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कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिका पर रक्षा निर्भरता खत्म करने का बड़ा एलान किया है. उन्होंने स्पष्ट किया कि अब सैन्य खरीद का 70 प्रतिशत हिस्सा अमेरिकी कंपनियों को नहीं दिया जाएगा क्योंकि यह मॉडल अब टिकाऊ नहीं है. कार्नी के अनुसार बढ़ते वैश्विक तनाव और तकनीकी बदलावों के बीच कनाडा को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और घरेलू रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए नए साझेदार तलाशने होंगे.
कॉर्नी ने सख्त रुख अख्तियार किया.
ओटावा/वॉशिंगटन: कूटनीति के गलियारों में एक पुरानी कहावत है. निर्भरता ही कमजोरी की पहली सीढ़ी होती है. कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अब इसी कमजोरी की बेड़ियां काटने का मन बना लिया है. वॉशिंगटन को एक ऐसा झटका देने की तैयारी है जिसकी गूंज पेंटागन तक सुनाई देगी. प्रधानमंत्री कार्नी ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि अब कनाडा अपने रक्षा बजट का 70 प्रतिशत हिस्सा आंख मूंदकर अमेरिकी कंपनियों की झोली में नहीं डालेगा. हैरानी की बात यह है कि कार्नी की इस नई नीति के पीछे भारत वाला फॉर्मूला नजर आ रहा है. जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी ने मेक इन इंडिया के जरिए दुनिया को दिखाया कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर कैसे बना जाता है, ठीक उसी तर्ज पर कार्नी अब कनाडा को अपने पैरों पर खड़ा करने की जिद पर अड़ गए हैं.
ट्रंप को करारा जवाब
यह सिर्फ एक रक्षा सौदा नहीं बल्कि अमेरिका के बड़े भाई वाले रसूख को दी गई एक सीधी चुनौती है. कार्नी का संदेश साफ है कनाडा के डॉलर अब वॉशिंगटन की तिजोरी नहीं भरेंगे बल्कि ओटावा की अपनी फैक्टरियों में गूंजेंगे. यह कूटनीति की बिसात पर एक ऐसा दांव है जिसने डोनाल्ड ट्रंप को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या उसका सबसे भरोसेमंद साथी अब उसकी छाया से बाहर निकलने के लिए पूरी तरह तैयार है?
क्या बोले कॉर्नी?
लिबरल पार्टी के सम्मेलन के दौरान कार्नी ने स्पष्ट किया कि कनाडा अब अपने सैन्य खरीद मॉडल को बदलने जा रहा है क्योंकि मौजूदा व्यवस्था अब टिकाऊ नहीं रह गई है. उन्होंने कहा कि कनाडा के सैन्य बजट का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा वर्तमान में अमेरिकी रक्षा कंपनियों की झोली में जाता है. इस आंकड़े पर जोर देते हुए प्रधानमंत्री कार्नी ने कहा, “कनाडा की सेना द्वारा खर्च किए जाने वाले हर एक डॉलर में से 70 सेंट अमेरिका भेजने के दिन अब लद चुके हैं.”
बदलाव की बड़ी वजहें
यह बयान महज एक वित्तीय बदलाव नहीं बल्कि कनाडा की रणनीतिक स्वायत्तता की दिशा में एक बड़ा कदम है. कनाडा का यह फैसला वैश्विक जियो-पॉलिटिक्स की उथल-पुथल के बीच आया है. इसके पीछे कई प्रमुख कारण माने जा रहे हैं:
· बदलता वैश्विक क्रम: अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ चलाए जा रहे संयुक्त सैन्य अभियान ने वैश्विक स्तर पर तनाव बढ़ा दिया है. ऐसे में कनाडा अपनी रक्षा जरूरतों के लिए किसी एक देश पर निर्भर रहने के जोखिम को कम करना चाहता है.
· आर्थिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और अत्याधुनिक सैन्य तकनीक के दौर में कनाडा अपनी घरेलू रक्षा क्षमताओं को मजबूत करना चाहता है. वह अब अपने रक्षा साझेदारों में विविधता लाने की योजना बना रहा है ताकि बाहरी झटकों से बचा जा सके.
· व्यापारिक अनिश्चितता: अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों में समय-समय पर आने वाले उतार-चढ़ाव ने ओटावा को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि सुरक्षा जैसे संवेदनशील मामले में ‘एकतरफा निर्भरता’ खतरनाक हो सकती है.
आत्मनिर्भर होना चाहता है कनाडा
मार्क कार्नी ने इस क्षण को परिवर्तनकारी बताते हुए देश से एकजुट होने की अपील की है. उन्होंने कहा कि यह राजनीति करने का नहीं बल्कि एक ऐसा मजबूत कनाडा बनाने का समय है जिसे कोई हिला न सके. इस नीतिगत बदलाव का सीधा असर अमेरिका के रक्षा निर्यात पर पड़ेगा जिसके लिए कनाडा एक बड़ा और विश्वसनीय बाजार रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि कनाडा अब यूरोपीय देशों के साथ नई रक्षा संधियां कर सकता है या अपने घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए बड़े टेंडर जारी कर सकता है. कार्नी का यह कदम वैश्विक राजनीति में कनाडा की एक ‘स्वतंत्र खिलाड़ी’ के रूप में उभरने की महत्वाकांक्षा को साफ दर्शाता है.
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पत्रकारिता में 14 साल से भी लंबे वक्त से सक्रिय हूं. साल 2010 में दैनिक भास्कर अखबार से करियर की शुरुआत करने के बाद नई दुनिया, दैनिक जागरण और पंजाब केसरी में एक रिपोर्टर के तौर पर काम किया. इस दौरान क्राइम और…और पढ़ें





