4.4 C
New York

Why did Smriti Irani lose in Amethi? | अमेठी में स्मृति ईरानी क्यों हार गईं: लोग बोले- 2019 में ‘दीदी’ बनकर जीत गईं; फिर प्रेशर पॉलिटिक्स करने लगीं, हारना तो था ही – Amethi District News

Published:


हाई प्रोफाइल कांग्रेस सीट अमेठी फिर राज्य में है। 2019 में स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को वोट से हराया, 2024 में उनके 3 गुना मार्जिन से खुद हार गईं। स्मृति ईरानी केएल शर्मा को कांग्रेस का प्रमुख उम्मीदवार बता रही थीं, वह चुनाव लड़ रहे हैं।

.

जिन पुराने भाजपाइयों ने उन्हें चुनाव जीता था। स्मृति प्राप्त से किनारा कर बैठिए। चुनाव में बड़े चेहरे तो अमेठी पहुंचे, लेकिन स्थानीय कार्यकर्ता डोर टु डोर प्रचार करने नहीं गए। इसकी वजह स्मृति से निराशा थी। बड़ी हार के कारणों को इस रिपोर्ट में पढ़ें…

गौरीगंज रेलवे स्टेशन के बाहर स्थित होटल पर बैठे लोग।

गौरीगंज रेलवे स्टेशन के बाहर स्थित होटल पर बैठे लोग।

हम अमेठी के गौरीगंज पहुंचे तो लगभग 3 बज चुके थे। सीधे रेलवे स्टेशन पहुंचे, जहां होटल पर कुछ लोगों का जामवाड़ा था। लोग चाय की चुस्कियों के साथ लोकसभा चुनाव की चर्चा कर रहे थे। हमारी मुलाकात महेश सिंह से हुई। वह अमेठी के बड़े लकड़ी उत्पादक हैं। अमेठी में स्मृति ईरानी को चुनाव लड़ने वालों में शामिल कर रहे हैं। कहते हैं- प्रेशर पॉलिटिक्स अमेठी में नहीं जुड़ती है। यहां प्रेम से राजनीति करें। इतने दिन गांधी परिवार के लोग राजनीति करते रहे। स्मृति ईरानी भी 2019 में आए तो बने बनाए गए थे, दबाव में नहीं जीते गए थे। इसलिए दबाव क्यों बना रहे हैं?

भाजपा कार्यकर्ता स्मृति के लिए मैदान में नहीं निकले

दबग हमारी मुलाकात ओपी सिंह से हुई। ओपी सिंह खाटी भाजपाई हैं, लेकिन स्मृति के साथ उनका अनुभव अच्छा नहीं रहा। वह कहती हैं- 2014 में जब स्मृति ईरानी अमेठी में चुनाव लड़ने आईं, तब हमने अपने घर में रहने के लिए जगह दी, लेकिन वह बरसात से कहती हैं कि कोई हमें स्वीकार्य नहीं था। हम लोग के गोदाम में रहते थे। इस तरह की बात से हमारा मन खट्टा हो गया।

वह कहते हैं- हम अकेले नहीं हैं, ऐसे कई कार्यकर्ता हैं। उनके दीदी की दूरियां ख़त्म हो गई। पिछले 2 साल से जिले को बाहरी नेताओं से चलवाया जा रहा था। पता नहीं क्यों…वह हम लोगों पर भरोसा नहीं कर पा रही थीं।

स्थानीय तौर पर मौत को इज्जत नहीं मिली
स्टेशन से थोड़ी दूरी पर जय शंकर मिश्रा की जनरल स्टोर की दुकान है। जय शंकर कहते हैं- इस बार बाहर से आए नेताओं की स्मृति पर ध्यान केंद्रित किया गया। इससे स्थानीय कार्यकर्ता नाराज थे। इन सबकी वजह से ही जो खाटी भाजपाई थे, वे भी छिटक गए। हम भी पुराने भाजपा के वोटर रहे हैं। अबकी बार हमने कांग्रेस को वोट दिया। इसके अलावा भी कई कारण हैं। मुफ्त राशन देने से कोई फायदा नहीं होने वाला है। अगर कोई फैक्ट्री लगाने वालों को नौकरी दी जाए तो उससे सभी का फायदा होगा।
लोग बोले- जीत के ओवर कॉन्फिडेंस में हार गईं यादें
रेलवे स्टेशन पर ही हमारी मुलाकात किट्टू चायवाला से हुई। किट्टू पहले दिल्ली में एक बड़े होटल में शेफ थे, लेकिन लॉकडाउन में नौकरी चली गई। इसलिए अमेठी वापस आये और दो साल पहले रेलवे स्टेशन पर चाय की दुकान चलाने लगे। वह कहते हैं- मेरी दुकान पर शहर का लगभग हर युवा चाय पीने आता है। उनकी बातों को सुनते ही ऐसा लगता है कि उनके अंदर बेरोजगारी बढ़ती जा रही है।

