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Lt Col C Dwarkesh, the country’s first blind army officer | देश के पहले नेत्रहीन आर्मी ऑफिसर Lt. Col. सी. द्वारकेश: सियाचिन ग्लेशियर पर 16,000 फीट की चढ़ाई की, राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, जानें प्रोफाइल

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11 मिनट पहले

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लेफ्टिनेंट कर्नल सी. द्वारकेश को 2025 का विकलांगजन राष्ट्रीय पुरस्कार ‘श्रेष्ठ अयोग्यजन’ श्रेणी में दिया गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नई दिल्ली में आयोजित समारोह में उन्हें यह सम्मान दिया। यह कार्यक्रम विश्वभर में मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय जन दिवस (3 दिसंबर) के अवसर पर आयोजित किया गया था।

यह उन्हें देश के प्रति उनके अद्वितीय योगदान, अद्वितीय दृढ़ता और सशस्त्र सेनाओं में समग्रता को बढ़ावा देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए सम्मान देता है।

दुर्घटना के बाद 8 महीने अस्पताल में

अपने जर्नी के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘एक सेना अधिकारी के होने के नाते, विश्वास, दृढ़, इच्छाशक्ति और जजरूपन हमारी ट्रेनिंग में विकसित होता है। लेकिन ‘अंधेरापन मेरे लिए एक बड़ा बाधा था।’

द्वारकेश ने अपनी आंखों से आखिरी बार साल 2014 में एक सैन्य हमले में बास्केटबॉल मैच देखा था। इसके बाद दुर्घटना में उन्होंने दोनों की आंखों की रोशनी खो दी। हादसे के बाद द्वारकेश ने 8 महीने अस्पताल में बिताया। उनके शिष्यों की दुर्घटना के बाद की स्थिति बेहद गंभीर थी। चेहरे में कई जगह प्लांट थे, जहां 30 इंप्लांट लगाए गए थे। बाई मशीन में 30 पोर्टेबल वोल्ट का इंप्लांट डाला गया और हिप डिस्लोकेट होने के कारण वे महीनों तक सिर से उठ भी नहीं पाए।

दार्शनिक ने अपने माता-पिता को कहा था कि अब उनकी आंखों की रोशनी कभी वापस नहीं आएगी। लेकिन उनके पिता ने यह सच्चाई कुछ साल बाद छुपे छुपे रिश्ते से शुरू की। परिवार उन्हें यही विश्वास दिलाता है कि एक दिन वो देख लेगी। इसी तरह की उम्मीद है कि वे उन्हें कई सुविधाएं, परंपराएं और जहां भी संभव हो ले जाया जाएगा। द्वारकेश कहते हैं कि उन दिनों वे रोज कई घंटे तक अस्पताल में यही प्रार्थना करते थे कि उनकी आंखों की रोशनी लौट आए और वे फिर से सेना में अपनी ड्यूटी कर सकें।

सेना ने उन्हें खत्म नहीं किया, क्योंकि उनमें सबसे बड़ी ताकत, जज्बा और दृढ़ता है। वे तकनीक और मेहनत की मदद से अपनी सभी जिम्मेदारियां प्रभावशाली तरीकों से निभाते हैं।

पैरा बैटल चैंपियनशिप में पहला पदक जीता

2018 में जब उनकी पोस्टिंग खड़की में थी, तो उन्होंने बॉम्बे इंजीनियरिंग ग्रुप में बने नए पैरालंपिक नाइट में पैरा-स्पोर्ट्स की दौड़ शुरू कर दी। उन्होंने शुरुआत से ही तैराकी की। उनके स्वामित्व में वृद्धि हुई क्योंकि वे स्टेट और लेवल नेशनल पर अच्छे स्टॉक वाले लगे हुए थे। रिक्रिएशन के बाद सबसे पहला मेडल पैरासेल चैंपियनशिप में जीता।

द्वारकेश ने यूजीसी-नेट परीक्षा भी उत्तीर्ण की

द्वारकेश इस समय भारतीय पैरा शूटिंग टीम का हिस्सा हैं। मध्य प्रदेश के महू स्थित आर्मी मार्क्समैनशिप यूनिट (एएमयू) में ट्रेनिंग ले रहे हैं। पिछले 5 वर्षों में द्वारकेश ने तैराकी और शूटिंग में नेशनल रिकार्ड बनाया और पैरा स्पोर्ट्स में सफलता हासिल की।

द्वारकेश ने यूजीसी-नेट एग्जाम भी पास किया है। इसमें वे बहुत ही कम दृष्टि वाले लोग शामिल हो गए हैं जो इम्प्रूवमेंट, एचआर, लेबर ला और स्पोर्ट्स स्पोर्ट्स जैसे कठिन विषय सीखते और सिखाते हैं।

स्क्रीन-रिडर की मदद से यूट्यूब वीडियो देखें

लेफ्टिनेंट कर्नल दीपकेश ने कहा कि वे स्कूल के दिनों से ही स्पोर्ट्समैन रह रहे हैं और प्रशिक्षण के दौरान भी खेलों में सक्रिय रहते हैं। लेकिन चोट के बाद आशिक ने साफा से कहा था कि उनके डिवाइस में इंप्लांट और हिप डिस्लोकेशन के लिए उन्हें किसी भी तरह का सीक्वल फिजिकल सर्जरी से दूर रखा गया है।

द्वारकेश कहते हैं कि यह समय कठिन था क्योंकि वे ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे। लेकिन उनके मन में एक ही बात थी- आंख मूंदकर समय लागे, मुझे अपने लक्ष्य पर खड़ा होना है और क्षमता के अनुसार खेल और रोमांच को फिर से जीना है।

स्टोरी- किशन कुमार, दैनिक भास्कर फेलो

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