14 मिनट पहलेलेखक: नवनीत गुर्जर, राष्ट्रीय संपादक, दैनिक भास्कर
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19 मई। पुणे का कल्याणी नगर इलाका। यहां रहने वाले रियल एस्टेट डेवलपर विशाल अग्रवाल का नाबालिग (18 से कम उम्र) बेटा अपनी पोर्श कार से बाइक सवार दो इंजीनियर को कुचल देता है। परिणाम बेटा खुद बाल सुधार घर में। पिता जेल में। दादा भी गिरफ्तार। आखिर ये क्यों हुआ? ऐसा होता ही क्यों है? क़सूर उस तेज़ रफ़्तार, महंगी कार का है?
नशे में धुत होकर कार दौड़ा रहे उस बेटे का है? क्या उस पिता ने नाबालिग बेटे की ज़िद के आगे मानक पोर्श की चाबी थमा दी थी?
आसानी से कहा जा सकता है कि अमीर पिता की औलादें ऐसी ही होती हैं। पैसों के नशे में चूर। बेमुरव्वत। बेख़ौफ़।… और बहुत हद तक निर्दयी भी। कहा जा सकता है कि रईस पिता को फ़र्क़ नहीं पड़ता। बेटे को बचाने के लिए वह कभी ड्राइवर को ख़रीदता है। कभी-कभी डॉक्टरों को ब्लडस्क्रीन डस्टबीन में स्प्लाॅट करने के लिए मजबूर किया जाता है। पुलिस, न्याय व्यवस्था आदि कोखराने की कोशिश भी करता है। सही है, ऐसा अक्सर होता है।

तस्वीर पब के सीसीटीवी फुटेज की है। हादसे से पहले नाबालिग ने दोस्तों के साथ शराब पी और ड्रग्स में कार लेकर निकल गया। वह 90 मिनट में 48 हजार रुपए का बिल चुकाया था।
कोई अपनी इस इच्छा में सफल होता है। कोई असफल। सवाल यह है कि यह पूरी समस्या की जड़ क्या है? क्या उस पिता ने अपने नाबालिग बेटे को कार ले जाने से मना नहीं किया होगा? ज़रूर किया होगा, लेकिन आजकल के जवान होते बेटे माने कहाँ हैं? पिता भी बेटे और उसके दोस्तों के सामने कंजूस नहीं कहना चाहते।
नहीं चाहते कि आज की पीढ़ी उन्हें प्राचीन कहानियाँ सिखाए। सकुचाते हैं कि उनके बच्चे ये न कहें लगें कि हमारे पिता तो कतरे- ब्योंते, सादे-गले, नियम-प्रणाली की अंध गली में मरे रहते हैं।
यही सब प्रीमियम पिता कार की चाबी माइनर को देने पर मजबूर हो जाता है। बच्चों की नज़रों में प्रोग्रेसिव कहने की इच्छा उससे यह सब करवाती है, लेकिन फिर पिता की सीरियसनेस सामने आती है। ड्राइवर के साथ ले जाने की शर्त पर कुंजी देता है, लेकिन नशे में धुत बेटा ड्राइवर को पीछे बैठाकर गाड़ी उड़ाता है और उड़ जाता है निर्दोष लोगों के प्राण!

सीसीटीवी में फास्ट चार्जिंग से कुछ तस्वीरें सामने आई हैं।
आखिर इसका निदान क्या? – सच है, सोलह-सत्रह की उम्र में जाना- सोलह शरीर के वस्त्रों की तरह तंग हो जाता है। होंठ दुनिया की प्यास से खुश हो जाते हैं। आकाश के तारे, जिन्हें बचपन में सप्त ऋषियों के आकार में देखकर दूर से प्रणाम करना होता है, पास जाकर, बल्कि खीसे में डालने को मन करता है। दबाव- गिर्द और दूर-पास की हवा में इतनी मनाहियाँ, इतने इनकार और इतने विरोध होते हैं कि साँसों में आग सुलगती है।
युवा मन की यही आग पिता-दादा को मजबूर करती है और कभी-कभी सड़क पर चलते हुए निरपराध की जान लेने पर भी बन जाती है। होना यह चाहिए कि पिता अपनी शक्ति पर कायम रहे। बच्चा इस पितृसत्तात्मक अनुशासन की हँसी उड़ाने या उसे अपने अपमान की बजाय धैर्य की भावना से परिपूर्ण करने के लिए प्रेरित करता है।
निश्चित ही ऐसे हादसों से बचाव का उपाय बच्चों और पिता की गंभीर समझ से ही निकल सकता है। पुलिस, प्रशासन, थानेदार, ये सब तो सबूत बनाने और उन्हें मिटाने के निगमों में लगे रहते हैं। वहाँ से किसी तरह के निदान की कल्पना करना बेमानी ही लगता है।
कुल मिलाकर पुणे की यह घटना के समय के पिताओं और उनके जवान होते बच्चों के लिए एक सबक है। एक चलित है। … और बहुत हद तक एक लक्ष्मण रेखा भी।
