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- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कन्याकुमारी चिकित्सा; विवेकानंद रॉक मेमोरियल | लोकसभा चुनाव
नई दिल्ली30 मिनट पहले
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कन्याकुमारी में 45 घंटे ध्यान साधना पर देशवासियों को एक पत्र लिखा है। इसमें वे अपने अनुभव से युक्त हैं। पीएम मोदी ने बताया कि शुरुआत में चुनावी कोलहाल मेरे दिल-दिमाग में गूंज रहा था। लेकिन धीरे-धीरे एण्डसन नाम हो रही थीं। मैं शून्यता में जा रहा था।
पीएम मोदी ने ये पत्र 1 जून को कन्याकुमारी से दिल्ली वापस आने के दौरान शाम 4:15 से 7 बजे के बीच लिखा था। लता का शीर्षक है- कन्याकुमारी में साधना से नया संकल्प। इसमें उन्होंने कहा कि आज भारत की गवर्नेंस मॉडल दुनिया के कई देशों के लिए एक उदाहरण है।
पीएम मोदी का पत्र पूरा पढ़ें…
मेरे प्यारे देशवासियों,
लोकतंत्र की जननी में लोकतंत्र के सबसे बड़े महापर्व का समापन हो चुका है। तीन दिन तक कन्याकुमारी में आध्यात्मिक यात्रा के बाद, कितने सारे अनुभव होते हैं, कितनी अनुभूतियाँ होती हैं। मैं एक असीम ऊर्जा का प्रवाह स्वयं में महसूस कर रहा हूँ। वाकई, 2024 के इस चुनाव में कितने ही सुखद संयोग बने हैं। अमृतकाल के इस पहले कांग्रेस चुनाव में मैंने प्रचार अभियान, 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणास्थली मेरठ से शुरू किया था। मां भारती की प्रस्तुति करते हुए इस चुनाव की मेरी आखिरी सभा पंजाब के होशियारपुर में हुई।
इसके बाद मुझे कन्याकुमारी में भारत माता के चरणों में विराजमान होने का अवसर मिला। उन शुरुआती पलों में चुनावों का कोलाहल मन-मस्तिष्क में गूंज रहा था। रैलियों में, रोड शो में देखे अनगिनत चेहरे मेरी आँखों के सामने आ रहे थे। बहन-बहनों-बेटियों का असीम प्रेम, उनका आशीर्वाद, उनकी आँखों में मेरे लिए वो विश्वास, वो दुलार। मैं वसा खा रहा था। मेरी आंखें नम हो रही थीं। मैं शून्यता में जा रहा था, साधना में प्रवेश कर रहा था।
कुछ ही गानों में राजनीतिक वाद-विवाद, युद्ध-पलटवार, आरोपों के स्वर-शब्द शून्य में समाते चले गए। मेरे मन में विरक्ति का भाव और तीव्र हो गया। मेरा मन बाहरी जगत से पूरी तरह निकला गया। इतने बड़े जन्मों के बीच ऐसी साधना कठिन होती है, लेकिन कन्याकुमारी की भूमि और स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा ने इसे आसानी से बना दिया। मैं ईश्वर का भी आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे जन्म से ये संस्कार दिया। मैं यह भी सोच रहा था कि स्वामी विवेकानंद जी ने उस स्थान पर साधना के समय क्या अनुभव किया होगा! मेरी साधना का कुछ हिस्सा इसी तरह के विचार प्रवाह में बहता है।
इस विरक्ति के बीच भारत के लक्ष्य के लिए सतत विचार उमड़ रहे थे। कन्याकुमारी के उगते हुए सूर्य ने मेरे विचारों को नई ऊंचाई दी, सागर की विशालता ने मेरे विचारों को विस्तार दिया, क्षितिज के विस्तार ने ब्रह्मांड की गहराई में समाई एकात्मकता, “वननेस” का निरंतर अहसास कराया। ऐसा लग रहा था जैसे दशकों पहले हिमालय की भगवान में किये गये चिंतन और अनुभव पुनर्जीवित हो रहे हैं।
