ईरान में बगावत की उम्‍मीद पाले बैठे थे ट्रंप, अपने ही देश में सड़कों पर उतरे 90 लाख लोग, 3200 जगहों पर प्रदर्शन


ईरान में तख्तापलट और बगावत का ख्वाब संजोए बैठे राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप को अपने ही देश में करारा झटका लगा है. ‘नो किंग्स’ आंदोलन के तहत अमेरिका की 3,200 जगहों पर 90 लाख लोग सड़कों पर उतर आए. तानाशाही रवैये और युद्ध नीतियों के खिलाफ भड़का यह आक्रोश अब ट्रंप की कुर्सी के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के खिलाफ जन-आक्रोश की एक नई लहर देखने को मिली है. शनिवार को अमेरिका के सभी 50 राज्यों सहित दुनिया के कई प्रमुख शहरों में नो किंग्स (No Kings) विरोध प्रदर्शन हुए. आयोजकों का दावा है कि यह अमेरिकी इतिहास के सबसे बड़े विरोध प्रदर्शनों में से एक है.

सड़कों पर क्यों उतरा जनसैलाब?
इस बार के प्रदर्शनों के केंद्र में तीन मुख्य मुद्दे रहे:

1. ईरान के साथ युद्ध: पिछले चार हफ्तों से ईरान के साथ चल रहे सैन्य संघर्ष और अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप का कड़ा विरोध.

2. कठोर इमिग्रेशन नीतियां: विशेष रूप से मिनेसोटा में संघीय एजेंटों द्वारा रेनी गुड और एलेक्स प्रेटी की मौत के बाद गुस्सा चरम पर है.

3. लोकतांत्रिक संस्थाओं पर खतरा: प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि ट्रंप प्रशासन निरंकुश तरीके से काम कर रहा है और संवैधानिक मर्यादाओं को चुनौती दे रहा है.

न्यूयॉर्क से न्यूजर्सी तक प्रदर्शन
यह आंदोलन केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहा. रॉयटर्स के अनुसार, देशभर में 3,200 से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए गए.

· न्यूयॉर्क: टाइम्स स्क्वायर पर हजारों की भीड़ ने लोकतंत्र बचाओ के नारे लगाए.

· मिनेसोटा: यह विरोध का प्रतीकात्मक केंद्र बना. यहां रॉक स्टार ब्रूस स्प्रिंगस्टीन ने “Streets of Minneapolis” गाना गाकर उन लोगों को श्रद्धांजलि दी जो अप्रवासन कार्रवाई में मारे गए थे.

· न्यूजर्सी: यहां के समृद्ध उपनगरीय इलाकों (Suburbs) में भी ‘सॉकर मॉम्स’ और कामकाजी वर्ग सड़कों पर उतरा जो पारंपरिक रूप से राजनीति से दूर रहते थे.

सवाल-जवाब
“नो किंग्स” (No Kings) आंदोलन का मुख्य संदेश क्या है?

इस आंदोलन का नाम ही इसके उद्देश्य को स्पष्ट करता है—”कोई राजा नहीं”. प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति ट्रंप की ‘कार्यकारी शक्तियों’ के बढ़ते उपयोग को राजशाही के समान मानते हैं. उनका तर्क है कि अमेरिका एक लोकतंत्र है जहां कानून सर्वोपरि है न कि कोई व्यक्ति.

क्या इस विरोध प्रदर्शन का राजनीतिक असर पड़ेगा?

निश्चित रूप से. यह प्रदर्शन आगामी मिड-टर्म चुनावों से पहले हो रहे हैं. न्यूजर्सी जैसे राज्यों में, जहां रिपब्लिकन मजबूत थे अब मतदाता डेमोक्रेटिक झुकाव दिखा रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि उपनगरीय क्षेत्रों में बढ़ता यह आक्रोश कांग्रेस पर रिपब्लिकन नियंत्रण को खत्म कर सकता है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस प्रदर्शन का क्या महत्व है?

लंदन, पेरिस और रोम जैसे शहरों में भी ट्रंप विरोधी रैलियां हुईं. यह दर्शाता है कि अमेरिकी विदेश नीति (खासकर ईरान युद्ध) को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता और विरोध बढ़ रहा है. दुनिया भर के लोग दक्षिणपंथी राजनीति के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं.

ट्रंप प्रशासन आंदोलनों को बता रहा एजेंडा
जहां एक ओर डेमोक्रेटिक सीनेटर बर्नी सैंडर्स और मिनेसोटा के गवर्नर टिम वाल्ज़ ने इन प्रदर्शनों को लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत बताया, वहीं व्हाइट हाउस ने इसे राजनीति से प्रेरित करार दिया है. लॉस एंजिल्स जैसे कुछ स्थानों पर झड़पें भी हुईं जहां पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया लेकिन कुल मिलाकर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा.



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