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Indian scientist Rashi Jain discovered a new galaxy | इंडियन साइंटिस्ट राशि जैन ने खोजी नई गैलेक्सी: कहा- 10 अरब साल से भी पुरानी है, ‘अलकनंदा’ नदी पर नाम रखा; पढ़ें खास बातचीत

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8 मिनट पहले

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भारतीय वैज्ञानिक राशी जैन ने अपने गाइड प्रो. योग वडेकर के साथ मिलकर एक नई गैलेक्सी की खोज की है। यह एक सर्पिलाकार (सर्पिल) आकाशगंगा है, जिसका नाम अलकनंदा रखा गया है।

इसका नाम हिमालय की तलहटी में वधू वाली अलकनंदा नदी के नाम पर रखा गया है। इसे नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की मदद से खोजा गया है।

जेम्स वेब टेलीस्कोप से नई खोजी गई गैलेक्सी अलकंदा का दृश्य।

जेम्स वेब टेलीस्कोप से नई खोजी गई गैलेक्सी अलकंदा का दृश्य।

डेली भास्कर ने राशी जैन से बातचीत की। उन्होंने इस बातचीत में अपनी जिंदगी, राह और यहां तक ​​पहुंचने की जर्नी के बारे में बताया।

प्रश्न 1. नई गैलेक्सी, ‘अल्कनंदा’ क्या है?

उत्तर उत्तर: हमें जो गैलेक्सी खोजी है वो मिल्की-वे यानि मंदाकिनी के जैसी ही दिखती है। इसे हमने जेम्स वेब टेलीस्कोप की मदद से खोजा है। इस गैलेक्सी टैब की कीमत भी थी जब यूनिवर्स की उम्र सिर्फ 1.5 अरब थी। इसका नाम उत्तराखंड में भव्य वाली नदी अलकंदा पर रखा गया है। अलकनांदा लगभग 4 की रेड-शिफ्ट पर है। उनकी प्रकाश व्यवस्था को हम तक पहुंचने में लगभग 12 अरब साल लगे हैं।

अलकंदा बहुत सारी स्टार्स गैलेक्सी है। अलकंदा का मास यानी मास हमारे सूरज से लगभग 10 अरब गुना अधिक है। यह हर साल 63 सन सन नए तारे बना रही है। यह हमारी अपनी आकाशगंगा ‘मंदाकिनी (मिल्की वे)’ के इलेक्ट्रॉनिक्स से 20-30 गुना तेज गति से तारे बना रही है।

प्रश्न 2. नई गैलेक्सी की खोज कैसी है?

उत्तर उत्तर: इस ब्रह्मांड में अरबों-खरबों आकाशगंगाएँ हैं। नई गैलेक्सी पुनः के बाद यह पता चलता है कि इसमें क्या शामिल है। इस प्रोजेक्ट में हमने शुरुआत में ऐसे सोचा कि जो गैलेक्सी अमेरिका से काफी दूर हैं, उनका रेड-शिफ्ट 3 से ज्यादा है। यह पता करें कि उनकी मॉर्फोलॉजी यानी फर्म कितनी कमजोर है।

इस काम के लिए सबसे अच्छा किरदार JWST अर्थात जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप है। ये बहुत दूर की गैलेक्सी को डिक्टेक्ट करने में मज़ा आता है। हमने सोचा कि JWST के डेटा का उपयोग करके हम यहां जांच करेंगे। JWST का ‘अन-कवर’ नाम का एक सर्वे था। उनके डेटा में एक सॉफ्टवेयर लिया गया और उसे चलाया गया, जिससे पता चला कि एक गैलेक्सी की रेड-शिफ्ट कितनी है।

शुरुआत में हमारे पास 74,000 गैलेक्सियां ​​थीं। सॉफ्टवेयर चलाने के बाद पता चला कि रेड-शिफ्ट 4 में 2,700 से ज्यादा गैलेक्सी हैं। इन गैलेक्सिया पर बुनियादी विवरण में काम शुरू हुआ।

सभी गैलेक्सी का अनानास बनाने के बाद ये एक विशेष गैलेक्सी डॉक्युमेंट है, जो कि गोलाकार है। इसे देखने के बाद पता चला कि ये एक बड़ा आविष्कार है।

पहला हमारा प्लान था कि सभी 2,700 गैलेक्सी का अनायास को अपना अपोजिट एक रिसर्च पेपर लिखा जाए। लेकिन फिर हमने तय किया कि अभी अलग-अलग हैं।

स्टेलर पॉपुलेशन सिंथेसिस नाम की तकनीक का उपयोग करके ये पता लगाया गया है कि इस गैलेक्सी में कितने तारे हैं, स्थिर में मास कितना है। इसके नए तार बनाने की स्पीड कितनी है। इसी तरह की एक सूची बनाकर हमने इसपर एक रिसर्च पेपर का काम शुरू किया।

प्रश्न 3. इस खोज से मानव जीवन को क्या लाभ होगा?

