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गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जो बीएलओ मेंटल या हेल्थ हेल्थ की वजह से सर का काम नहीं कर रहे हैं उनकी जगह राज्यों में दूसरे बीएलओ की नियुक्ति की जानी चाहिए। त्रिपुरा, 9 राज्यों में एसआईआर यानी स्पेशन इंटेंसिव रिविजन जारी है। इस बीच कई राज्यों से बीएलओ की मौत की खबरें आ रही हैं। ऐसे में बीएलओ पर काम के भारी दबाव को लेकर लगातार सवाल उठते रहते हैं।
इस मामले में टेम्प्लेट की पॉलिटिकल पार्टी टीवीके ने एक याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया है कि बीएलओ पर काम के भारी दबाव के बावजूद इलेक्शन कमीशन ने इन पर केस दर्ज किया है। कई बीएलओ ने कथित तौर पर काम के दबाव में हत्या की भी शिकायत की है।

बीएलओ का काम किसको चाहिए यह राज्य सरकार का फैसला- SC
कोर्ट ने कहा कि इलेक्शन कमीशन से यह फैसला नहीं लिया जा सकता कि बीएलओ का काम कौन करेगा। यह राज्य सरकार सुनिश्चित करती है कि जिन लोगों को बीएलओ की ड्यूटी दी गई है, वे लोग काम करने के लिए फिट हैं या नहीं। एक बार राज्य सरकार के ओर से कर्मचारियों को इलेक्शन कमीशन दे दिया जाए, तो बाद में वो काम करने के लिए बाधित हो जाते हैं।
उन्हें दूसरे राज्यों में वैसे नहीं भेजा जा रहा था, जैसा पहले हुआ था। अगर कुछ कर्मचारियों को एसआईआर के काम करने में दिक्कत आ रही है तो राज्य सरकार को उनकी जगह दूसरे कर्मचारियों को ले जाना चाहिए।

9 ठेकेदारों में शुरू हुई एसआईआर, 26 बीएलओ ने दी जान दी
27 अक्टूबर को चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश समेत 9 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के उपयोग की घोषणा की। 9 राज्यों यानी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, गोवा, तमिलनाडु, केरल और गुजरात के 3 केंद्र उपयोगकर्ता सहयोगी यानी निकोबार, लक्षद्वीप और पुडुचेरी में 4 नवंबर से प्रक्रिया शुरू हो गई है। गणना पत्र यानी फॉर्म लेटर, जमा करने और उन्हें डिजिटली अपलोड करने के लिए दिसंबर तक का समय दिया गया है। हालांकि रविवार को एसआईआर की प्रक्रिया पूरी करने की समय सीमा 7 दिन से बढ़ा दी गई है। बीएलओ यानी लेवल ऑफिसर्स को घर-घर बेचने की यह प्रक्रिया पूरी तरह से की जाती है।
गाँव से 8-10 कि.मी. दूर कर्तव्य, स्कूल खाली
उत्तर प्रदेश में काम कर रहे बीएलओ का काम 2003 की वोटर लिस्ट से 2025 की वोटर लिस्ट से मिलान करने का है। इसके अलावा युवा और घर की बहुएं जो 2025 की लिस्ट में हैं और 2003 की लिस्ट में नहीं थीं, उनकी भी पहचान होनी है।
कुछ शिक्षक जो बीएलओ पर काम कर रहे हैं, उन्होंने बताया, ‘जिस गांव में हमारी ड्यूटी होती है, वहां के बच्चों के माध्यम से हम उनके रिश्तेदारों को जानते हैं। इस तरह की वनस्पति और सामाजिक स्थिति के बारे में भी पता चलता है। ऐसे में जब सर्वे का काम हमें दिया जाता है तो आसानी से हो जाता है। लेकिन इस बार हमारी ड्यूटी की जगह पर 8-10 किमी दूर बीएलओ की नियुक्ति की गई है। ऐसे में हमारा काम बहुत मुश्किल हो गया है क्योंकि इन जगहों के बारे में हम बहुत कुछ नहीं जानते।’
इसी तरह की संभावनाओं के अलावा बीएलओ को गणना पत्र यानी फॉर्म दिए गए हैं जिन पर नामांकन किया गया है। इनमें कहा गया है कि इन फॉर्म को लोगों को दे दिया जाए और लोगों से जुड़े फॉर्म को कल कल स्कैन कर अपलोड किया जाए। यहां भी है समस्या।
विशेषज्ञों और पढ़े-लिखे लोगों के लिए फॉर्म भरना आसान है, लेकिन जो लोग इसके बारे में ज्यादा नहीं जानते, उनके फॉर्म में एक-एक डिटेल खुद बीएलओ को भरना होता है। कई घरों में फॉर्म और जगह-जगह भी रखा जाता है, जिससे वो चाहत हो जाती है, उसे स्कैन करने की समस्या होती है। ऐसे में बीएलओ का खुद का ही फॉर्म भरना है।

हर दिन 100 फॉर्म का जमा, पूरा न होना पर खतरा
हर बीएलओ को दिन में 100-100 फॉर्म कलेक्ट कर उन्हें डिजिटली अपलोड करने का काम शुरू कर दिया गया, जिसके बीच में 200 फॉर्म भी जमा कर दिए गए। इसके अलावा कई बीएलओ की शिकायत के अलावा यह भी कहा गया है कि उन्हें इस काम के लिए कोई प्रशिक्षण नहीं दिया गया है। फॉर्म को स्कैन करना, डिजिटली अपलोड करना जैसे काम के लिए प्रोपर ट्रेनिंग की जरूरत थी जो नहीं दी गई।
40 से अधिक उम्र के कई लोगों को शुगर और बीपी की बीमारी है। इन सभी के लिए लंबी शिफ्ट में काम करके पूरा करना बहुत मुश्किल है। लेकिन इसके विपरीत भी कोई वैगन नहीं दिया गया है। बीएलओ का आरोप है कि प्रधान या प्रधान सचिव उनकी कोई मदद नहीं करते। एसडीएम के पास जाने पर वो सिर्फ नौकरी से निकालना या केस करना खतरनाक देता है।
उत्तर प्रदेश में टीचर्स की आवाज उठाने वाले बहुजन शिक्षक संघ से जुड़े एक टीचर ने कहा, ‘मेरा छोटा भाई बीएलओ के पर सीधे तौर पर काम कर रहा है। घर की शादी में भी नहीं आ सका। रविवार का दिन भी काम कर रहा है। रात 10-12 बजे उनसे फोन पर अपडेट मांगा जाता है।
सोने की भी चेन नहीं है। समय-समय पर एफआईआर करना और नौकरी से निकलने की धमकी देना। ‘सरकारी कर्मचारियों को नौकरी जाने का डर और भारी दबाव बनाया जाता है।’
उन्होंने आगे बताया कि सर को लेकर न तो लोगों को सलाह दी गई है और न ही बीएलओ को किसी तरह की ट्रेनिंग दी गई है। ऐसे में डॉक्यूमेंट्री डबल हो गया है। कई शिक्षकों को काम समझ में नहीं आ रहा है।
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