6 साल बाद खुला लिपुलेख, ओम पर्वत और आदि कैलाश पहुंचना आसान, रास्ते में दिखेंगे ये 5 जन्नत जैसे नजारे


लिपुलेख भारत के उत्तराखंड में पिथौरागढ जिले के तहत स्थित पहाड़ी दर्रा है. यानी यहां से हिमालय के विशाल पहाड़ से आगे जाया जा सकता है. 17 हजार 500 फुट की ऊंचाई पर स्थित लिपुलेख सामरिक लिहाज से इतने संवेदनशील है कि यह तीन देशों यानी भारत, तिब्बत और नेपाल के ट्राइजंक्शन को जोड़ता है.पिछले 6 साल से लिपुलेख दर्रा बंद था लेकिन अब इसे खोल दिया जाएगा. लिपुलेख दर्रा सदियों से भारतीय उपमहाद्वीप और तिब्बत के बीच प्राचीन व्यापार मार्ग का ऐतिहासिक रास्ता रहा है. तिब्बत का व्यापारिक शहर तकलाकोट यहां से महज 15 किलोमीटर की दूरी पर है. खास बात यह है कि एडवेंचर के शौकीन टूरिस्ट के लिए लिपुलेख खुलने के बाद कुछ जन्नत वाले स्पॉट का द्वार खुल जाएंगे. लिपुलेख तक पहुंचने के लिए शानदार सड़क बन चुकी है. यहां से आदि कैलाश, ओम पर्वत, कैलाश मानसरोवर और आसपास के गांव का अब वे आसानी से दीदार कर सकेंगे. आइए इन 5 हिमालयन टूरिस्ट स्पॉट के बारे में जानते हैं.

कैलाश मानसरोवर
कैलाश मानसरोवर वैसे तो धार्मिक तीर्थ स्थल माना जाता है लेकिन जो लोग रोमांचक टूरिस्ट स्पॉट की तलाश में हैं उनके लिए यह जन्नत से कम नहीं है. यहां की प्राकृतिक खूबसूरती आपको अंदर से रुहानी सुकून देगी. कैलाश मानसरोवर समुद्र तल से लगभग 21,778 फीट की ऊंचाई पर स्थित है. कैलाश पर्वत अपने पिरामिड नुमा आकार और साल भर बर्फ से ढके रहने के कारण एक रहस्यमयी आकर्षण पैदा करता है. हम मानते हैं कि भगवान भोलेनाथ का यह निवास स्थान है. हम कैलाश पर्वत पर कभी नहीं चढ़ते सिर्फ दर्शन करते हैं. कैलाश पर्वत के ठीक दक्षिण में स्थित मानसरोवर झील दुनिया की सबसे ऊंचाई पर स्थित झील है, जिसका नीला पानी और शांत वातावरण पर्यटकों को मानसिक शांति प्रदान करता है. लिपुलेख दर्रा खुलने से कैलाश मानसरोवर जाना-आना अब लगभग एक सप्ताह का काम रह गया है.

कैलाश मानसरोवर कैसे जाएं-दिल्ली से जाने के लिए आपको काठगोदाम जाना होगा. यहां से पिथौरागढ़ और उसके बाद धारचूला जाना होगा. फिर यहां से लिपुलेख तक की 80 किमी लंबी सड़क बनी है. लिपुलेख पार कर तिब्बत में प्रवेश करना होगा. फिर यहां से कैलाश मानसरोवर की यात्रा करनी होगी.

आदि कैलाश
आदि कैलाश को छोटा कैलाश भी कहा जाता है. यह भी इसी रूट पर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित है. पहाड़ों पर रोमांचक और एडवेंचर वाली यात्रा करने के शौकीनों के लिए आदि कैलाश शानदार विकल्प है. रास्ते का मंत्रमुग्ध कर देने वाली सुंदरता हर तरह से जन्नत का एहसास कराता है. जो लोग प्रकृति और आध्यात्मक दोनों में रुचि रखते हैं उनके लिए तो आदि कैलाश की यात्रा सपने पूरा होने जैसा है. आदि कैलाश अपनी अलौकिक सुंदरता और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है. आदि कैलाश भी मानसरोवर यात्रा के समान ही पुण्यदायी मानी जाती है.यहां जोलिंगकोंग झील जिसे पार्वती ताल भी कहा जाता है अद्भुत है. इस झील के पानी में पर्वत स्पष्ट प्रतिबिंब दिखाई देता है,जो पर्यटकों के लिए एक अद्भुत दृश्य है.

आदि कैलाश कैसे जाएं- लिपुलेख तक पक्की सड़क का निर्माण होने से आदि कैलाश जाना अब बहुत आसान हो गया है. पहले यात्रियों को धारचूला से आगे कई दिनों तक कठिन पैदल ट्रेकिंग करनी पड़ती थी. अब सड़क बनने से पर्यटक सीधे वाहनों द्वारा जोलिंगकोंग तक पहुंच सकते हैं.दिल्ली से काठगोदाम या हल्द्वानी तक ट्रेन या बस जाती है. यहां से अल्मोड़ा होते हुए धारचूला (लगभग 280-300 किमी) तक का सफर तय करना होता है. धारचूला से विशेष परमिट लेने के बाद जीप या स्थानीय वाहनों के जरिए तवाघाट, पांगला और गुंजी होते हुए जोलिंगकोंग (आदि कैलाश बेस) पहुंचा जाता है.

