इस्लामाबाद: पाकिस्तान की राजधानी में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कुछ देर में शुरू होगी. सीएनएन-न्यूज18 की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बघेर कालिबाफ इस वार्ता का हिस्सा बनने पहुंच चुके हैं. दो दिन पहले आई एडवांस टीमों ने पहले ही जमीन तैयार कर दी थी. अब दोनों देशों के बड़े नेता आमने-सामने हैं. ईरान की सबसे बड़ी मांग लेबनान में सीजफायर को लेकर है. ईरान ने साफ कर दिया है कि अगर अमेरिका लेबनान पर ठोस भरोसा दिलाता है, तो वह यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) के मुद्दे पर पीछे हटने को तैयार है.
क्या लेबनान की शांति के बदले रुकेगा ईरान का परमाणु प्लान?
ईरानी डेलिगेशन ने अमेरिकी टीम को दो टूक लहजे में अपनी प्राथमिकता बता दी है. सूत्रों का कहना है कि ईरान चाहता है कि
लेबनान में जारी हमलों पर तुरंत रोक लगे. इसके बदले में वह अपने परमाणु कार्यक्रम की रफ्तार कम करने के लिए बातचीत कर सकता है. कल हुई शुरुआती बातचीत में अमेरिका और लेबनान के प्रतिनिधियों ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करने का भरोसा दिया है. हालांकि, भारतीय खुफिया सूत्रों का मानना है कि यह बातचीत बहुत लंबी चलने वाली है. इस्लामाबाद समझौते में सभी मुद्दों का एक साथ हल निकलना मुश्किल लग रहा है. पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर और पीएम शहबाज शरीफ इस मौके का फायदा उठाकर पाकिस्तान को एक बड़े मध्यस्थ के तौर पर पेश करना चाहते हैं.
कालिबाफ का आना क्यों माना जा रहा है बड़ी कामयाबी?
शुरुआत में
ईरानी स्पीकर कालिबाफ इस मीटिंग में आने के लिए तैयार नहीं थे. उन्हें अमेरिकियों पर बिल्कुल भरोसा नहीं था. लेकिन उनका
इस्लामाबाद पहुंचना इस बात का संकेत है कि पर्दे के पीछे कुछ बड़ा तय हुआ है. एक तरफ अमेरिका इस वक्त युद्ध खत्म करने के लिए बेताब दिख रहा है. वहीं ईरान अपनी युद्ध क्षमता और हिजबुल्लाह जैसे सहयोगियों के दम पर अमेरिका से कड़ी सौदेबाजी कर रहा है. ईरान का कहना है कि सीजफायर का फायदा उसे कम और अमेरिका को ज्यादा है. वह अपनी ‘बैटलफील्ड रेजिलिएंस’ यानी युद्ध के मैदान में टिके रहने की क्षमता का इस्तेमाल सुरक्षा गारंटियां हासिल करने के लिए कर रहा है.
अरबों डॉलर की ईरानी संपत्ति से कैसे हटेगी पाबंदी?
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने एक ‘गुडविल टेस्ट’ के तौर पर ईरान की जमी हुई संपत्ति को रिलीज करने पर सहमति जताई है. कतर और अन्य विदेशी बैंकों में फंसे इस पैसे को अनलॉक करना शांति समझौते की दिशा में पहला कदम माना जा रहा है. इसके बदले में अमेरिका चाहता है कि ईरान ‘
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज‘ यानी होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों को सुरक्षित निकलने का रास्ता दे. शिप ट्रैकिंग डेटा बता रहा है कि वार्ता शुरू होते ही कई जहाज होर्मुज की तरफ बढ़ने लगे हैं. ईरान इस समुद्री रास्ते पर अपना पूरा कंट्रोल चाहता है और वहां से गुजरने वाले जहाजों से ट्रांजिट फीस वसूलने की जिद पर अड़ा है.
किन 3 मुद्दों पर फंसा हुआ है सबसे बड़ा पेच?
इस्लामाबाद टॉक्स में अभी भी कई ऐसे मुद्दे हैं जहां दोनों पक्ष आमने-सामने हैं. ईरान पिछले छह हफ्तों के युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा मांग रहा है. दूसरी तरफ, अमेरिका और इजरायल चाहते हैं कि ईरान अपनी मिसाइल क्षमता को पूरी तरह खत्म करे. ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता का मामला बताते हुए चर्चा से इनकार कर दिया है. ट्रंप प्रशासन ने पहले ही चेतावनी दी है कि अगर ईरान शर्तों को नहीं मानता, तो हमले और तेज होंगे. फिलहाल पूरी दुनिया की निगाहें इस बात पर हैं कि क्या मुनीर और शहबाज की मेजबानी में यह ‘इस्लामाबाद समझौता’ कोई ठोस रूप ले पाएगा या यह महज एक अस्थायी राहत बनकर रह जाएगा.