अमेठी के राजा का सम्मान नहीं किया तो जीत कैसे मिलेगी?
गौरीगंज के नगरवा में हमारी मुलाकात आशीष तिवारी और विवेक त्रिपाठी से हुई। दोनों ही अमेठी में भाजपा की हार को मुस्कुराने वाला नहीं बताते। कहते हैं- डॉ संजय सिंह अमेठी के राजा हैं। यहां की जनता के बीच उनका सम्मान है, लेकिन 2022 में जब वह भाजपा के टिकट से चुनाव लड़ना चाहेंगी तो उन्हें हरा दिया जाएगा। तब यह नहीं सोचा गया कि आपका भी वक्त आएगा। घमंड इतना था कि राजा संजय सिंह का समर्थन मांगना भी उचित नहीं समझा गया।

छुट्टा पशु, बेरोजगारी-महंगाई ने लगाया नुकसान पर आखिरी मुहर
चुनाव से पहले स्मृति ईरानी ने गौरीगंज के मेदनमवाई में अपना घर बनाया। जनता का दिल जीतने के लिए खुद को अमेठी का निवासी बताया। उसी मेदनमवाई क्षेत्र में हमारी मेहत महादेव मौर्या से हुई। महादेव मौर्या ने यह नहीं बताया कि किसे वोट दिया? लेकिन वह कहती हैं- हम किसान लोग हैं, छुट्टा टूटने की वजह से हमारे पास खाने को नहीं बचाया जा सकता। हमारा बेटा बी फार्मा किया हुआ है, लेकिन उसे नौकरी नहीं मिल रही है। सबसे निराशाजनक था। कोई सुनवाई नहीं होती है।

अब पार्टी कार्यकर्ताओं का हाल…

कांग्रेस कार्यालय: जिला प्रवक्ता बोले- कांग्रेस का चुनाव जनता ने लड़ाई
गौरीगंज में घुसते ही थोड़ी दूरी पर कांग्रेस काउच बना हुआ है। बड़े सेवार्थी में घुसते ही सबसे पहले राहुल गांधी का कटआउट नजर आया। चुनाव के बाद यहां चहल-पहल बढ़ गई है। यहां हमारी मुलाकात पार्टी के जिला प्रवक्ता अनिल सिंह से हुई। वह बताते हैं- हजारों दिल्ली चले गए हैं। कुछ लोग बचे हैं। जहां पहले सन्नाटा पसरा रहता था, अब वहीं थोड़ी चहल-पहल है। लोग आने-जाने लगे हैं।

वहीं हमारी मुलाकात गौरीगंज ब्लॉक के कांग्रेस नगर अध्यक्ष अवनीश मिश्रा से हुई। वह कहते हैं- जो कांग्रेसी पिछले बार भाजपा में चले गए थे। अपनी वार्षिक से नाराज थे। वे खुद सामने नहीं आए, लेकिन उन्होंने कांग्रेस को वोट करने के साथ ही और लोगों से वोट दिलवाए। स्मृति ईरानी थीं तो महिलाएं लेकिन इतना आतंक हो गया था, जिसका कोई जवाब नहीं। उनके हॉल में कोई किसी काम के पूरा न होने का सवाल उठता है तो उसका ऊपर मुकदमा करवा देता है। भरी सभा में बातें थीं कि कांग्रेस का गुंडा है, इसलिए लोग परेशान थे। इसी वजह से वोट देकर कांग्रेस को जिता दिया गया।

भाजपा कार्यालय: स्मृति-मोदी के कटआउट, लेकिन सन्नाटा पसरा दिखा
कांग्रेस कार्यालय से लगभग 5 किमी की दूरी पर भाजपा कार्यालय है। जब हम वहां पहुंचे तो पूरे कार्यालय पर स्मृति ईरानी और मोदी के कटआउट लगे मिले। लेकिन कार्यालय के अंदर सन्नाटा दिखा। अंदर जाने पर ढकोसला हॉल में दो से तीन लोग मिले, जो टीवी देख रहे थे। साथ ही साथ दिल्ली में सरकार बनने को लेकर जो उठा-पटक हो रही है, उस पर बहस कर रहे थे।

अमेठी का भाजपा कार्यालय

अमेठी का भाजपा कार्यालय

हाल ही में हमारी मुलाकात भाजपा के किसान मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष सूर्य नारायण तिवारी से हुई। वह कहते हैं- जो भाजपा का कैडर वोट है, वह हमें मिला है। लेकिन हमें जो गलती हुई वह प्रकाशित वोटों को लेकर हुई। हम लोगों को लग रहा था कि वे पात्र हैं। ऐसे में वे कहीं नहीं जाएंगे। लेकिन आपने देखा होगा कि राहुल गांधी अपनी हर मुलाकात में लाल डायरी लेकर चल रहे थे और कह रहे थे कि संविधान खतरे में है। इससे पेपर वोट लामबंद हो गया और उसकी तरफ चला गया।

