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ट्रंप के राज में अमेरिका ने ‘सेक्शन 301’ के तहत भारत समेत 16 देशों के खिलाफ एक बड़ी जांच शुरू की है, जिसका मकसद भारत के 58 अरब डॉलर के व्यापार मुनाफे पर चोट करना है. अमेरिका का तर्क भिड़ाया है कि भारत सब्सिडी के दम पर अपनी जरूरत से तीन गुना ज्यादा सोलर पैनल बनाकर उन्हें अमेरिकी बाजारों में ‘डंप’ कर रहा है, जिससे वहां की कंपनियों को नुकसान हो रहा है. इसके अलावा, भारतीय टेक्सटाइल और हस्तशिल्प उद्योग पर लेबर को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं.
अमेरिका ने सेक्शन 301 से भारत को किया टारगेट
वॉशिंगटन: ट्रंप सरकार ने भारत के साथ-साथ 16 बड़े देशों के खिलाफ अपने सबसे खतरनाक हथियार ‘सेक्शन 301’ के तहत जांच शुरू कर दी है. ये सब तब शुरू हुआ जब अमेरिका की सबसे बड़ी अदालत ने ट्रंप के उस पुराने आदेश पर रोक लगा दी थी, जिसमें वो सीधे दूसरे देशों पर टैक्स ठोक रहे थे. अब ट्रंप ने नया रास्ता निकाला है और इसी ‘सेक्शन 301’ के बहाने वो भारत से आने वाले सामानों पर भारी जुर्माना और टैक्स लगाने की फिराक में हैं. जानकारों का कहना है कि अगर इस जांच में भारत फंस गया, तो अमेरिका के बाजारों में भारतीय सामान बेचना लगभग नामुमकिन हो जाएगा क्योंकि वो बहुत महंगे हो जाएंगे.
क्या है सेक्शन 301? जिससे कांप रहा है वैश्विक बाजार
- सेक्शन 301 अमेरिका का वो ‘ब्रह्मास्त्र’ है जिसका इस्तेमाल वह तब करता है जब उसे लगता है कि कोई दूसरा देश उसके साथ व्यापार में ‘धोखाधड़ी’ कर रहा है.
- यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को ये पावर देता है कि वह किसी भी ऐसे देश पर एकतरफा प्रतिबंध या भारी टैक्स लगा सके जिसकी व्यापार नीतियां अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचा रही हों.
- 1974 के ट्रेड एक्ट की यह धारा इससे पहले चीन के खिलाफ ट्रेड वॉर छेड़ने के लिए इस्तेमाल की गई थी, और अब इसकी आंच भारत तक पहुंच गई है.
भारत के ‘सोलर और स्टील’ पर अमेरिका की टेढ़ी नजर
इस बार अमेरिका ने भारत को निशाना बनाने के लिए ‘स्ट्रक्चरल एक्सेस कैपेसिटी’ का सहारा लिया है. पेंटागन और अमेरिकी वाणिज्य विभाग का आरोप है कि भारत अपनी जरूरत से 3 गुना ज्यादा सोलर पैनल बना रहा है. अमेरिका का तर्क है कि भारत सब्सिडी के दम पर इतना ज्यादा उत्पादन कर रहा है कि वो उसे वैश्विक बाजार में ‘डंप’ कर सके यानी बेहद सस्ते दाम पर बेच सके, जिससे अमेरिकी कंपनियां बाजार से बाहर हो जाएं. सिर्फ सोलर ही नहीं, बल्कि स्टील, एल्युमीनियम और पेट्रोकेमिकल्स जैसे अहम सेक्टर्स भी इस रडार पर हैं.
58 बिलियन डॉलर का वो ‘गुनाह’ जिसने ट्रंप को भड़काया
ट्रंप प्रशासन के गुस्से के पीछे सबसे बड़ी वजह है ट्रेड सरप्लस. साल 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने अमेरिका को जितना सामान बेचा और उससे जितना खरीदा, उसमें 58 बिलियन डॉलर का भारी अंतर था. यानी भारत फायदे में रहा और अमेरिका घाटे में. ट्रंप ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति के तहत इस अंतर को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं. उनका साफ कहना है कि जो देश अमेरिकी नौकरियों को खतरा पहुंचाएगा, उसे भारी कीमत चुकानी होगी.
जबरन लेबर का गंभीर आरोप
सिर्फ व्यापारिक नीतियां ही नहीं, अमेरिका ने भारत पर ‘मानवीय’ आधार पर भी हमला बोला है. 12 मार्च 2026 को शुरू हुई एक समानांतर जांच में भारत समेत 60 देशों पर यह आरोप लगाया गया है कि उनकी सप्लाई चेन में फोर्स्ड लेबर यानी ‘जबरन श्रम’ का इस्तेमाल हो रहा है. अगर यह आरोप साबित होता है, तो भारतीय टेक्सटाइल और हस्तशिल्प उद्योग पर अमेरिका में पूरी तरह प्रतिबंध लग सकता है.
भारत के पास क्या है रास्ता?
भारतीय वाणिज्य मंत्रालय इस वक्त ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में है. 5 मई 2026 को वॉशिंगटन में होने वाली पब्लिक हियरिंग भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी. भारत को वहां साबित करना होगा कि उसकी उत्पादन क्षमता किसी ‘डंपिंग’ के लिए नहीं बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ के तहत आत्मनिर्भरता के लिए है. अगर भारत अपनी बात मजबूती से नहीं रख पाया, तो जुलाई 2026 से भारतीय सामानों पर 10% से 25% तक का अतिरिक्त टैरिफ लगना तय है.
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उत्कर्षा श्रीवास्तव डिजिटल जर्नलिस्ट हैं और जियो-पॉलिटिक्स टॉपिक्स पर लिखती हैं, वो वर्तमान में News18 Hindi के World सेक्शन में कार्यरत हैं. उन्हें डिजिटल मीडिया में 10+ वर्षों का अनुभव है, इस दौरान उन्होंने क…और पढ़ें





