पिछले 10 दिन से इजरायल और अमेरिका मिलकर लगातार ईरान पर बमबारी कर रहे हैं. लगातार जारी जंग के बीच ऑस्ट्रेलिया में कुछ ऐसा हुआ, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मंच पर एक बार फिर डोनाल्ड ट्रंप का चिर-परिचित आक्रामक अंदाज देखने को मिला. इस बार उनके निशाने पर कोई दुश्मन देश नहीं बल्कि अमेरिका का करीबी दोस्त ऑस्ट्रेलिया और उसके प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज हैं. मामला है ईरानी महिला फुटबॉल टीम की सुरक्षा का जिसे लेकर ट्रंप ने ऑस्ट्रेलियाई पीएम को सरेआम हड़काते हुए चेतावनी दे डाली है.
क्या है पूरा ड्रामा?
ऑस्ट्रेलिया में चल रहे विमेंस एशियन कप के दौरान ईरानी महिला टीम ने अपने देश के राष्ट्रगान को गाने से इनकार कर दिया. इस खामोश बगावत के बाद ईरान के सरकारी मीडिया ने उन्हें युद्ध का गद्दार करार दिया है. जानकारों का मानना है कि अगर ये खिलाड़ी ईरान लौटती हैं तो उन्हें मौत की सजा या प्रताड़ना का सामना करना पड़ सकता है. इसी बीच ट्रंप ने सोशल मीडिया पर ट्रंप ने लिखा:
“ऑस्ट्रेलिया एक भयानक मानवीय गलती कर रहा है. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर, उन्हें वापस ईरान मत भेजिए, उन्हें शरण दीजिए. अगर आप नहीं दे सकते तो अमेरिका उन्हें पनाह देगा. उन्हें वापस भेजना उनकी मौत के वारंट पर साइन करने जैसा होगा.”
ट्रंप की धौंस के पीछे की राजनीति
ट्रंप का यह नाटकीय हस्तक्षेप केवल सहानुभूति नहीं बल्कि एक सोची-समझी कूटनीति है:
· मानवीय ढाल: ट्रंप खुद को मानवाधिकारों के रक्षक के रूप में पेश कर रहे हैं. खासकर उन महिलाओं के लिए जो दुश्मन देश यानी ईरान के खिलाफ खड़ी हैं.
· ऑस्ट्रेलिया पर दबाव: ट्रंप ने सीधे प्रधानमंत्री शब्द का इस्तेमाल कर अल्बनीज सरकार को दुनिया के सामने कटघरे में खड़ा कर दिया है.
· ईरान को संदेश: इस मुद्दे के जरिए ट्रंप ईरान के दमनकारी शासन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव को और ज्यादा बढ़ाना चाहते हैं.
अब पूरी दुनिया की नजरें ऑस्ट्रेलिया पर हैं. क्या वह ट्रंप की धौंस के आगे झुककर खिलाड़ियों को शरण देगा या अपने कूटनीतिक नियमों पर अडिग रहेगा?
सवाल-जवाब
ईरानी महिला फुटबॉल खिलाड़ियों को ईरान में गद्दार क्यों कहा जा रहा है?
खिलाड़ियों ने ऑस्ट्रेलिया में मैच से पहले राष्ट्रगान नहीं गाया जिसे ईरानी शासन ने देश के प्रति अपमान और युद्ध के समय में गद्दारी माना है.
क्या ऑस्ट्रेलिया ने शरण देने पर कोई फैसला लिया है?
फिलहाल ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने आधिकारिक तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की है लेकिन मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी नेताओं का दबाव लगातार बढ़ रहा है.





