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I4C Vs Digital Arrests Cyber Fraud; Home Ministry Blocked Skype IDs | गृह मंत्रालय का साइबर अरेस्ट और ब्लैकमेलिंग को लेकर एक्शन: 1000 से ज्यादा स्काइप आईडी को ब्लॉक किया, इससे अपराधी बनकर ठगी करते थे

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नई दिल्ली12 मिनट पहले

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साइबर साइबेरियाई मुकेश चौधरी ने बताया कि यह सोशल इंजीनियरिंग स्कैम है।  इसमें पुलिस व सुरक्षा एजेंसी के नाम पर पैसा वसूला जाता है।  (फोटो) - दैनिक भास्कर

साइबर साइबेरियाई मुकेश चौधरी ने बताया कि यह सोशल इंजीनियरिंग स्कैम है। इसमें पुलिस व सुरक्षा एजेंसी के नाम पर पैसा वसूला जाता है। (फ़ॉलो फोटो)

होम मिनिस्ट्री ने साइबर स्टोर्स और ब्लैकमेलिंग करने वाले 1000 से ज्यादा स्काइपशिप को ब्लॉक कर दिया है। यह जानकारी प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो ने मंगलवार को दी। मिनिस्ट्री ने कहा कि साइबर सरकार रिजर्व को रोकने के लिए सभी निवेशकों, आरबीआई और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर काम कर रही है। इसमें राज्य केंद्र और राज्य पुलिस की भी मदद कर रही है।

सरकार ने अक्टूबर 2018 में इंडियन क्राइम कोऑर्डिनेशन (I4C) की स्थापना के लिए ऐसे समुद्री डाकू की स्थापना की थी। इसी के तहत जून 2020 में 59 चीनी मूल के मोबाइल ऐप्स पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

गृह मंत्रालय ने लोगों को नियुक्त किया
गृह मंत्रालय का कहना है कि साइबर गैंग द्वारा बंधक बनाए गए बंधकों, बंधकों और डिजिटल स्टोर्स को लेकर बड़ी संख्या में बंधक दर्ज किए जा रहे हैं। अधिकांश अपराधी सीबीआई, नारकोटिक्स विभाग, रिजर्व बैंक और पुलिस विभाग के अधिकारी शामिल हैं। ऐसे प्रसंगों में कई पुरातनपंथियों ने बड़ी मात्रा में अपना पैसा खोया है। निषेध के लिए सरकार लगातार काम कर रही है। साथ ही लोगों को रहने के लिए कहा जा रहा है।

डिजिटल रेस्टोरेंट क्या है?
कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा कोई प्रावधान नहीं है और न ही पुलिस कभी किसी को इस तरह से ऑनलाइन बंधक स्थान देती है। साइबरस्पेस की भाषा में यह महत्वपूर्ण है। साइबर ठग में किसी व्यक्ति विशेष को वर्चुअल लॉकअप में अपनी निगरानी में रखा जाता है। यानी वीडियो कॉल या कॉन्फ्रेंस कॉल पर लगातार उसकी निगरानी की जाती है।

किसी को किसी भी तरह का शक न हो, इसके लिए नाबालिग पीड़ितों के अपराध को सही साबित करने के लिए फर्जी डिजिटल फॉर्म भी भरवाते हैं। इसकी एक कॉपी पर्सनल के वॉट्सऐप नंबर पर जारी की गई है। कई बार वीडियो कॉल पर व्यक्ति की जांच एजेंसी का कार्यालय और कैटलॉग दिखाई देता है। पूरी प्रक्रिया को इस तरह से फॉलो किया जाता है कि किसी व्यक्ति को किसी तरह का शक ही न हो।

अब डिजिटल अरेस्ट से जुड़े दो मामले पढ़ें….

केस नंबर 1- दो दिन का डिजिटल बिजनेस, जयपुर का बिजनेस, गंवाए 50 लाख
राजस्थान के जयपुर के बजाज नगर में रहने वाले एक व्यापारी के पास 16 अप्रैल को एक फोन आया। सामने वाले ने कहा कि वो दिल्ली एयरपोर्ट से बोल रहा है। आपके चीन द्वारा भेजे गए हथियारों में 300 ग्राम हेरोइन, फर्जी पासपोर्ट और 15 सिम कार्ड मिले हैं। इस दौरान पीड़ित ने बताया कि उसने कोई तारा नहीं भेजा है। कुछ समय बाद खुद को कंपनी के एक अधिकारी ने बताया कि किसी व्यक्ति ने अपने साथियों के लिए आधार कार्ड उधार ले लिया है।

