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डोनाल्ड ट्रंप ने जब से अमेरिका की कमान दूसरी बार संभाली है, वे सिर्फ और सिर्फ युद्ध की बात कर रहे हैं. अमेरिकी प्रशासन ने क्यूबा को अमेरिका की आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले देशों की सूची में फिर से शामिल कर लिया है और ये सीधा संकेत है कि उनका अगला टार्गेट लॉक हो चुका है. आखिर डोनाल्ड ट्रंप के रडार पर ये आइलैंड क्यों है?
क्यूबा पर क्यों पड़ी अमेरिका की नजर.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने क्यूबा को लेकर अपना रुख और सख्त कर दिया है. उन्होंने क्यूबा को एक नाकाम देश बताया और कहा कि वॉशिंगटन पहले से ही हवाना के साथ बातचीत कर रहा है. ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि आगे या तो कोई समझौता हो सकता है या फिर अमेरिका दूसरी कार्रवाई कर सकता है. एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को लगता है कि क्यूबा समझौता करना चाहता है. हालांकि उन्होंने साफ किया कि फिलहाल ईरान के साथ चल रहा युद्ध अमेरिका की पहली प्राथमिकता है, उसके बाद ही क्यूबा पर कोई बड़ा कदम उठाया जाएगा.
ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है, जब क्यूबा गहरे आर्थिक और ऊर्जा संकट से गुजर रहा है. अमेरिकी दबाव बढ़ने और तेल सप्लाई में रुकावटों ने वहां की हालत और खराब कर दी है. क्यूबा के राष्ट्रपति मिगेल दियाज-कानेल ने भी पुष्टि की है कि अमेरिका के साथ बातचीत चल रही है. उन्होंने उम्मीद जताई कि संवाद से तनाव कम हो सकता है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि क्यूबा अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा. दूसरी ओर वॉशिंगटन का कहना है कि रिश्तों में कोई भी सुधार तभी संभव है, जब क्यूबा बड़े राजनीतिक और आर्थिक बदलाव करे.
क्यों ट्रंप के निशाने पर आया क्यूबा?
ट्रंप के बयान के बाद यह सवाल उठ रहा है कि ईरान के बाद अब क्यूबा अचानक अमेरिका के रणनीतिक निशाने पर क्यों आ गया है, जबकि अमेरिका पहले से ही मध्य पूर्व संकट में उलझा हुआ है. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर ऐसा क्यों हुआ होगा –
- क्यूबा पहले से ही अमेरिकी दबाव में रहा है. ट्रंप प्रशासन ने क्यूबा को फिर से अमेरिका की आतंकवाद पालने वाले देशों की सूची में डाल दिया. इस फैसले के बाद क्यूबा पर अपने आप सख्त पाबंदियां लागू हो गईं और उसकी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पहुंच सीमित हो गई. इसके अलावा वॉशिंगटन ने व्यापार, यात्रा और वित्तीय लेन-देन पर भी पाबंदियां कड़ी कर दीं, इससे क्यूबा की अर्थव्यवस्था और ज्यादा अलग-थलग पड़ गई. इससे अमेरिका उस पर दबाव बढ़ा रहा है.
- अमेरिका की यह रणनीति क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार से राजनीतिक और आर्थिक रियायतें लेने की बड़ी कोशिश का हिस्सा मानी जा रही है. प्रतिबंध बढ़ाकर और आर्थिक सहारे काटकर वॉशिंगटन क्यूबा की सरकार को कमजोर करना चाहता है, ताकि अंदरूनी दबाव बढ़े और सुधारों की मांग तेज हो. क्यूबा पहले ही ईंधन, खाद्य सामग्री और बिजली की भारी कमी से जूझ रहा है. ऐसे में पर्यवेक्षकों का कहना है कि अमेरिका शायद इस कमजोर स्थिति का फायदा उठाकर हवाना को वार्ता के लिए झुकाना चाहता है.
- क्यूबा का गहरा आर्थिक संकट भी एक बड़ी वजह है. देश सबसे खराब आर्थिक दौर से गुजर रहा है और वहां लंबे समय से ईंधन की कमी, घंटों की बिजली कटौती, खाने-पीने की चीजों और दवाओं की भारी कमी बनी हुई है. तेल आपूर्ति में कमी और अमेरिकी प्रतिबंधों ने हालात और खराब कर दिए हैं, इसका असर आम लोगों की जिंदगी पर साफ दिख रहा है.
