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US Iran Peace Talks: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दावा कर रहे हैं कि ईरान के साथ जारी युद्ध को खत्म करने की बातचीत ‘बहुत अच्छी’ चल रही है. उन्होंने मध्यस्थों के जरिए ईरान को 15 मांगों की एक लिस्ट भेजी है. हालांकि, व्हाइट हाउस इस प्रस्ताव की बारीकियों पर चुप्पी साधे हुए है. दूसरी तरफ, ईरान ने साफ कर दिया है कि ऐसी कोई ठोस चर्चा नहीं हो रही है. ईरान के अधिकारियों ने ट्रंप की इन शर्तों को ‘अत्यधिक’ और ‘अनुचित’ करार दिया है. उनका कहना है कि यह प्रस्ताव सिर्फ अमेरिका और इजरायल के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया है. रक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ट्रंप की यह कूटनीति सफल होना मुश्किल है, क्योंकि युद्ध के मैदान में फिलहाल ईरान का पलड़ा भारी नजर आ रहा है.
मिडिल ईस्ट मामलों के जानकारों का मानना है कि अमेरिका जिस सफलता का ढोल पीट रहा है, वह हकीकत से कोसों दूर है. युद्ध शुरू हुए एक महीना बीत चुका है और सैन्य रूप से इसका कोई समाधान निकलता नहीं दिख रहा है. ईरान को लगता है कि वह फायदे की स्थिति में है, इसलिए वह किसी भी समझौते को ‘आत्मसमर्पण’ की तरह देख रहा है. किंग कॉलेज लंदन के सीनियर लेक्चरर एंड्रियास क्रेग के अनुसार, दोनों देशों के बीच भरोसे की भारी कमी है. ट्रंप के पास अब युद्ध से बाहर निकलने का कोई सैन्य विकल्प नहीं बचा है. यही वजह है कि ईरान को लग रहा है कि अमेरिका दबाव में आकर ये प्रस्ताव दे रहा है. (AI Photo)

अभी तक व्हाइट हाउस ने आधिकारिक तौर पर इस प्लान का खुलासा नहीं किया है, लेकिन लीक हुई रिपोर्ट्स चौंकाने वाली हैं. इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कड़े प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है. प्रस्ताव के अनुसार, ईरान को नतांज, इस्फ़हान और फोर्डो में अपने परमाणु ठिकानों को पूरी तरह खत्म करना होगा. साथ ही, संयुक्त राष्ट्र की परमाणु एजेंसी (IAEA) को इन ठिकानों की निगरानी का पूरा अधिकार देना होगा. इसके बदले में अमेरिका ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाने और उसे नागरिक परमाणु ऊर्जा उद्योग विकसित करने में मदद करने का लालच दे रहा है. इसमें 30 दिनों के युद्धविराम और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने का प्रस्ताव भी शामिल है. (Reuters Photo)

विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप का यह नया प्लान 2015 के ‘जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन’ (JCPOA) से बहुत अलग और ज्यादा सख्त है. 2015 का समझौता केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित था, लेकिन ट्रंप का 15 पॉइंट प्लान ईरान की मिसाइल शक्ति और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को खत्म करने पर केंद्रित है. डॉ. बुर्के ओज़सेलिक के अनुसार, यह पुरानी शर्तों को नए पैकेट में पेश करने जैसा है, जिसे तेहरान पहले ही ठुकरा चुका है. ट्रंप ने 2018 में यह कहते हुए पुरानी डील से हाथ खींच लिए थे कि वह ईरान को रोकने में नाकाम रही. अब वह जो मांगें रख रहे हैं, वे ईरान की सैन्य संप्रभुता पर सीधा हमला हैं. (Reuters Photo)
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ईरान की ओर से कड़ा रुख अपनाने की सबसे बड़ी वजह उसकी ‘असिमेट्रिक वॉरफेयर’ यानी छापामार युद्ध की ताकत है. ईरान ने दिखाया है कि वह वैश्विक बाजार और तेल सप्लाई को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. ‘यूनाइटेड अगेंस्ट न्यूक्लियर ईरान’ के पॉलिसी डायरेक्टर जेसन एम. ब्रोड्स्की कहते हैं कि ईरान को लगता है कि वह जीत रहा है. उसे लग रहा है कि अगर उसने अभी शर्तें मान लीं, तो यह उसकी कमजोरी मानी जाएगी. ईरान इस समय अपनी पकड़ और मजबूत करना चाहता है ताकि वह बातचीत की मेज पर अपनी शर्तें मनवा सके. (Reuters Photo)

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह ट्रंप का पुराना ‘नेगोशिएशन टैक्टिक’ हो सकता है. वे पहले बहुत कठिन शर्तें रखते हैं और फिर धीरे-धीरे उनमें ढील देकर समझौता करते हैं. हालांकि, इस बार चुनौती बड़ी है क्योंकि ईरान का दर्द सहने की क्षमता अमेरिका से कहीं ज्यादा है. अमेरिका के पास सैन्य बढ़त बनाने के मौके कम होते जा रहे हैं. (Reuters Photo)

अगर यह 15 सूत्रीय योजना विफल होती है, तो खाड़ी क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है. दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या ट्रंप अपनी जिद छोड़ेंगे या ईरान समझौते के लिए थोड़ा लचीला रुख अपनाएगा. (Reuters Photo)





