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‘Right to Disconnect’ Bill introduced in Lok Sabha | लोकसभा में ‘राइट टू डिस्‍कनेक्‍ट’ बिल पेश: ऑफिस के बाद बॉस का फोन न उठाने का हक मिलेगा; 13 देशों में लागू है पॉलिसी

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10 मिनट पहले

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शुक्रवार, 5 दिसंबर को संसदीय दल के अविश्वासियों को एक निजी सदस्य बार बिल (पीएमबी) में पेश किया गया। इस फैक्ट्री का नाम ‘राइट टू डिस्कनेक्ट बिल 2025 (राइट टू डिसकनेक्ट बिल 2025)’ है। इसका उद्देश्य कर्मचारियों को ऑफिस के समय के बाहर काम से संबंधित फोन कॉल और ईमेल का उत्तर देने से छूट दी गई है।

एनसीपी की सांसद सुप्रिया सुले ने यह प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया है। प्राइवेट मेंबर बिल को किसी न्युमिनल (एमपी) द्वारा संसद में पेश किया गया है। ये किसी मंत्री द्वारा पेश नहीं किया गया। भारतीय संसद प्रणाली में किसी न्यूनतम को ‘प्राइवेट मेंबर’ टैब माना जाता है कि जब वह किसी मंत्री पद पर न हो, तो वह सत्य पक्ष का हो या लोकतंत्र का।

आज़ादी के बाद से अब तक केवल 14 निजी सदस्य बिल दोनों सदनों में राष्ट्रपति पद की शपथ ले चुके हैं। वहीं, साल 1970 के बाद से कोई भी पीएमबी दोनों सदनों में शामिल नहीं हुआ।

बिल के अनुसार, कर्मचारी तय ऑफिस समय के बाद काम से संबंधित कॉल, संदेश या ई-मेल का जवाब न देंगे। यदि उनके बॉस द्वारा कंपनी पर दबाव बनाया जाता है, तो संप्रोस्टा (कंपनी या सोसायटी) पर उनके कुल रेन्यूमेरेशन का 1% तक का जुर्माना लगाया जाएगा।

ये बिल दोनों सदनों से पास होने और मोती की शोभा बढ़ाने के लिए कानून बन जाएंगे।

सीए एना सेबेस्टियन की मौत से कूड़ा हुआ था बहस

पिछले साल पुणे में 26 साल की एना सेबेस्टियन पेरिइल की काम के कार्डिएक एरे से डेथ हो गई थी। एना चार्टर्ड अकाउंटेंट थी। ​फरवरी 2024 में एक कंपनी में नौकरी शुरू हुई थी। 6 महीने बाद 20 जुलाई को एना की मौत हो गई।

एना के एक्शनकर्म को उनकी कंपनी से कोई जानकारी नहीं मिल पाई।

एना के एक्शनकर्म को उनकी कंपनी से कोई जानकारी नहीं मिल पाई।

एना की मां एंटोनी ऑगस्टीन ने सितंबर में कंपनी गरीबी राजीव मेमानी को पत्र लिखा था। बताया कि ऑफिस के वर्कशॉप की वजह से एना की जान कैसे गई।

डॉक्टर्स का कहना था कि एना न ठीक से सो रही थी, न समय से खाना खा रही थी, जिसके कारण उसकी जान चली गई। एना की मां ने आरोप लगाया था कि एक प्लांट्रीम वर्कशॉप में एना की जान चली गई थी। इस घटना के बाद ‘राइट टू बेस्ट’ की मांग जोर से लगी थी।

2018 में भी बिल लाया गया था

2018 में भी सांसद सुप्रिया सुले ने ये बिल लाने की कोशिश की थी, लेकिन इस पर चर्चा आगे नहीं बढ़ी पाई थी।

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