Trump Iran War Oil Prices : ट्रंप की ‘सबसे बड़ी भूल’ साबित हो रही ईरान को झुकाने की जिद! 120 डॉलर पहुंचा क्रूड ऑयल, दुनिया झेल पाएगी $200 का झटका


होमदुनियाअमेरिका

जो सोचा, वो हुआ नहीं… ईरान को झुकाने की जिद में ट्रंप ने कर दी सबसे बड़ी भूल!

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Iran War Fallout Oil Prices: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की जिद ने दुनिया को तेल संकट में डाल दिया है. उन्होंने ईरान के साथ संघर्ष के बीच वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ने वाले असर को काफी कम करके आंका. नतीजा यह रहा कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी कर दी. फिर ऊर्जा ठिकानों पर हमलों ने सप्लाई चेन को तोड़ दिया. 20% वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित होने से ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर के पार पहुंच गया है.

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ईरान से जंग का असर भांपने में चूक गए डोनाल्ड ट्रंप! (Photos : Reuters)

वाशिंगटन: डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सैन्य मोर्चा खोलकर एक बड़ी राजनीतिक बिसात बिछाई थी. उनका मानना था कि ईरान पर किए गए हमले सीमित रहेंगे और इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में कोई बड़ा तूफान नहीं आएगा. ट्रंप प्रशासन का आकलन था कि अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक है, इसलिए वह किसी भी झटके को झेल लेगा. लेकिन जमीनी हकीकत ट्रंप के इस भरोसे से बिल्कुल अलग और डरावनी साबित हो रही है. ईरान ने जवाबी कार्रवाई के तौर पर दुनिया की सबसे संवेदनशील रग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर हाथ रख दिया है. इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह चरमरा गई है. ट्रंप ने जिस खतरे को छोटा समझा था, वह अब एक वैश्विक आर्थिक मंदी की आहट बन चुका है.

कैसे होर्मुज की नाकेबंदी ने बिगाड़ दिया ट्रंप का सारा खेल?

ईरान युद्ध का सबसे घातक असर ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर पड़ा है, जिसे दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग माना जाता है. ईरान ने इस समुद्री रास्ते से होने वाले शिपिंग ट्रैफिक को लगभग ठप कर दिया है. आपको बता दें कि दुनिया के कुल तेल ट्रांसपोर्ट का करीब 20% हिस्सा इसी संकरे रास्ते से गुजरता है. ट्रंप को उम्मीद थी कि ईरान खुद के आर्थिक नुकसान के डर से ऐसा कदम नहीं उठाएगा. लेकिन ईरान ने इसे अपनी युद्धक रणनीति का मुख्य हिस्सा बना लिया है. इसके परिणाम स्वरूप ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें रॉकेट की तरह बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं. यह सप्लाई शॉक इतना बड़ा है कि बाजार में हाहाकार मचा हुआ है.

ऊर्जा ठिकानों पर हमलों से कैसे टूटा निवेशकों का भरोसा?

इजरायल और ईरान के बीच जारी सीधी जंग अब तेल और गैस के कुओं तक पहुंच गई है. दोनों देशों ने एक-दूसरे के महत्वपूर्ण ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया है. मिडिल ईस्ट की इस तबाही ने वैश्विक तेल सप्लाई में भारी अस्थिरता पैदा कर दी है. ट्रंप प्रशासन लगातार बयानबाजी करके बाजार को शांत करने की कोशिश कर रहा है. लेकिन निवेशकों और ट्रेडर्स के बीच डर का माहौल है क्योंकि सप्लाई का कोई वैकल्पिक रास्ता नजर नहीं आ रहा है. जब तक ऊर्जा ठिकानों पर मिसाइलें गिरती रहेंगी, तब तक तेल की कीमतों को काबू करना नामुमकिन नजर आता है.

महंगाई और घरेलू राजनीति के बीच कैसे फंसे राष्ट्रपति ट्रंप?

ट्रंप इस समय एक ऐसी दुविधा में हैं जहां एक तरफ सैन्य साख है और दूसरी तरफ देश की अर्थव्यवस्था. उन्होंने सोशल मीडिया पर दावा किया कि तेल की बढ़ती कीमतें ‘शासन परिवर्तन’ के लिए चुकाई जाने वाली एक छोटी सी कीमत है. लेकिन हकीकत यह है कि अमेरिका के भीतर ईंधन के दाम बढ़ने से जनता में नाराजगी बढ़ रही है. बढ़ती तेल कीमतें सीधे तौर पर महंगाई (Inflation) को न्योता दे रही हैं. अगर यह सिलसिला जारी रहा तो शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आ सकती है. भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए भी यह स्थिति किसी बुरे सपने से कम नहीं है क्योंकि इससे उनके विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव पड़ रहा है.

क्या ट्रंप की असंगत रणनीति वैश्विक मंदी का कारण बनेगी?

विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप की रणनीति में स्पष्टता की कमी है. कई बार ऐसा लगा कि ट्रंप इजरायल की कुछ सैन्य कार्रवाइयों से पूरी तरह वाकिफ नहीं थे. इससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिकी नेतृत्व की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हुए हैं. स्पेन जैसे सहयोगियों ने अपने सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की अनुमति देने से मना कर दिया है. अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो यह केवल मिडिल ईस्ट का संघर्ष नहीं रहेगा. यह एक ऐसा वैश्विक ऊर्जा संकट बन जाएगा जो दुनिया को बड़ी आर्थिक मंदी की ओर धकेल सकता है. ट्रंप का शुरुआती आकलन अब उनकी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है.

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Deepak Verma

दीपक वर्मा (Deepak Verma) एक पत्रकार हैं जो मुख्‍य रूप से विज्ञान, राजनीति, भारत के आंतरिक घटनाक्रमों और समसामयिक विषयों से जुडी विस्तृत रिपोर्ट्स लिखते हैं. वह News18 हिंदी के डिजिटल न्यूजरूम में डिप्टी न्यूज़…और पढ़ें



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