Middle East Crisis And Indian Opposion Parties: तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने अपने-अपने आराध्य देव के दरबार में हाजिरी लगाई है. सरकारी स्तर पर लगातार उच्चस्तरीय बैठकें चल रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले सर्वदलीय बैठक बुलाई. फिर शनिवार यानी 27 मार्च को मुख्यमंत्रियों के साथ वर्चुअल बैठक की. दोनों ही बैठकों में पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के प्रभावों पर चर्चा हुई. हालात से निपटने के लिए देश की तैयारियों की समीक्षा की गई. मुख्यमंत्रियों की बैठक के तुरंत बाद बिहार सरकार ने आनन-फानन में क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप बना दिया. यह सब देख कर साफ जाहिर है कि देश में युद्ध से उत्पन्न स्थितियों के कारण बेचैनी बढ़ी है. युद्ध का असर दुनिया के तमाम देशों पर कमोबेश पड़ा है. खास कर ऊर्जा के क्षेत्र में स्थिति गंभीर हुई है. भारत में अभी इसका असर प्रत्यक्ष तौर पर तो नहीं दिखता, लेकिन युद्ध नहीं रुका तो आने वाले समय में हालात बिगड़ सकते हैं.
खाड़ी देशों में फंसे लोगों की चिंता
अमेरिका-इजरायल के ईरान पर हमलों के बाद युद्ध की स्थिति खाड़ी देशों तक फैल चुकी है. जिन परिवारों के बच्चे रोजी-रोटी के लिए खाड़ी देशों में गए हैं, वे वहां की अफरा-तफरी से वाकिफ हैं. किसी का भाई खाड़ी देश में फंसा हुआ है तो किसी का बेटा. उड़ानों की कमी और महंगे किराए के कारण वापसी मुश्किल है. कुछ कंपनियां कर्मचारियों को वापस भेज रही हैं, लेकिन बाकी के घर वाले उनकी सलामती की दुआ कर रहे हैं. फिर भी लोगों को पूरा भरोसा है कि पीएम नरेंद्र मोदी चुप नहीं बैठेंगे. उन्होंने यूक्रेन-रूस युद्ध शुरू होने पर ऐसा किया भी था. दूसरे रास्तों से ईरान में फंसे सैकड़ों लोगों को सरकार ने वापस भी सुरक्षित बुला लिया है. फिर भी बड़े पैमाने पर भारतीय खाड़ी देशों में अब भी फंसे हैं.
विपक्ष बार बार देश में एलपीजी की कमी का मुद्दा उठादा रहा है.
दुनिया में दाम बढ़े, भारत अछूता
इस युद्ध का एक और बड़ा खामियाजा पूरी दुनिया भुगत रही है. रसोई गैस (LPG) और पेट्रोलियम उत्पादों के दाम दुनिया के दूसरे देशों में बढ़ गए हैं. भारत अपनी निरपेक्ष नीति के कारण अब तक बड़े स्तर पर इससे अछूता बचा है. मोदी सरकार ने कच्चे तेल के आयात स्रोतों को पहले से ही विविधीकृत कर लिया था, जिससे सप्लाई सामान्य बनी हुई है. मध्य पूर्व में तनाव बढ़ रहा है और विश्वयुद्ध की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. अगर ऐसा हुआ तो भारत भी पूरी तरह अप्रभावित नहीं रहेगा. 1962 का भारत-चीन युद्ध, 1965 और 1971 की भारत-पाक जंग देख चुकी पीढ़ी इसकी गंभीरता अच्छी तरह समझती है. उन दिनों देश ने युद्ध के दौरान कितनी कुर्बानियां दीं.
पहले युद्ध के वक्त क्या होता था
जब 1962 में चीन से लड़ाई छिड़ी तो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्र से अपील की- नागरिक सोना-चांदी के जेवर दान करें, पैसे दें और ऊनी कपड़े दें. देश ने उनकी इस अपील पर पूरी ताकत से अपनी भागीदारी निभाई. महिलाओं ने अपने मंगलसूत्र, कंगन, नेकलेस, इयरिंग्स तक उतार कर जमा कर दिए. इंदिरा गांधी ने भी अपना जेवर दान किया. मुंबई की सड़कों पर तो सरकारी वाहन माइक लगा कर अपील करते घूमते थे. पंजाब ने अकेले करीब 252 किलो सोना दान किया था. पूरे देश से हजारों किलो जेवर और करोड़ों रुपये इकट्ठा हुए. आज के मूल्य में हजारों करोड़ का वह योगदान था. नरेंद्र मोदी ने शायद इसीलिए 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार में कहा था कि कांग्रेस सत्ता में आई तो मंगल सूत्र तक उतरवा लेगी. यह अलग बात है कि हमारी कूटनीतिक कमजोरी के कारण तब के युद्धों में हमें अपना कुछ भूभाग गंवाना पड़ा. वर्षों बाद बदली सरकार के शासनकाल में आर्गेनाइज्ड युद्ध तो नहीं हुए, लेकिन पाकिस्तान से सभी झड़पों में, भारत ने उसे करारा जवाब दिया है. सर्जिकल स्ट्राइक और आपरेशन सिन्दूर के रूप में देश ने सरकार की इच्छाशक्ति और सेना का सौंदर्य सबने देखा है.