दबग हमारी मुलाकात अरुण कुमार मिश्रा से हुई। कहते हैं- यह अमेठी की जनता की भूल है। वह पछताएंगे। वह ऐसे सांसद थे, जो जनता के बीच रहते थे। केल शर्मा वही हैं, जब लोग उनके पास काम लेकर जाते थे तो उनके सामने ही उनकी चिट्ठी डस्टबिन में डाल देते थे। क्या स्मृति चुनाव फिर से शुरू होंगे? इस पर सूर्य नारायण कहते हैं- बिल्कुल, हम सब विश्लेषण कर रहे हैं। संगठन को फिर से मजबूत करेंगे और अगला चुनाव लड़ेंगी और जीतेंगी।

जनता से बातचीत के बाद स्मृति ईरानी की हार के 3 कारण समझ में आए…

कारण 1. बाहरी नेताओं के आने से कार्यकर्ता नाराज हुए
चुनाव से पहले स्मृति ईरानी ने टीम को मजबूत करने के लिए अमेठी से सपा विधायक गायत्री देवी की पत्नी महाराजी देवी को पार्टी में ले लिया। गौरीगंज से सपा विधायक राकेश सिंह भी पार्टी में आ गए। सबसे पहले महाराजी देवी के आने से डॉ. संजय सिंह नाराज हुए तो उन्होंने पूरे चुनाव में चुप्पी साध ली। साथ ही जो भाजपाई अमेठी या गौरीगंज विधानसभा से भविष्य में चुनाव लड़ना चाहते थे, उन्हें लगा कि अब भाजपा को आगे बढ़ावा मिलेगा। ऐसे में उन लोगों ने भी दूरी बना ली।

कारण 2. सूखे की बदतर स्थिति
पिछले एक साल से कार्यकर्ता स्मृति और उनकी टीम से नाराज चल रहे थे। जो भी कार्यकर्ता जमीनी हालातों में रहता है, तो उसे दंतेवाड़ा भगा दिया जाता है। कोई काम होने पर कई बार आवेदन दी जाती, लेकिन काम नहीं हो पाता था।

कारण 3. हानिकारक अभियान का असर भी हुआ
2019 में स्मृति ईरानी सांसद बन गई लेकिन पूरे पांच साल तक वह राहुल गांधी को ही कहने में लगी रहीं। जब राहुल ने सीट बदली तो जनता के सामने उन्हें भगोड़ा साबित करने में लग गईं। मतदान से पहले कांग्रेस अध्यक्ष दीपक सिंह पर मुकदमा दायर करने को लेकर भी अमेठी के लोगों को आड़े हाथों लिया गया।

पॉलिटिकल एक्सपोर्ट्स
अमेठी में भाजपा के हारने के फैक्टर क्या हैं?

इस सवाल को लेकर हम वरिष्ठ पत्रकार शीतला प्रसाद मिश्रा के पास पहुंचे। उन्होंने बताया- भाजपा ने संगठन स्तर पर पढ़ाई नहीं की थी। वह उदाहरण देते हुए समझाते हैं, सर्वणवा बूथ पर भाजपा को 2 वोट मिले। जबकि एक बूथ पर पन्ना प्रमुख से लेकर तमाम लोगों को भाजपा लगती है। स्मृति ईरानी ने चुनाव से पहले जनसंवाद यात्रा भी निकाली। वह अधिकारियों के साथ कहाँ जाती थीं। अवसर पर समस्याओं का निवारण भी किया गया। लेकिन कुछ लोगों की समस्या का निवारण नहीं हुआ होगा तो वे नाराज होंगे।

भाजपा की परंपरागत सीट नहीं है अमेठी
अमेठी के पत्रकार चिंतामणि मिश्रा कहते हैं- अमेठी भाजपा की पारंपरिक सीट नहीं है। इसके बावजूद अमेठी को जीतने के लिए अगर कहें कि कांग्रेस ने 5 साल से तैयारी की तो ऐसा नहीं है। चुनाव से 15 से 20 दिन पहले एक स्ट्रेटजी प्लान की गई। जिसमें राहुल को रायबरेली से अचानक कैंडिडेट बनाया गया। अमेठी से केल शर्मा को उतारा गया। यहां प्रियंका गांधी और कांग्रेस के स्मृति ईरानी के खिलाफ एक नकारात्मक माहौल तैयार किया गया है। जिससे चुनाव स्मृति के खिलाफ चला गया। किशोरी लाल सिर्फ एक चेहरा थे। यहां से राहुल या प्रियंका गांधी के अलावा कांग्रेस का कोई भी चेहरा चुनाव लड़ता तो जीत जाता। क्योंकि जनता का शाखा गांधी परिवार से है। वह अपने कैंपेन से नाराज थी।



Source link

Related articles

spot_img

Recent articles

spot_img