ओम पर्वत

ओम पर्वत भी इसी मार्ग में स्थित है और आदि कैलाश के पास ही है. ओम पर्वत पर ओम आकृति की दृश्यावली दिखती है और ऐसा माना जाता है कि यह लिटिल कैलाश है और यहां भगवान शिव अक्सर आते जाते रहते हैं. यहां बर्फ गिरने पर प्राकृतिक रूप से ‘ॐ’ की आकृति उभरती है.इसके पास गौरी कुंड स्थित है.कहा जाता है कि पूरी दुनिया में ऐसे 8 पर्वत ऐसे हैं जहां ‘ॐ’ की आकृति बनती है लेकिन वर्तमान में केवल इसी पर्वत के बारे में जानकारी उपलब्ध है. यहां की यात्रा आपको कुटी, नाभी और गुंजी जैसे व्यास घाटी के सुदूर गांवों से होकर ले जाती है,जहां आप स्थानीय भोटिया संस्कृति और उनकी परंपराओं को करीब से देख सकते हैं. इस रास्ते का अद्भुत नजारा आपके मन को मोह लेगा.

ओम पर्वत कैसे पहुंचे- जब आप धारचूला से आदि कैलाश की यात्रा पर निकलते हैं तो रास्ते में गुंजी नामक स्थान आता है. यहां से रास्ता दो भागों में बंट जाता है. एक रास्ता जोलिंगकोंग की ओर जाता है जहां आदि कैलाश है. दूसरा रास्ता नाभीढांग की ओर जाता है जहां से ओम पर्वत के दर्शन होते हैं. आमतौर पर तीर्थयात्री एक ही दौरे में इन दोनों पवित्र स्थलों के दर्शन करते हैं. दिल्ली से ओम पर्वत जाने के लिए वही मार्ग है जो आदि कैलाश की ओर जाता है.

व्यास गुफा
व्यास गुफा भारत-चीन सीमा के पास गुंजी के समीप स्थित है. माना जाता है कि महर्षि वेद व्यास ने यहाँ वर्षों तक तपस्या की थी और वेदों की रचना की थी. यहां की चट्टानों पर ऐसी प्राकृतिक आकृतियां हैं जिन्हें व्यास पोथी कहा जाता है. यह कालापानी के पास स्थित है जो काली नदी का उद्गम स्थल भी है.यहां की यात्रा के दौरान आप स्थानीय भोटिया जनजाति की अनूठी जीवनशैली को देख सकते हैं.

चंडाक हिल्स
पिथौरागढ़ शहर से मात्र 7-8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित चंडाक हिल्स एक शांत और मनोरम हिल स्टेशन है. यह स्थान अपनी ऊंचाई और वहां से दिखने वाले हिमालय के नज़ारों के लिए प्रसिद्ध है. यहां से पंचाचूली, नंदा देवी और अपी-नम्पा जैसी ऊंची चोटियों के स्पष्ट और भव्य दर्शन होते हैं. एडवेंचर और ट्रेकिंग के शौकीनों के लिए यह जन्नत है.यह क्षेत्र हैंग-ग्लाइडिंग और छोटे ट्रेक के लिए बहुत लोकप्रिय है.

थल केदार
यह पिथौरागढ़ का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है, जो समुद्र तल से लगभग 8000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है. इसे स्थानीय लोग ‘केदारनाथ’ के समान ही पवित्र मानते हैं. यहां भगवान शिव का एक अति प्राचीन मंदिर है, जहां महाशिवरात्रि पर हज़ारों श्रद्धालु पहुंचते हैं.यहां पहुंचने के लिए घने जंगलों के बीच से होकर लगभग 4-5 किलोमीटर की चढ़ाई करनी पड़ती है, जो प्रकृति प्रेमियों के लिए सुखद अनुभव है. चोटी पर पहुँचने के बाद पूरी सोहरा घाटी (पिथौरागढ़) का विहंगम दृश्य दिखाई देता है.

इन जगहों पर कैसे पहुंचे –लिपुलेख दर्रे तक पक्की सड़क बनने से इन जगहों पर जाना अब बहुत आसान हो गया है. पहले व्यास गुफा पहुँचने में कई दिन की पैदल यात्रा लगती थी, जो अब वाहनों के जरिए कुछ ही घंटों में संभव है.

लंदन फोर्ट- पिथौरागढ़ जिले में ही शहर के बीचों-बीच एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित लंदन फोर्ट कुमाऊं क्षेत्र का एक प्रमुख ऐतिहासिक और पर्यटन स्थल है. इस किले का इतिहास अत्यंत रोचक है और यह क्षेत्र के उतार-चढ़ाव भरे अतीत का गवाह रहा है.इस किले का निर्माण 1791 में गोरखा शासकों द्वारा किया गया था, जिसे ‘बाउली की गढ़’ के नाम से जाना जाता था. बाद में, जब 1815 में अंग्रेजों ने गोरखाओं को पराजित किया और इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया, तो उन्होंने इस किले का पुनर्निर्माण कराया और इसका नाम बदलकर लंदन फोर्ट रख दिया. अब इसे एक भव्य पर्यटन स्थल और संग्रहालय के रूप में विकसित कर दिया गया है.किले के उपर से पूरी पिथौरागढ़ घाटी (सोहरा घाटी) का विहंगम दृश्य दिखाई देता है. फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए यह एक शानदार स्पॉट है.

कैसे पहुंचें: पिथौरागढ़ बस स्टेशन से यह किला मात्र 1-2 किलोमीटर की दूरी पर है. शहर के मुख्य बाजार से पैदल या स्थानीय ऑटो के जरिए यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है.



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