क्या हाइपरसोनिक फ्लाइट्स के लिए गर्मी ही सबसे बड़ी दुश्मन है?
- हाइपरसोनिक व्हीकल वो होते हैं जो आवाज की रफ्तार से 5 गुना ज्यादा यानी करीब 6,115 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से चलते हैं. जब कोई ऑब्जेक्ट इतनी तेज चलता है, तो हवा के मॉलिक्यूल्स उससे टकराकर भयंकर गर्मी और दबाव पैदा करते हैं. इस कंडीशन में नॉर्मल लोहा या स्टील तो छोड़िए, अच्छे-अच्छे मटेरियल भी मोम की तरह पिघल जाते हैं.
- अभी तक वैज्ञानिक इसके लिए कार्बन कंपोजिट का इस्तेमाल करते आए हैं, लेकिन उनमें भी कई कमियां हैं. वो हवा में धीरे-धीरे ऑक्सीडाइज होने लगते हैं और उन्हें बार-बार रिपेयर करना पड़ता है. इसी समस्या का हल निकालने के लिए वैज्ञानिकों ने ‘अल्ट्रा-हाई-टेंपरेचर सिरेमिक’ (UHTC) पर काम शुरू किया है, जो बिना पिघले बार-बार इस्तेमाल किए जा सकें.
प्लाज्मा विंड टनल में कैसे हुआ यह खतरनाक टेस्ट?
- इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ नेपल्स फेडेरिको II के रिसर्चर्स ने इस टेस्ट के लिए सिरेमिक के दो अलग-अलग वर्जन तैयार किए. दोनों का बेस मटेरियल एक ही था, लेकिन एक में नियोबियम कार्बाइड और दूसरे में वैनेडियम कार्बाइड मिलाया गया था.
- इन सैंपल्स को ‘स्मॉल प्लैनेटरी एंट्री सिम्युलेटर’ (SPES) नाम के टनल में रखा गया. यह टनल बिजली से गर्म किए गए प्लाज्मा का इस्तेमाल करके बिल्कुल वैसी ही गर्मी पैदा करता है, जैसी अंतरिक्ष से धरती पर लौटते वक्त किसी यान को झेलनी पड़ती है.
- पहले इन्हें मैक 6 की स्पीड वाली कंडीशन में रखा गया, जहां तापमान 1,800K था. इसके बाद इसे बढ़ाकर 2,700K कर दिया गया, ताकि इनकी असली मजबूती का पता चल सके.
यह एडवांस सिरेमिक खुद को जलने से कैसे बचाता है?
इस रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने एक बहुत ही दिलचस्प चीज देखी. जब यह मटेरियल भयंकर गर्मी के संपर्क में आया, तो इसके अंदर मौजूद सिलिकॉन कार्बाइड ने ऑक्सीजन के साथ रिएक्ट किया. इससे मटेरियल के ऊपर कांच जैसी ‘सिलिका’ की एक पतली परत बन गई. इस परत ने एक ढाल की तरह काम किया और अंदरूनी हिस्से को जलने से बचा लिया.
हालांकि, जब तापमान 2,200K से ऊपर गया, तो यह सुरक्षा कवच थोड़ा अस्थिर होने लगा. सतह पर बुलबुले बनने लगे और कुछ हिस्सा झड़ने भी लगा, लेकिन फिर भी मुख्य ढांचा अपनी जगह बना रहा. यह इस मटेरियल की सबसे बड़ी खूबी है कि नुकसान सिर्फ ऊपरी सतह तक ही सीमित रहा.
क्या ज़िरकोनियम ऑक्साइड ही भविष्य की ढाल है?
- टेस्ट के बाद जब माइक्रोस्कोप से जांच की गई, तो पता चला कि सबसे बाहरी सुरक्षा परत में ज़िरकोनियम ऑक्साइड का कब्जा था. इस ऑक्साइड की थर्मल कंडक्टिविटी बहुत कम होती है, जिसका मतलब है कि यह गर्मी को अंदर की तरफ नहीं जाने देता.
- इसके अलावा नियोबियम और वैनेडियम जैसे तत्वों ने ऑक्सीडेशन के तरीके को बदल दिया, जिससे यह परत और ज्यादा टिकाऊ बन गई. रिसर्चर्स का कहना है कि ये मटेरियल कई बार हाई-हीट साइकल को झेल सकते हैं.
- यह खोज उन स्पेसक्राफ्ट के लिए बहुत अहम है जिन्हें बार-बार अंतरिक्ष में जाना और वापस आना है, क्योंकि इससे मेंटेनेंस का खर्च और समय दोनों बचेगा.
हाइपरसोनिक हथियारों की रेस में क्यों अहम है यह खोज?
आज के दौर में हाइपरसोनिक मिसाइलें ग्लोबल मिलिट्री पावर का नया पैमाना बन गई हैं. अमेरिका, चीन और रूस तीनों ही इस रेस में सबसे आगे निकलने की कोशिश कर रहे हैं. हाइपरसोनिक का मतलब सिर्फ तेज रफ्तार नहीं है, बल्कि उस रफ्तार पर जिंदा बचे रहना असली चुनौती है. मैक 5 या उससे ऊपर की स्पीड पर हवा भी किसी तेजाब की तरह काम करने लगती है.
ऐसे में अगर नोज कोन या मिसाइल का आगे का हिस्सा पिघल जाए, तो पूरा मिशन फेल हो जाएगा. नाटो और यूएस एयरफोर्स द्वारा इस रिसर्च को स्पॉन्सर करना साफ बताता है कि वे आने वाले समय में ऐसे हथियार और यान चाहते हैं जो बार-बार इस्तेमाल हो सकें और दुश्मन की पहुंच से बाहर रहें.
क्या अब आसान होगा अंतरिक्ष का सफर?
इस रिसर्च ने सिर्फ मिलिट्री ही नहीं, बल्कि सिविलियन स्पेस ट्रैवल के लिए भी नए दरवाजे खोल दिए हैं. अगर हम ऐसे मटेरियल बनाने में कामयाब हो जाते हैं जिन्हें बार-बार रिपेयर करने की जरूरत न पड़े, तो स्पेस शटल और हाई-स्पीड एयरक्राफ्ट का खर्च काफी कम हो जाएगा. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह डेटा भविष्य के थर्मल प्रोटेक्शन सिस्टम को और बेहतर बनाने में मदद करेगा.
हालांकि अभी भी ऑक्सीडेशन और परत के झड़ने जैसी समस्याओं पर काम करना बाकी है, लेकिन 2,700K की गर्मी को झेल लेना अपने आप में एक बड़ी जीत है.