- इन बिगड़ती परिस्थितियों की वजह से क्यूबा में समय-समय पर प्रदर्शन भी हुए हैं और जनता की नाराजगी बढ़ी है. इससे राष्ट्रपति मिगेल दियाज-कानेल की सरकार पर दबाव और बढ़ा है. हवाना के आलोचकों का मानना है कि अमेरिका मौजूदा हालात को एक अवसर की तरह देख रहा है, ताकि क्यूबा से रियायतें ली जा सकें या राजनीतिक बदलाव के लिए दबाव बनाया जा सके. ट्रंप कई बार कह चुके हैं कि क्यूबा की मौजूदा सरकार व्यवस्था को संभालने के लिए संघर्ष कर रही है और आर्थिक दबाव उसे आखिरकार अमेरिकी शर्तों पर बातचीत करने को मजबूर कर सकता है.
- अमेरिका क्यूबा को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क भी देता है. ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि क्यूबा के सुरक्षा और खुफिया संबंध अमेरिका के कई विरोधी देशों से हैं, जो अमेरिकी हितों के लिए रणनीतिक खतरा पैदा कर सकते हैं. फ्लोरिडा से सिर्फ करीब 150 किलोमीटर दूर स्थित क्यूबा को वॉशिंगटन लंबे समय से सुरक्षा नजरिये से देखता रहा है.
अमेरिका से क्यूबा के रिश्ते कैसे?
क्यूबा लंबे समय से उन सरकारों के करीब रहा है, जो अमेरिका की नीतियों की आलोचक रही हैं. खासकर वेनेजुएला के साथ उसके गहरे राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंध हैं. हवाना और कराकास दशकों से एक-दूसरे का समर्थन करते आए हैं और क्षेत्र में अमेरिकी नीतियों का विरोध करते रहे हैं. इसी वजह से वॉशिंगटन के नीति-निर्माता अक्सर क्यूबा को लैटिन अमेरिका में एंटी-अमेरिका धड़े का अहम स्तंभ मानते हैं. ऐसे में क्यूबा पर दबाव बढ़ाना उस नेटवर्क को कमजोर करने और अमेरिका का प्रभाव फिर से मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जाता है.
क्यूबा-अमेरिका के बीच ऐतिहासिक है तनाव
क्यूबा और अमेरिका के रिश्तों का तनाव नया नहीं है. इसकी शुरुआत कोल्ड वॉर के दौर से होती है, जब 1959 की क्यूबा क्रांति के बाद फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में यह देश तेजी से सोवियत खेमे की ओर झुक गया. क्रांति से पहले क्यूबा के अमेरिका से करीबी राजनीतिक और आर्थिक संबंध थे, लेकिन कास्त्रो के सत्ता में आने के बाद समाजवादी सुधार लागू हुए और अमेरिकी कंपनियों की संपत्तियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया. यही वजह थी कि दोनों देशों के रिश्ते तेजी से बिगड़ गए. जवाब में अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंध और कूटनीतिक अलगाव की नीति अपनाई, जिसने दशकों की दुश्मनी की नींव रखी. ये तनाव 1962 में क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान चरम पर पहुंच गया, जब सोवियत संघ ने गुप्त रूप से क्यूबा में परमाणु मिसाइलें तैनात कर दीं. इस खुलासे के बाद दुनिया परमाणु युद्ध के कगार पर पहुंच गई और अमेरिका ने क्यूबा के चारों तरफ नौसैनिक घेराबंदी करके मिसाइलें हटाने को कहा. आखिरकार अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी और सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव के बीच बातचीत से संकट टल गया, लेकिन इस घटना ने क्यूबा को हमेशा के लिए वॉशिंगटन और उसके विरोधियों के बीच टकराव का केंद्र बना दिया.
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News18 में इंटरनेशनल डेस्क पर कार्यरत हैं. टीवी पत्रकारिता का भी अनुभव है और इससे पहले Zee Media Ltd. में कार्य किया. डिजिटल वीडियो प्रोडक्शन की जानकारी है. टीवी पत्रकारिता के दौरान कला-साहित्य के साथ-साथ अंतरर…और पढ़ें