साथियो, कन्याकुमारी का यह स्थान सदैव मेरे मन के अत्यंत करीब रहता है। कन्याकुमारी में विवेकानंद शिला स्मारक का निर्माण श्री एकनाथ रानडे जी ने किया था। कश्मीर से कन्याकुमारी… ये हर देशवासियों के अंतःकरण में रची-बसी हमारी साझी पहचान हैं। ये वो शक्तिपीठ है, जहां मां शक्ति ने कन्याकुमारी के रूप में अवतार लिया था। इस दक्षिणी छोर पर माँ शक्ति ने भगवान शिव के लिए तपस्या और प्रतीक्षा की, जो भारत के सबसे उत्तरी छोर के हिमालय पर विराज रहे थे।
कन्याकुमारी संगमों के धरती है। हमारे देश की पवित्र नदियाँ अलग-अलग समुद्रों में जाती हैं और यहां उन समुद्रों का संगम होता है। और यहां एक और महान संगम दिखता है- भारत का बुद्धिमान संगम! यहां विवेकानंद शिला स्मारक के साथ ही संत तिरुवल्लुवर की विशाल प्रतिमा, गांधी मंडपम और कामराजर मणि मंडपम हैं। महान नायकों के विचारों की ये धाराएं यहां राष्ट्र-प्रचार का संगम हैं। जो लोग भारत के राष्ट्र होने और देश की एकता पर संदेह करते हैं, उन्हें कन्याकुमारी की धरती एकता का अमित संदेश देता है। कन्याकुमारी में संत तिरुवल्लुवर की विशाल प्रतिमा, समुद्र में मां भारती के विस्तार को देखती हुई दिखाई देती है। उनकी रचना ‘तिरुक्कुरल’ तमिल साहित्य के रत्नों से जड़ित एक मुकुट के समान है। इसमें जीवन के हर पक्ष का वर्णन है, जो हमें स्वयं और राष्ट्र के लिए अपना सर्वोत्तम देने की प्रेरणा देता है।
आज भारत की गवर्नेंस मॉडल दुनिया के कई देशों के लिए एक उदाहरण है। मात्र 10 वर्षों में 25 करोड़ लोगों की गरीबी समाप्त हो गई। गरीब के सशक्तिकरण से लेकर अंतिम मील तक, समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को प्राथमिकता देने के हमारे प्रयासों ने विश्व को प्रेरित किया है। नए भारत का यह स्वरूप हमें गर्व और गौरव से भर देता है, लेकिन साथ ही इन 140 करोड़ देशवासियों को उनके कर्तव्यों का पालन भी करवाता है। अब एक भी पल गंवाए बिना हमें बड़ी मंजिल की दिशा में कदम उठाने होंगे। हमें नए सपने देखने हैं। सपनों को अपना जीवन बनाना है और उन सपनों को जीना शुरू करना है। हमें भारत के विकास को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखना होगा, इसके लिए यह जरूरी है कि हम भारत के समर्थ्य को समझें।
स्वामी विवेकानंद ने 1897 में कहा था कि हमें अगले 50 वर्ष केवल और केवल राष्ट्र के लिए समर्पित करने होंगे। उनके इस आह्वान के ठीक 50 वर्ष बाद, 1947 में भारत आजाद हो गया। आज हमारे पास वही स्वर्णिम अवसर है। हम अगले 25 वर्ष केवल और केवल राष्ट्र के लिए समर्पित करेंगे। हमारे यह प्रयास आने वाली संभावनाओं और आने वाली सोच के लिए नए भारत की नींव बनकर अमर रहेंगे। मैं देश की ऊर्जा को देखकर यह कह सकता हूँ कि लक्ष्य अब दूर नहीं है। आइए, तेज गति से सड़कें बनाएं…मिलकर सड़कें, भारत को विकसित बनाएं।
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