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गैस सिलेंडर की कमी और महंगाई के कारण कई लोग इंडक्शन कुकटॉप पर स्विच कर रहे हैं, लेकिन यह बदलाव उतना आसान नहीं होता. इंडक्शन तेज, सुरक्षित और ज्यादा एनर्जी एफिशिएंट है, पर भारतीय किचन की आदतों और पारंपरिक बर्तनों के कारण कई दिक्कतें आ सकती हैं. खासकर इंडक्शन पर सिर्फ मैग्नेटिक बेस वाले बर्तन ही काम करते हैं, इसलिए कई घरों को नए बर्तन खरीदने पड़ते हैं. साथ ही बिजली पर निर्भरता और हीट कंट्रोल का अलग तरीका भी इस बदलाव को थोड़ा चुनौतीपूर्ण बना देता है. इसलिए एलपीजी की जगह इंडक्शन पर स्विच करने से पहले 8 फैक्ट्स को जरूर जान लें.
हाल के दिनों में गैस सिलेंडर की कमी और महंगाई के कारण कई परिवार गैस स्टोव से इंडक्शन कुकटॉप पर स्विच कर रहे हैं. लेकिन यह बदलाव इतना आसान नहीं है. इंडक्शन तेज, सुरक्षित और बिजली बचाने वाला है, लेकिन भारतीय रसोई के परंपरागत बर्तनों और खाने की आदतों के साथ इससे चुनने पर कई चुनौतियां आती हैं. इंडक्शन पर स्विच करने से पहले ये कड़वी सच्चाइयां जानना जरूरी है, ताकि आपकी रसोई में परेशानी न आए. इंडक्शन हीटिंग का तरीका अलग है होता है. यह बर्तन को सीधे गर्म करता है, जबकि गैस की लौ बर्तन के नीचे से गर्मी देती है.

इंडक्शन और गैस में मुख्य अंतर क्या है? गैस पर आप लौ को तुरंत बढ़ा-घटा सकते हैं, जो भारतीय खाने जैसे तड़का, भूनना या फ्लेमिंग के लिए बहुत उपयोगी है. इंडक्शन पर हीटिंग बहुत तेज होती है, लेकिन कंट्रोल थोड़ा अलग है. यह प्रीसेट लेवल पर काम करता है. इंडक्शन ज्यादा एनर्जी एफिशिएंट है (85-90% हीट बर्तन तक पहुंचती है), जबकि गैस में सिर्फ 40-50%. इंडक्शन सुरक्षित है क्योंकि सतह ठंडी रहती है और कोई खुली लौ नहीं होती, लेकिन पावर कट होने पर काम नहीं करता. यह बड़ा मुद्दा है भारत में जहां बिजली की समस्या आम है.

सबसे बड़ी चुनौती है बर्तनों की कम्पैटिबिलिटी. इंडक्शन केवल उन बर्तनों पर काम करता है जिनका बेस मैग्नेटिक होता है. आप एक मैग्नेट लेकर चेक कर सकते हैं. अगर मैग्नेट बर्तन के नीचे चिपक जाए, तो वह इंडक्शन पर चलेगा. कास्ट आयरन (लोहे के), स्टेनलेस स्टील (कुछ ग्रेड), और एनामेल्ड स्टील वाले बर्तन अच्छे काम करते हैं. लेकिन ज्यादातर भारतीय घरों में एल्यूमिनियम, कॉपर, ग्लास या साधारण स्टील के बर्तन होते हैं, जो इंडक्शन पर नहीं चलते. इनके लिए आपको नए इंडक्शन-फ्रेंडली बर्तन खरीदने पड़ेंगे, जो महंगे पड़ सकते हैं.
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इंडक्शन पर कौन-कौन से बर्तन काम नहीं करते? एल्यूमिनियम का तवा, कॉपर का बर्तन, पतली स्टील की कढ़ाई, ग्लास या सिरेमिक के बर्तन बिना मैग्नेटिक बेस के बेकार हो जाते हैं. कई लोग पुराने बर्तनों को इंडक्शन पर रखकर निराश हो जाते हैं. अगर आपका तड़का लगाने वाला कढ़ाई एल्यूमिनियम का है, तो इंडक्शन पर नहीं चलेगा. कुछ कंपनियां इंडक्शन बेस वाली कंपनियां एल्यूमिनियम बर्तन बेचती हैं, लेकिन महंगे होते हैं. इसके वजह से पुराने बर्तनों को अलग रखना पड़ता है या उन्हें हटाना पड़ेगा.

इंडक्शन पर खाना बनाने में क्या कठिनाई आती है? कई लोग कहते हैं कि इंडक्शन पर रोटी या फुलका सेकना मुश्किल होता है, क्योंकि लौ की तरह तुरंत हाई हीट नहीं मिलती. भारतीय खाने में भूनना, तड़का लगाना या दाल-चावल को सही तरीके से पकाना सीखने में समय लगता है. इंडक्शन तेज गर्म करता है, लेकिन ओवरकुक होने का खतरा रहता है. शुरुआत में खाना जलेगा या अधपका रहेगा. साथ ही, इंडक्शन पर बर्तन का बेस फ्लैट और मोटा होना चाहिए, वरना हीटिंग असमान होती है.

इंडक्शन के फायदे भी कम नहीं हैं. यह बहुत सुरक्षित रहता है. ये बच्चों के लिए अच्छा क्योंकि कोई गैस लीक का डर नहीं होता है. सफाई आसान है क्योंकि सतह ठंडी रहती है और कोई जली हुई चीज चिपकती नहीं. बिजली के बिल में बचत हो सकती है अगर यूज सही हो. गैस की कीमत बढ़ने पर इंडक्शन सस्ता पड़ सकता है. कई लोग अब बैकअप के रूप में इंडक्शन खरीद लेते हैं ताकि गैस खत्म होने पर इसपर खाना बना सकें.

लेकिन स्विच करने से पहले ये बातें ध्यान रखें. अगर आपके घर में पावर कट ज्यादा होते हैं, तो इंडक्शन अकेला काफी नहीं. गैस को बैकअप जरूर रखें. इसी के साथ नए बर्तन खरीदने का भी खर्चा जोड़ें. इंडक्शन कुकटॉप अच्छी क्वालिटी का लें, जिसमें प्रीसेट मोड्स हों (जैसे दाल, चावल, फ्राई). भारतीय ब्रांड जैसे प्रेस्टिज, बजाज या फिलिप्स आदि अच्छे ऑप्शन हो सकते हैं. पहले कम मात्रा में खाना बनाकर देखें. उसके बाद ही ज्यादा बनाएं ताकि आपको पहले से आइडिया हो कि कैसे बनाना है.

गैस से इंडक्शन पर स्विच करना अच्छा फैसला हो सकता है, लेकिन जल्दबाजी न करें. भारतीय रसोई की जरूरतों को ध्यान में रखकर प्लान करें. अगर आपके पास पहले से कुछ इंडक्शन-फ्रेंडली बर्तन हैं, तो आसान होगा. वरना नए सेट खरीदने पड़ेंगे. यह बदलाव स्वास्थ्य, सुरक्षा और एनर्जी सेविंग के लिए फायदेमंद है, लेकिन सच्चाई यह है कि गैस की तरह फ्लेक्सिबिलिटी और परंपरागत टेस्ट पूरी तरह नहीं मिलता.





