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ISRO LVM-3 Mission Satellite Launch LIVE Video Update; Indian Navy | Sriharikota | बाहुबली रॉकेट भारतीय जमीन से सबसे भारी सैटेलाइट लेकर गया: कारगिल जंग से सबक लेकर इसरो ने बनाया अपना सैटेलाइट नेटवर्क, नेवी की ताकत बढ़ेगी

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श्रीहरिकोटा4 दिन पहले

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इसरो ने श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष केंद्र से CMOS-03 उपग्रह लॉन्च किया। -दैनिक भास्कर

इसरो ने श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष केंद्र से CMOS-03 उपग्रह लॉन्च किया।

इसरो ने आज 2 नवंबर को शाम 5:26 बजे जापानी रॉकेट से 4400 किलों का सैटेलाइट लॉन्च किया। यह भारतीय भूमि से जियोसिंक्रोनस पोस्टर ऑर्बिट (जीटीओ) तक लॉन्च होने वाला सबसे भारी उपग्रह है। ये नौसेना की कम्युनिकेशन ताकतों को और मजबूत बनाएगी।

जीटीओ (29,970 किमी x 170 किमी) एक स्कूटर ऑर्बिट है। रॉकेट ने इस ऑर्बिट को उपग्रह में छोड़ दिया है। अब कल सैटेलाइट इंजन को फायर किया जाएगा और इस ऑर्बिट को सर्कुलर कर दिया जाएगा। इसे जियोरी ऑर्बिट (GEO) कहते हैं। इसमें सैटेलाइट 24 घंटे का ऑफर दे सकता है।

इससे पहले इसरो ने चंद्रयान-3 मिशन में 3900 किलोग्राम का पेलोड जीटीओ भेजा था। जीटीओ में भेजा गया दुनिया का सबसे भारी सैटेलाइट इकोस्टार 24 (ज्यूपिटर 3) है। इसका लॉन्च समय करीब 9,000 किलो वजन था। इसे स्पेसएक्स के फाल्कन रॉकेटवी द्वारा लॉन्च किया गया था।

कम्युनिकेशन सैटेलाइट CMOS-03 लॉन्च मिशन से जुड़ी 5 तस्वीरें…

लॉन्च की गई डॉ. इसरो के डॉ. की डॉ. वी. नारायणन और अन्य वैज्ञानिक

लॉन्च की गई डॉ. इसरो के डॉ. की डॉ. वी. नारायणन और अन्य वैज्ञानिक

ये उपग्रह नौसेना की संचार सुविधाओं को मजबूत बनाएंगे। नेवी अवधि के दौरान स्टार्स भी लॉन्चिंग के मौजूद रहे।

ये उपग्रह नौसेना की संचार सुविधाओं को मजबूत बनाएंगे। नेवी अवधि के दौरान स्टार्स भी लॉन्चिंग के मौजूद रहे।