उत्तर उत्तर: हम जो रिसर्च कर रहे हैं, उसे तुरंत कोई फ़ायदा नहीं होगा। इसका फ़ायदा इनडायरेक्टली होता है। उदाहरण के लिए जैसे- 1970 के दशक में अमेरिका के बेल लैब्स में गैजेट ने सीसीडी यानि चार्ज-कपल्ड जर्नल की खोज की थी, जिससे हमें डिजिटल इमेज मिली।

शुरुआत में इसका बेहद खराब प्रदर्शन था, इसमें कोई भी कॉमर्शियल कैमरा बनाने वाला शामिल नहीं था। खगोलशास्त्री ने सोचा कि इसका भविष्य में उपयोग किया जा सकता है। इसके बाद एस्टोरिएस्ट ने इंजीनियर्स के साथ काम करना शुरू किया।

20 साल तक 4 या 5 सीसीडी के जेनरेशन आए। हर जेनरेशन में क्वॉलिटी इंट्रेस्ट देखने को मिला। 1990 के दशक में इंजीनियरों ने देखा कि अब सीसीडी की तकनीक काफी बेहतर हो गई है, इसलिए हम डिजिटल कैमरा बना सकते हैं। फिर ये टेक्नोलॉजी बाकी जगह भी अपना ली गई।

इसके अलावा जीपीएस को आज हम मार्केटिंग के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। ये भी एस्ट्रोफिजिक्स की वजह से ही संभव है।

प्रश्न 4. मध्य कक्षा का बच्चा इस पेशे में आना चाहता है तो क्या करे?

उत्तर उत्तर: मेरी मां टीचर हैं। उन्होंने बचपन से ही मेरा सहयोग किया है। मैं पहले आईआईटी बीएचयू से बीटेक की थी। हालाँकि, बीएससी करके भी इस क्षेत्र में प्रवेश लिया जा सकता है। बस आप कोशिश करें कि अच्छी यूनिवर्सिटी से मास्टर्स कर पाओ। इसके बाद आपको कुछ उदाहरण दिए गए हैं। एग्जॉम के बाद आपका इंटरव्यू होगा, जिससे फाइनल सिलेक्शन होगा।

इसके अलावा आप एस्ट्रोनोमी से जुड़े संस्थान से भी जुड़ सकते हैं। इस क्षेत्र में शोध करने पर आपको कई आख्यान मिलते हैं। आपको हर महीने कुछ स्टाइपेंड मिलता है। रहने के लिए आमंत्रण है। खुद का ऑफिस भी देखें। मेरा मानना ​​है कि इंडिया एस्ट्रोफिजिक्स में बहुत अच्छा है। सभी को भारत में ही इसकी पढ़ाई करनी चाहिए।

बचपन से एस्ट्रोफिजिक्स में रुचि थी

राजस्थान के जूनागढ़ में जन्मी राशि के मां कलाकार हैं। उन्होंने ही राशि को विज्ञान के क्षेत्र में ऋषियों को बनाने के दिशा-निर्देश दिए। राशि को बचपन से ही विज्ञान में रुचि थी। वो हमेशा के लिए इन स्थानों में बने रहेंगे जहां तारे बंद हो गए। सूरज कैसा होता है.

मेटलर्जिकल में बीटेक हैं

जूनून से स्कूलिंग के बाद उन्होंने कोटा से आईआईटी जेईई की तैयारी की। इसके बाद उनका सिलेक्शन आईआईटी बीएचयू में हो गया। यहां से उन्होंने मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया।

डीटीएच, मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग में फिजिक्स नहीं पढ़ता है। ऐसे में उन्होंने खाली समय में अपनी खुद की पढ़ाई की।

इंटीग्रेटेड पीएचडी प्रोग्राम की शाखाएं हैं

ग्रेजुएशन के बाद रेडियो ने नेशनल सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स यानी एनसीआरए से इंटीग्रेटेड पीएचडी प्रोग्राम में दाखिला लिया। फिजिक्स बैकग्रांउड से नहीं होने के कारण इस फील्ड में आने में कुछ दिक्कत भी हुई।

पीएचडी के दौरान उनके गाइड प्रो. योगेश वाडेकर बने। अकेले के साथ मिलकर राशि ने ई गैलेक्सी, अलकंदा की खोज की।

राशि जैन अपने गाइड प्रो. योगे वाडेकर (दाएं) के साथ। (फोटो- वीडियो स्पेशल परमिशन)

राशि जैन अपने गाइड प्रो. योगे वाडेकर (दाएं) के साथ। (फोटो- वीडियो स्पेशल परमिशन)

प्रो. योग के गाइडेंस में खोजें नई गैलेक्सी

प्रो. योगेश वाडेकर मुंबई में रहने वाले हैं। उन्होंने आईआईटी बॉम्बे से बीटेक किया है। इसके बाद आईयूसीएए यानी इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स​​ से पीएचडी की। फिर लगभग 6 वर्षों तक विदेश में खगोल विज्ञान के क्षेत्र में काम किया। उसके बाद भारत में विज्ञान के क्षेत्र में अध्ययन किया जाता है और पीएचडी के छात्रों को भी पढ़ा जाता है।

इंटरव्युप्यू/एमार्टोरी – देव कुमार

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