Mojave Desert: Why Judge Shuts 2200 Miles Trails for Tortoise | मोजावे रेगिस्तान में जज ने एक झटके में बंद किए 2200 मील लंबे रास्ते!


नई दिल्ली: अमेरिका का मोजावे रेगिस्तान अपनी विशालता और शांति के लिए जाना जाता है. लेकिन पिछले कुछ दशकों से यह ऑफ-रोडिंग के शौकीनों का सबसे बड़ा अड्डा बन गया था. अब यहां के सन्नाटे को चीरने वाली इंजनों की गूंज शांत होने वाली है. एक फेडरल जज, सुसान इल्स्टन ने मोजावे रेगिस्तान के लगभग 2,200 मील (करीब 3,500 किलोमीटर) लंबे ऑफ-रोड रास्तों को बंद करने का सख्त आदेश दिया है. इस फैसले के पीछे का सबसे बड़ा कारण है ‘डेजर्ट टॉरटॉइज़’ (Desert Tortoise) यानी रेगिस्तानी कछुआ, जो अब विलुप्ति की कगार पर खड़ा है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, इंसान के एडवेंचर की कीमत इन बेजुबान जानवरों को अपनी नस्ल खत्म करके चुकानी पड़ रही है.

क्यों खास है यह कछुआ और क्या है खतरा?

डेजर्ट टॉरटॉइज को मोजावे रेगिस्तान की ‘कीस्टोन स्पीशीज’ माना जाता है. इसका मतलब यह है कि पूरा रेगिस्तानी ईकोसिस्टम इस एक जीव पर निर्भर करता है. यह कछुआ जमीन के अंदर जो बिल (Burrows) खोदता है, उनका इस्तेमाल रेगिस्तान के अन्य छोटे जीव अपनी जान बचाने और रहने के लिए करते हैं. लेकिन दुखद बात यह है कि 1970 के दशक से अब तक कुछ इलाकों में इनकी आबादी 96% तक कम हो गई है.

ऑफ-रोड वाहन (OHVs) इन कछुओं के लिए काल बन गए हैं. जब ये भारी गाड़ियां रेगिस्तान की कच्ची जमीनों पर दौड़ती हैं, तो वे अनजाने में कछुओं के बिलों को कुचल देती हैं. बिल दबने से कछुए अंदर ही घुटकर मर जाते हैं या उनके पास छिपने की जगह नहीं बचती. इसके अलावा, गाड़ियों से उड़ने वाली धूल वनस्पतियों को बर्बाद कर देती है, जिसे खाकर ये कछुए जीवित रहते हैं.

96% कछुए खत्म हो गए! मोजावे डेजर्ट में तबाही का मंजर देख जज ने लगा दिया ऑफ-रोडिंग पर बैन. (फाइल फोटो : रॉयटर्स)

अदालत ने अपने आदेश में क्या कहा है?

  • जज इल्स्टन ने अपने आदेश में साफ कहा कि ब्यूरो ऑफ लैंड मैनेजमेंट (BLM) इन कछुओं की रक्षा करने में विफल रहा है. कोर्ट ने पाया कि ऑफ-रोड वाहनों का बढ़ता इस्तेमाल कछुओं की आबादी में गिरावट का एक मुख्य और निरंतर कारण है.
  • जज ने प्रशासन को 2029 तक का समय दिया है ताकि वे ऑफ-रोड रास्तों का एक नया और सुरक्षित नेटवर्क तैयार कर सकें. तब तक के लिए संवेदनशील इलाकों में आवाजाही पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी.

हालांकि, इस फैसले को लागू करना इतना आसान नहीं है. लगभग 50 लाख एकड़ के विशाल क्षेत्र की निगरानी के लिए प्रशासन के पास केवल 15 रेंजर मौजूद हैं. इतने कम स्टाफ के साथ हजारों मील के रास्तों पर फेंसिंग करना और लोगों को रोकना एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है.

ऑफ-रोडर्स और पर्यावरणविदों के बीच छिड़ा ‘शीत युद्ध’

इस फैसले ने समाज को दो हिस्सों में बांट दिया है. एक तरफ ‘सेंटर फॉर बायोलॉजिकल डायवर्सिटी’ जैसे संगठन हैं, जो इसे एक बड़ी जीत मान रहे हैं. उनका तर्क है कि सार्वजनिक जमीन किसी एक समूह के मनोरंजन के लिए बर्बाद नहीं की जा सकती. वहीं दूसरी तरफ, ऑफ-रोडिंग कम्युनिटी का कहना है कि उन्हें बलि का बकरा बनाया जा रहा है.

कैलिफोर्निया कोर्ट के फैसले से खतरे में पड़ा करोड़ों का टूरिज्म बिजनेस. (फाइल फोटो : रॉयटर्स)

‘ब्लू रिबन कोएलिशन’ जैसे संगठनों का दावा है कि कछुओं की मौत के लिए जलवायु परिवर्तन, सूखा और शिकार करने वाले कौवे (Ravens) ज्यादा जिम्मेदार हैं, न कि गाड़ियां. इस बैन की वजह से लूसेर्न वैली और रैंड्सबर्ग जैसे छोटे शहरों की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ेगा, जो पूरी तरह से ऑफ-रोड टूरिज्म पर निर्भर हैं. कई कारोबारियों का कहना है कि यह ऐसा ही है जैसे किसी स्की-टाउन में जाकर पहाड़ों को ही बंद कर दिया जाए.

सिर्फ रास्ते बंद करना काफी है?

विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ रास्ते बंद करना काफी नहीं है. मोजावे में कछुओं के सामने कई चुनौतियां हैं.

कौवों का आतंक: मानव विकास के साथ रेगिस्तान में कौवों की तादाद बेतहाशा बढ़ी है, जो छोटे कछुओं को खा जाते हैं.

बीमारियां: पालतू कछुओं को जंगल में छोड़ने से फैली सांस की बीमारियों ने भी इनकी आबादी को नुकसान पहुंचाया है.

सौर ऊर्जा प्रोजेक्ट: रेगिस्तान में लग रहे बड़े सोलर फार्म भी इनके प्राकृतिक आवास को छीन रहे हैं.

वैज्ञानिक एड ला रू का कहना है कि अगर हमें कछुओं को वापस लाना है, तो हमें मोजावे के कुछ हिस्सों को पूरी तरह फेंसिंग करके सुरक्षित करना होगा, जैसा कि ‘डेजर्ट टॉरटॉइज रिसर्च नेचुरल एरिया’ में किया गया है. वहां कछुओं की आबादी में सुधार देखा गया है.

क्या कछुओं के बिना रेगिस्तान बचेगा?

इंसानी नजरिए से अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि ‘एक कछुए के रहने या न रहने से क्या फर्क पड़ता है?’ लेकिन असलियत यह है कि अगर यह कीस्टोन स्पीशीज खत्म हुई, तो रेगिस्तान की पूरी चेन टूट जाएगी. बिना बिलों के छोटे जानवर गर्मी से मर जाएंगे और पूरा ईकोसिस्टम बंजर हो जाएगा. यह लड़ाई सिर्फ उस संतुलन को बचाने की है जो धरती पर जीवन को संभव बनाता है.



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