बेटों को फौज में भेजने की होड़ थी
तब कई गांवों में परिवारों ने एक-एक बेटे को सेना में भेजने का फैसला लिया था. 1965 और 1971 के युद्धों में भी यही भावना दिखी. लोग न सिर्फ जेवर दान करते थे, बल्कि उपवास रख कर, प्रार्थना कर के और हर संभव तरीके से सेना की मदद करते थे. महिलाएं घर-घर जाकर चंदा इकट्ठा करतीं, युवा खून दान करते और बुजुर्ग अपनी छोटी-छोटी बचत दान कर देते थे. कुछ परिवारों ने तो अपने आभूषणों के साथ-साथ ऊनी कपड़े, कंबल और राशन भी भेजे. चीन से युद्ध के दौरान गर्म कपड़ों के कारण सेना के कई जवान बिना युद्ध लड़े काल कवलित हो गए. यह सिर्फ पैसे, कपड़े या सोने की बात भर नहीं थी. यह राष्ट्र के प्रति समर्पण और एकता का प्रतीक था. उस समय की पीढ़ी ने युद्ध की विभीषिका देखी थी, इसलिए वे बिना हिचकिचाहट के सब कुछ न्योछावर कर देते थे.
आज भारतीय सेना साधन संपन्न है
आज तो सेना को हर आधुनिक संसाधन मुहैया कराए जा रहे हैं. यही वजह है कि हाल के वर्षों में पाकिस्तान से हुई झड़पों में सर्जिकल स्ट्राइक और आपरेशन सिन्दूर जैसी कार्रवाइयों से सेना ने दुश्मन को अपनी ताकत का अहसास कराया है. इससे सरकार की इच्छाशक्ति और सेना की क्षमता साफ दिखती है. इसके बावजूद कुछ लोग आपदा में अवसर तलाशते हुए गैस और पेट्रोल-डीजल की ‘कमी’ का शोर मचा रहे हैं. अफवाहों से जमाखोरों ने भी शुरू में थोड़ा मुनाफा कमाया, लेकिन सरकार ने तुरंत कदम उठाए. सच यह है कि 2014 के बाद गैस की कमी आम लोगों ने लगभग महसूस ही नहीं की. पहले सामान्य स्थिति में भी एलपीजी के लिए लंबी कतारें लोगों ने देखी हैं. अब तो प्रतिकूल स्थिति में भी सरकार ने अपनी गुट निरपेक्ष नीतियों के कारण वैसी स्थिति नहीं आने दी है. इतना ही नहीं, कोरोना महामारी के दौरान भी सरकार लोगों की मदद के लिए मुस्तैद रही. उस वक्त शुरू की गई सरकार की 5 किलो मुफ्त अनाज योजना का लाभ अब भी 80 करोड़ लोग उठा रहे हैं. यही नहीं, जब दुनिया के बड़े देशों में डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ रहे हैं, भारत में अब तक दाम स्थिर हैं. तेल की सुगमता के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं. पहले जहां 22 देशों से तेल का आयात होता था, वहां अब 40 से अधिक देशों से तेल भारत में आ रहा है. भारत अपनी निरपेक्ष नीति के कारण न ईरान के साथ है और न इस्राइल-अमेरिका के पक्ष में. मोदी सरकार की इसी नीति का परिणाम है कि देश में सब कुछ सामान्य चल रहा है. जिस होर्मुज रूट को ‘दुश्मन देशों के लिए ईरान ने रोक रखा है, वहां से भारत के मालवाही जहाज बेखटके पार हो जा रहे हैं.
विपक्ष को आपदा में अवसर तलाश
आपदा में अवसर तलाशते रहने वाले कुछ लोग देश में रसोई गैस और डीजल-पेट्रोल की कमी बता कर इतना शोर मचाएं हुए हैं कि कोई भी इस अफवाह से घबरा सकता है. संकट की स्थिति में भी ये इसका ऐसा प्रचार कर रहे हैं कि मोदी की वजह से ही यह संकट उत्पन्न हुआ है. ऐसे लोग महंगाई बढ़ने की भविष्यवक्ता की तरह आशंका भी बता रहे हैं. इनकी ही अफवाहों से जमाखोरों ने कुछ दिन चांदी काट ली. उल्टे सरकार ने आयल इंपोर्ट पर ड्यूटी 10 प्रतिशत घटा दी. संकट की आशंका मात्र से बंगाल की सीएम ममता बनर्जी मोदी सरकार के खिलाफ सिलिंडर लेकर आंदोलन चला रही हैं. राहुल गांधी कह रहे कि मोदी की नीतियों के कारण तेल-गैस के दाम 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद बढ़ेंगे. मोदी को घेरने के लिए विपक्ष आरोप लगा रहा है कि वे इस्राइल क्यों गए. अमेरिका से वे पंगा क्यों नहीं ले रहे. पर, आरोपों से बेफिक्र मोदी ने अपनी सरकार की गुट निरपेक्ष छवि बरकरार रखी है.