जांच के बाद 9 राज्यों में व्यापारियों के आधार कार्ड से बैंक खाता खोला गया। साथ ही, इसका उपयोग मनी लॉन्ड्रिंग और पार्टनर्स द्वारा काम में लिए जाने वाले व्यवसायों की जानकारी के लिए किया गया है। ठगों ने दिल्ली के शोरूम और शोरूम का शोकेस दिखाया। बिजनेस को दो दिवसीय ऑनलाइन मॉनिटरिंग पर आयोजित किया गया और नेशनल इन्वेस्टिगेशन से यात्रा मामले में अलग-अलग जांच अधिकारियों से बात की गई।

कॉल करने वाले खुद को एचडी-सीबीआई अधिकारी अर्थशास्त्री कहते हैं।  ये तीन प्रवृत्तियां होती हैं कि जांच-पड़ताल के अधिकारी इसी तरह की बातें करते हैं।

कॉल करने वाले खुद को एचडी-सीबीआई अधिकारी अर्थशास्त्री कहते हैं। ये तीन प्रवृत्तियां होती हैं कि जांच-पड़ताल के अधिकारी इसी तरह की बातें करते हैं।

पिछले दिनों की गई जांच के बाद पैसा वापस लेने का पट्टा, व्यापारियों के बैंक खाते में जमा 50 लाख के सामान को एक डेमी खाते में रखा गया। पैसा ट्रांसफर होता है ही पार्टियों ने ऐप के जरिए कॉल को बढ़ावा दिया। जब बिजनेस कंपनियों ने नबंरों पर कॉल करने का प्रयास किया तो उसे ब्लॉक कर दिया। अब मछुआरों के शिकार व्यापारियों ने कमिश्नरेट के साइबर पुलिस स्टेशनों में केस दर्ज किया है।

पीड़ित व्यापारियों ने बताया कि जांच में सहायता न करने पर मेरे सभी बैंक खाता सीज करने की धमकी दी गई थी। मैंने सोचा कि जब मैं किसी अवैध गतिविधि में शामिल नहीं हूं तो जांच में सहायता करने के लिए मुझे क्या कहना है। इस दौरान मुझे ऑनलाइन मॉनिटरिंग में रहने के बारे में बताया गया था। साइबर धोखाधड़ी से जुड़े कनेक्शन जैसे नेशनल ईशु पर साइकोलॉजिकल गेम में फंसते हैं।

केस नंबर 2- झुंझुनूं की महिला प्रोफेसर से ठगे 7.67 करोड़, 3 महीने की ऑनलाइन स्ट्रीमिंग

राजस्थान के झुंझुन जिले की एक महिला प्रोफेसर ने साइबर ठगों को तीन महीने तक ऑनलाइन देखने का मौका दिया। इस दौरान महिला प्रोफेसर से हर दो घंटे में छूट मिली कि वह लोगों से मिल रही है और कहां जा रही है। ठगों ने जगह-जगह पर गुलामी के लिए भी गुलामी की। महिला को चारपाई ने डिजिटल वेर दोस्ती के नाम पर धमाका और पूरी संपत्ति साझा करने की रची कहानी बताई।

साइबर ठग ने झुंझुनूं की महिला प्रोफेसर को लगातार 3 महीने तक ठगा।  इस दौरान उनके बैंक अकाउंट से 42 बार में करीब 8 करोड़ रुपये निकाले गए।

साइबर ठग ने झुंझुनूं की महिला प्रोफेसर को लगातार 3 महीने तक ठगा। इस दौरान उनके बैंक अकाउंट से 42 बार में करीब 8 करोड़ रुपये निकाले गए।

आरोपियाें ने तीन महीने में महिला से अलग-अलग ट्रांजेक्शन के जरिए 7.67 करोड़ रुपए ठगे। महिला को पहली बार 20 अक्टूबर 2023 को कॉल किया गया। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को ट्राई (TRAI) के अधिकारी नियुक्त महिला को बताया कि उसके मोबाइल नंबर से जारी अन्य मोबाइल नंबर का उपयोग साइबर क्राइम में हो रहा है। इसके बाद कभी कॉमनवेल्थ, पीएचडी तो कभी मुंबई के पुलिस अधिकारी कॉल कर प्रोफेसर को बुलाते रहे।

प्रोफेसर ने 29 अक्टूबर 2023 से 31 जनवरी 2024 तक 42 बार विभिन्न मुद्रा भंडार में प्रवेश किया। ठगों ने उन्हें धोखा दिया कि सुप्रीम कोर्ट से मामले का लाभ होता ही पैसा उन्हें वापस मिल जाएगा। पुलिस जांच में सामने आया कि यह पैसा 200 बैंक खातों में स्थानांतरित हुआ, जिसमें से कुछ खाते विदेश में हैं। ऐसे में अब पुलिस मुख्यालय ने केस की जांच टीम को बढ़त का प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा है।

