रहा था. इसके हटने से उस क्षेत्र में अमेरिकी वायुशक्ति और मिसाइल डिफेंस में अस्थायी कमी आ सकती है. रिपोर्ट्स के अनुसार, USS George H.W. Bush को इसकी जगह लेने के लिए तैयार किया जा रहा है, ताकि ईरान के खिलाफ अभियान में कोई कमी न आए.

4. क्षेत्रीय संकेत: क्रीट का सूडा बे एक रणनीतिक NATO बेस है. यहां जहाज की मौजूदगी यह दर्शाती है कि अमेरिका जरूरत पड़ने पर भूमध्य सागर (Mediterranean) से भी अपनी ताकत का इस्तेमाल कर सकता है. हालांकि, युद्ध के बीच में इसका मुख्य मोर्चे (Red Sea/Middle East) से पीछे हटना ईरान के लिए एक अवसर या मनोवैज्ञानिक बढ़त के रूप में भी देखा जा सकता है.



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