दरअसल, भारत का स्वदेशी लंबी दूरी का एयर डिफेंस प्रोग्राम ‘प्रोजेक्ट कुश’ (ERADS) अब रूसी S-400 ट्रायम्फ सिस्टम के एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर रहा है. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित यह परियोजना न केवल क्षमता के लिहाज से प्रतिस्पर्धी बताई जा रही है, बल्कि लागत, स्वामित्व और लॉन्ग टर्म ऑपरेशन के मामले में भी महत्वपूर्ण बढ़त देती दिख रही है. सबसे बड़ा अंतर लागत के स्तर पर दिखाई देता है. भारत ने पांच S-400 स्क्वाड्रन के लिए लगभग 5.43 अरब डॉलर (करीब 45,000 करोड़ रुपये) का समझौता किया था. इसके मुकाबले प्रोजेक्ट कुश के तहत समान क्षमता वाले पांच स्क्वाड्रन लगभग 21,700 करोड़ रुपये में विकसित किए जाने का अनुमान है. यानी कुल लागत में करीब 30 से 40 प्रतिशत तक की बचत संभव है, जो रक्षा क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है. यह इनपुट कॉस्ट बेनिफिट (लागत लाभ) केवल सिस्टम तक सीमित नहीं है, बल्कि मिसाइलों के स्तर पर भी देखने को मिलता है. कुश के तहत विकसित होने वाली M1, M2 और M3 इंटरसेप्टर मिसाइलों की प्रति यूनिट लागत करीब 40 से 50 करोड़ रुपये रहने की उम्मीद है, जो कि रूसी 40N6 और 48N6 जैसी मिसाइलों की तुलना में लगभग आधी है. इस किफायती निर्माण का श्रेय पूरी तरह स्वदेशी उत्पादन ढांचे को जाता है, जिसमें भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) उन्नत AESA रडार सिस्टम विकसित कर रहा है, जबकि भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) मिसाइल निर्माण और ड्यूल-पल्स प्रोपल्शन जैसी तकनीकों पर काम कर रही है.
प्रोजेक्ट कुश के तहत डेवलप एयर डिफेंस सिस्टम को भारत अपनी जरूरतों के हिसाब से मॉडिफाई कर सकेगा. S-400 ट्रायंफ में यह इतना आसान नहीं है. (फाइल फोटो/PTI)
प्रोजेक्ट कुश की सबसे बड़़ी ताकत
प्रोजेक्ट कुश की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत ‘सॉफ्टवेयर सॉवरेंटी’ मानी जा रही है. विदेशी सिस्टम के विपरीत (जहां सोर्स कोड तक सीमित या कोई पहुंच नहीं होती) कुश में भारत को मिशन सॉफ्टवेयर और एल्गोरिद्म पर 100 प्रतिशत नियंत्रण मिलेगा. इससे किसी भी प्रकार की ऑपरेशनल पाबंदियों, छिपे हुए लिमिटेशन या संकट के समय संभावित किल स्विच जैसी आशंकाओं से मुक्ति मिलती है. सॉफ्टवेयर पर पूर्ण नियंत्रण का एक बड़ा लाभ यह भी है कि भारत बदलते खतरों के अनुसार अपने सिस्टम को तेजी से अपडेट कर सकेगा. जैसे-जैसे स्टेल्थ तकनीक वाले लड़ाकू विमान उदाहरण के लिए चीन का J-20 या नई इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर स्ट्रैटजी विकसित होती हैं, भारत बिना किसी विदेशी निर्भरता के अपने रडार और ट्रैकिंग एल्गोरिद्म को अपग्रेड कर पाएगा. इससे रिएक्शन टाइम में भारी कमी आएगी और रक्षा क्षमता अधिक लचीली बनेगी. लॉन्ग टर्म ऑपरेशन यानी लाइफसाइकिल कॉस्ट के मामले में भी प्रोजेक्ट कुश अधिक लाभकारी साबित हो सकता है. आमतौर पर आयातित सिस्टम जैसे S-400 के रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स और मिड लाइफ अपग्रेड के लिए मूल निर्माता पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे लागत बढ़ती है और सिस्टम डाउनटाइम भी बढ़ सकता है. इसके उलट कुश का पूरा मेंटेनेंस और सपोर्ट सिस्टम देश के भीतर ही होगा, जिससे न केवल खर्च कम होगा बल्कि मरम्मत और अपग्रेड भी तेजी से संभव हो सकेंगे.
प्रोजेक्ट कुश पर भारत का पूर्ण अधिकार होगा. (फाइल फोटो/PTI)
नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर
एक और महत्वपूर्ण पहलू इसका नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर में आसानी से इंटीग्रेशन है. प्रोजेक्ट कुश को भारत के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) के साथ सीधे जोड़ने के लिए डिजाइन किया गया है. इससे यह सिस्टम नेत्र AEW&C, Mk-II AWACS, तेजस Mk2 लड़ाकू विमान और स्वदेशी ग्राउंड रडार नेटवर्क के साथ रियल टाइम डेटा साझा कर सकेगा. विदेशी सिस्टम के साथ जहां जटिल इंटरफेस की जरूरत पड़ती है, वहीं कुशा में यह प्रक्रिया सहज और तेज होगी. आधुनिक युद्ध में ‘सेंसर-टू-शूटर’ समय को कम करना बेहद महत्वपूर्ण होता है. कुश इस दिशा में भी बढ़त दिला सकता है, क्योंकि यह एकीकृत डेटा नेटवर्क पर आधारित होगा, जिससे निर्णय लेने और लक्ष्य पर कार्रवाई करने में देरी नहीं होगी.
बड़ा रणनीतिक बदलाव
हालांकि, S-400 सिस्टम अपनी क्षमता के लिए जाना जाता है और भारत की मौजूदा एयर डिफेंस संरचना में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका बनी रहेगी, लेकिन प्रोजेक्ट कुश एक बड़े रणनीतिक बदलाव का संकेत देता है. यह केवल एक सस्ता विकल्प नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत का एक निर्णायक कदम है, जो भविष्य में रक्षा क्षेत्र में देश को अधिक स्वतंत्र और सक्षम बना सकता है.





