
जवाहरलाल नेहरू की जीप पर जब डकैतों ने किया कब्जा
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का निधन 27 मई 1964 को हुआ था। जवाहर लाल नेहरू न केवल भारत के पहले प्रधानमंत्री थे, बल्कि आज भारत जिस स्थिति में खड़ा है, उसके निर्माता भी थे। दूरगामी सोच रखने वाले कुशल राजनेता थे। जाहिर सी बात है कोई व्यक्ति पूरी तरह सही नहीं होता। इतिहास में कुछ गलतियां भी हुईं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने भारत के लिए कुछ नहीं किया। उत्साहित भारत जिस समय आजाद हुआ, उस समय हमारे पास खाने तक को अनाज नहीं था। उस समय प्रधानमंत्री ने कुर्सी संभाली थी। कई लोग गुस्से में थे, बावजूद इसके उन्होंने सभी बातों का सामना किया। साधारण शब्दों में कहें तो आज के भारत की नींव जवाहर लाल नेहरू ने ही रखी थी। ऐसे में जब आज उनकी पुण्यतिथि पर हम आपको उनकी जन्मतिथि से जुड़ी एक अद्भुत कहानी बताने जा रहे हैं।
डकैतों ने रोकी जमीन की जीप
उत्साहित ये कहानी तब की है जब कुछ चंबल के दौरे पर जा रहे थे। इस समय चंबल का पूरा इलाका संयुक्त प्रांत में आता था। यह बात आज़ादी से पहले की है। इस दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में भ्रमण किया गया और अंग्रेजी शासन के खिलाफ भारतीयों को एकजुट करने का काम कर रहे थे। यह वर्ष 1937 का था। अपनी जीप से चंबल के रास्ते से लौट रहे थे। इस दौरान उनकी जीप पर बीहड़ के डकैतों ने कब्जा कर लिया। पंडित जी चंबल के बीहड़ों और यहां के डकैतों से अनजान नहीं थे। बता दें कि गांव की गाड़ी रोकने वाले डकैतों की संख्या 8-10 थी। सभी डकैत अपनी गाड़ी के आगे खड़े हो गए। हालांकि डाकुओं को इस बात का जरा भी अंदेशा नहीं था कि उन्होंने किसकी गाड़ी पर कब्जा कर लिया।
डकैतों को हुई गलतियाँ, अब उन्हें समझे धन्ना सेठ
डकैतों को लग रहा था कि जीप जा रहा शख्स को मोटी मालदार पार्टी है। प्रेरित उस समय जीप केवल रईसों के पास होती थी। इसी कारण डाकुओं के मन में यह शंका उत्पन्न हुई। इसी दौरान वहां की ज़मीन से आवाज आती है कि कौन है… आवाज देने वाला आदमी, डाकुओं का सरदार था। डकैत उसे कहते हैं कोई सेठ है। यह सुनकर जब डकैतों का सरदार बाहर आया। लेकिन अबतक दर्जनों और उनके साथ जीप में सवार लोग ये समझ चुके थे कि डकैतों ने उन्हें कोई मालदार सेठ समझ लिया है। इस मिथक को तोड़ना जरूरी था। इसलिए जवाहर लाल खुद जीप से उतरकर डकैतों के सरदार के पास चले गए।
जब डकैत ने दिया पैसा
डकैतों के सरदार से मिलकर जवाहर लाल नेहरू ने कहा कि मैं पंडित जवाहर लाल नेहरू हूं। यह सुनकर बीहड़ में सन्नाटा फैल गया। इसके बाद सरदार की आंखों में जो लूटपाट करने को लहलहा उठी, उनमें ग्लानि पैदा हो गई। जवाहर लाल नेहरू ने उस डकैत से पूछा कि हमें जल्दी बताऊं क्या करना है, क्योंकि हमें दूर जाना है। इसके बाद बागियों के सरदार ने अपने कोट की जेब में हाथ डाला और मजेदार नोट निकालकर दे दिया। इस दौरान डाकुओं के सरदार ने कहा कि आपका बहुत नाम सुना था। आज दर्शन भी हो गए। सुराज (स्वराज) के काज के लिए हमारी छोटी सी भेंट स्वीकार करें। इसके बाद चंबल में यह खबर आग की तरह फैली थी कि जवाहर लाल नेहरू की मुलाकात डकैत से हुई थी।