पुलिस की कार्रवाई में ठगों का हथियार बनाया गया
इन दोनों केस में एक बात कॉमनवेल्थ थी। मशीन और महिला प्रोफेसर दोनों पर ही गंभीर मामलों में फाँसी और पुलिस की कार्रवाई का विवरण दिखाया गया था। समाज में बदनामी और पुलिस अपराधी से बचने के लिए दोनों ही बदनामी के जाल में फंस गए।

साइबर एवं पुलिस इंस्पेक्टर पूनम चौधरी का कहना है कि साइबर ठग पुलिस कार्रवाई के डर को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। जबकि पुलिस या किसी भी जांच एजेंसी में ‘डिजिटल अरेस्ट’ प्रोविजन के रूप में नहीं है। पुलिस किसी भी व्यक्ति से व्हाट्सएप या वीडियो कॉल पर इस तरह पूछताछ नहीं करती है। ऐसे आने वाले कॉल पर शक्तिशाली पुलिस स्टेशन में सूचना देना और किसी प्रकार का ट्रांजेक्शन नहीं करना।

स्क्रीन के सामने चॉइसर का इस्तेमाल किया गया
अब क्वालिटी बैचलर ओटीपी क्वेस्टकर, लिंक सिलेक्ट या अन्य डिटेल लेकर ही वर्से को परिणाम नहीं दे रहे हैं। बल्कि सुधा, एचडीएफसी बैंक और कंपनी प्रमुख के अधिकारी वॉट्सऐप कॉल करते हैं और लोगों को एनडीपीएस एक्ट जैसे गंभीर मामलों में कार्रवाई का डर सताता है। इसके लिए कई बार पीड़ित की ऑनलाइन स्क्रीनिंग का नाम स्क्रीन के सामने अंकित कर पासपोर्टर भी रखा जाता है।

अब सवाल यह है कि ऐसे मामलों में बचाव के लिए क्या करें? हमें इस दुकान में रायपुर साइबर की विशेषज्ञ मोनाली कृष्णा गुला, जयपुर के मुकेश चौधरी और हनुमानगढ़ के अभय कमांड सेंटर के प्रभारी डॉ. सेंट्रल साइबर प्रताप और साइबर टीम के प्रभारी वाहेगुरु सिंह से बातचीत के दौरान, जो क्राइम पर जागरूकता के लिए लंबे समय से काम कर रहे हैं।

दोस्त का कहना है कि कभी-कभी भी किसी भी नंबर से आने वाले कॉल को रिसिव नहीं किया जा सकता।

दोस्त का कहना है कि कभी-कभी भी किसी भी नंबर से आने वाले कॉल को रिसिव नहीं किया जा सकता।

अनन्या वीडियो कॉल रिसीव न करें, सावधानी बरतें
सभी साइबर का मानना ​​है कि आजकल साइबर क्राइम में व्हाट्सएप का इस्तेमाल बढ़ गया है। सोशल मीडिया ऐप और व्हाट्सएप पर हमें सावधानी बरतनी चाहिए। कभी भी अनन्या वीडियो कॉल रिसीव न करें। अगर वीडियो कॉल आए तो अपने कैमरे को हाथ से बढ़ाकर बात करें और अपना चेहरा न देखें। फेसबुक, प्रोफाइल प्रोफाइल को निजी पोस्ट। अन्य लोगों के मित्र रिक्वेस्ट को स्वीकार नहीं करें। अधिकांश मामलों में साइबर ठग से पहले साक्षात्कार सोशल साइट से लोगों के संबंध में जानकारी शामिल हैं।

सोशल साइट पर किसी व्यक्ति का डेटा प्राइवेट नहीं रखा गया है। ऐसे में अपना मोबाइल नंबर, अज्ञात और संपर्क के बारे में कोई भी जानकारी साझा करने से इनकार करें। साइबर क्राइम की घटना पर तुरंत 1930 पर कॉल कर इसकी सूचना और टेलीस्कोप पुलिस स्टेशन में घटित होने वाली रिपोर्ट भी दें। समय पर सूचना देने वाले धोखेबाज़ के बैंक खाते तुरंत वापस आ सकते हैं और आपका पैसा मिलने की संभावना बढ़ जाती है। कई केसों में रिकाॅर्ड भी मिला हुआ है।

क्या कहते हैं बस्तियाँ
साइबर साइबेरियाई मुकेश चौधरी ने बताया कि यह सोशल इंजीनियरिंग स्कैम है। इसमें पुलिस व सुरक्षा एजेंसी के नाम पर पैसा वसूला जाता है। इजेक्शन का एक ही तरीका है कि आप पुलिस सिस्टम के बारे में जान लें, क्योंकि कोई भी जांच एजेंसी इस तरह का काम नहीं करती है।

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