इसरो ने शाम करीब 05:30 बजे 4400 किलों का सैटेलाइट लॉन्च किया।

इसरो ने शाम करीब 05:30 बजे 4400 किलों का सैटेलाइट लॉन्च किया।

LVM3 लॉन्च किया गया बिज़नेस की ये पांचवी ऑपरेशनल फ़्लाइट (LVM3-M5) है।

LVM3 लॉन्च किया गया बिज़नेस की ये पांचवी ऑपरेशनल फ़्लाइट (LVM3-M5) है।

डिज़ाइन की असेंबलिंग होने के बाद इसे लॉन्च पैड पर लाया गया है।

डिज़ाइन की असेंबलिंग होने के बाद इसे लॉन्च पैड पर लाया गया है।

मिशन से जुड़ी 5 बड़ी बातें…

  • LVM3 लॉन्च किया गया बिज़नेस की ये पांचवी ऑपरेशनल फ़्लाइट (LVM3-M5) है। इसके अतिरिक्त भारी वजन वाले ले जा सैके के लिए इसमें पोर्टेबल चांगसेज दिए गए हैं। इसके अलावा थ्रस्ट बढ़ाने के लिए इंजन में भी कुछ बदलाव किये गये हैं। मैकेनिकल इंजीनियरिंग से इसे थोड़ा सा दर्शाया गया है।
  • CMS-03 एक मल्टी-बैंड संचार उपग्रह है, जो हिंद महासागर के बड़े क्षेत्र सहित पूरे भारतीय क्षेत्र को सेवा प्रदान करता है। ये भारत को कांतिन्यूअस सहायक बिजी। यह एक GSAT-7R सैटेलाइट है जिसका कोडवर्ड CMS-03 है। ये श्रीहरिकोटा स्पेसपोर्ट से लॉन्च हुआ।
  • ये पुराना हो चुका GSAT-7 (रुक्मिणी) सैटेलाइट का स्थान है, जो नौसेना के संचार का मुख्य आधार है। ‘रुकमिणी’ ने बने हुए कमांड सेंटरों के बीच युद्धपोत, पनदुब्बियां, प्रिंटर्स और किनारे बनाए, जो सुरक्षित रीयल-टाइम कनेक्टेड हैं।
  • CMS-03 सैटेलाइट भारत के नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर मजबूती को कई गुना मजबूत करेगा। ये नौसेना के संचालन, वायु रक्षा और सामरिक कमान नियंत्रण के लिए रियल-टाइम कम्युनिकेशन क्रूज़ स्क्वाड्रन, वो भी विशाल समुद्री क्षेत्र में।
  • जियोस्टोरी ऑर्बिट (GEO) यानी पृथ्वी से 36,000 किमी ऊपर की कक्षा। इस ऑर्बिट में उपग्रह पृथ्वी को लगातार देखा जा सकता है। ये 24 घंटे के लिए जरूरी है। इसी वजह से कम्युनिकेशन सैटेलाइट्स को हमेशा GEO में ही रखा जाता है।

विदेशी धरती से 5,854 किलों का सैटेलाइट लॉन्च कर इसरो को समर्पित किया गया

इसरो ने आम तौर पर फ्रेंचाना में यूरोपीय स्पेसपोर्ट पर हेवी कम्युनिकेशन सैटेलाइट लॉन्च किया है। ये पहली बार है जब ये भारतीय मिट्टी से 4.4 टन का सैटेलाइट लॉन्च हुआ।

इसरो ने पहले 5 दिसंबर 2018 को फ्रेंच से एरियन-5 रॉकेट की मदद से जीसैट-11 लॉन्च किया था, जो 5,854 किलो का था। ये इसरो का अब तक का सबसे भारी उपग्रह है।

लो अर्थ ऑर्बिट में 5,800 किलो का पेलोड इसरो को भेजा गया

LVM3 डिज़ाइन का सबसे भारी पेलोड लो अर्थ ऑर्बिट तक का रिकॉर्ड वन वेब मिशन से है। 5,800 किलों का पेलोड पृथ्वी से 450 किलोमीटर ऊपर भेजा गया था।

ये 36 छोटे सैटेलाइट्स का ग्रुप था, सिंगल नहीं। ऐसे में आज जो 4400 किलो वजनी सैटेलाइट भेजा गया है, वो सिंगल कम्युनिकेशन सैटेलाइट के मामले में नया रिकॉर्ड है।

कारगिल जंग में अमेरिकियों की मदद नहीं मिली तो खुद का सैटेलाइट नेटवर्क बनाया

1999 में हुई कारगिल जंग में संचार के लिए अमेरिका ने मदद से मना कर दिया था। इसके बावजूद भारत ने इस जंग में पाकिस्तान को हरा दिया था।

1999 में हुई कारगिल जंग में संचार के लिए अमेरिका ने मदद से मना कर दिया था। इसके बावजूद भारत ने इस जंग में पाकिस्तान को हरा दिया था।

1999 में कारगिल की ऊंची चोटियों पर आतंकवादियों की घुसपैठ हुई थी। भारतीय सेना को प्रशिक्षित और सैनिकों की पैदल यात्रा ट्रैक करने के लिए जीपीएस अर्थात, वैश्विक निजीकरण प्रणाली की सख्त जरूरत थी। भारत ने अमेरिका से मदद मांगी लेकिन उन्होंने मना कर दिया।

क्यों? वो पाकिस्तान के साथ रिश्ते में थे और भारत को सेंस सेंसुअल ऑर्डर डेटा नहीं देना चाहते थे। यह झटका इतना बड़ा था कि कारगिल ख़त्म होने के बाद भारत ने दो मोर्चों पर काम शुरू कर दिया।

1. जीपीएस जीपीएस सिस्टम

भारत के पास पहले से इनसैट सीरीज के सैटेलाइट थे, जो वॉयस कॉल्स, डेटा ट्रांसमिशन और सिचुएशनल अवेयरनेस में थोड़ी मदद कर रहे थे। लेकिन जीपीएस नेविगेशन नेविगेशन सिस्टम के रूप में नहीं था। आर्मी-एयरफोर्स के बीच कम्युनिकेशन गैप्स की वजह से कई मशहूर लोग सामने आए।

परिणाम? 2006 में IRNSS (इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम) प्रोजेक्ट शुरू हुआ, जो आज NavIC (नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन डिपार्टमेंट्स है। ये 7 सैटेलाइट्स का ग्रुप है, जो भारत और आसपास के 1500 किमी क्षेत्र में पेशेवर कौशल देता है।

मिशन की लाइफ ख़त्म हो रही है और कुछ सैटेलाइट्स के समय से पहले ख़राब हो जाने के कारण इस नेटवर्क पर नए सैटेलाइट्स की लगातार आधारशिला रखी जा रही है।

मिशन की लाइफ ख़त्म हो रही है और कुछ सैटेलाइट्स के समय से पहले ख़राब हो जाने के कारण इस नेटवर्क पर नए सैटेलाइट्स की लगातार आधारशिला रखी जा रही है।

2. जीएसएटी सीरीज का तेजी से वीडियोग्राफी के लिए कम्युनिकेशन

ये स्वदेशी कम्युनिकेशन सैटेलाइट्स की सीरीज है, जो जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट (GEO) में मिलते हैं। ये डिजिटल टीवी, इंटरनेट, वॉयस कॉल्स, डेटा ट्रांसमिशन और ब्रॉडकास्टिंग के युग में मौजूद हैं। कारिगल जंग के बाद पहला GSAT सैटेलाइट 18 अप्रैल 2001 को लॉन्च किया गया था।

GSAT उपग्रह श्रृंखला के डिफेंस के लिए एक्सक्लूसिव का उपयोग 2013 से शुरू हुआ, जब GSAT-7 (रुकमिणी) का प्रक्षेपण हुआ। ये पहला ऐसा सैटेलाइट था जो पूरी तरह से डेडिकेटेड था। हिंद महासागर में जवानों, पनडुबियों और कमांड सेंटरों को जोड़ने वाला।

लेकिन अब वो पुराना हो रहा है, और सीएमएस-03 का रोल उपलब्ध है। ये सैटेलाइट नेवी को ‘अपग्रेडेड रुक्मिनी’ दे रही है। ये सैटेलाइट मल्टी-बैंड कम्युनिकेशन देगा।

अर्थात, रीयल-टाइम वीडियो, डेटा और रणनीतिक नियंत्रण, विशेष रूप से हाई-सीज पर। कारगिल जंग में अगर ऐसा होता है, तो जीपीएस डायनायल के बावजूद नेवी का नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर कई गुना मजबूत होता है। एयरफोर्स के लिए भी GSAT-7A को 2018 में लॉन्च किया गया था।

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