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पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ की बात करें तो मेरठ को जहां क्रांति धरा के नाम से जाना जाता है, वहीं यहां महाभारत कालीन और रामायण कालीन यादें भी जुड़ी हुई है. जिसकी गवाही आज भी यहां के विभिन्न ऐतिहासिक मंदिर देते हुए दिखाई देते हैं. मेरठ जिले का इसलिए ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है क्योंकि यही पर हस्तिनापुर है जिसका गौरवशाली इतिहास रहा है. मेरठ की इस विरासत को आप इन फोटो के माध्यम से जान सकते हैं.
मेरठ से 45 किलोमीटर दूर हस्तिनापुर किसी परिचय का मोहताज नहीं है. हस्तिनापुर में आप जैसे ही प्रवेश करेंगे आपको पांडेश्वर मंदिर देखने को मिलेगा. हजारों वर्ष से मान्यताएं चलती आ रही है. पांचो पांडव इसी मंदिर में बूढ़ी गंगा में स्नान कर विधि विधान के साथ भोले बाबा की पूजा अर्चना किया करते थे. मंदिर परिसर के अंदर ही जहां भोले बाबा शिवलिंग के सामने ही पांचो पांडव की मूर्ति भी देखने को मिलेगी. ऐसे में यहां देश भर से लोग दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं.

भारतीय संस्कृति की अगर बात करें तो हमेशा से ही यहां दान की परंपरा रही है. इसी दान परंपरा के जीवंत उदाहरण हस्तिनापुर का कर्ण मंदिर पेश करता है. कहा जाता है कि दानवीर कर्ण प्रतिदिन यहीं पर अपनी कुलदेवी मां की पूजा अर्चना किया करते थे. जिससे प्रसन्न होकर देवी उन्हें सवा मन सोना उपहार में देती थी. उसी सोनी को वह ब्राह्मणों को दान कर देते थे. इसी के पास से ही बूढ़ी गंगा भी होकर उस दौर में गुजरती थी. ऐसे में यहां भी आस्था के प्रति लोगों में काफी उत्साह देखा जाता है.

इसी तरह का उल्लेख हस्तिनापुर स्थित द्रौपदी मंदिर का भी देखने को मिलता है. मान्यता है कि द्रौपदी यहां मौजूद घाट में स्नान करने के पश्चात प्रतिदिन पूजा अर्चना किया करती थी. साथ ही यहां मंदिर में जो मूर्ति लगी हुई हैं. वह आज भी महाभारत कालीन यादों को जीवित करती है. इसमें एक तरफ जहां दुःशासन द्वारा उनका चीर हरण किया जाता है. वहीं भगवान श्री कृष्णा उनके चीर को बड़ा करते हुए अर्थात उनकी लाज बचाते हुए मूर्ति में नजर आते हैं. यह मंदिर भी काफी ऐतिहासिक माना जाता है.
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मेरठ को क्रांति धरा के तौर पर भी जाना जाता है. ऐसे में आप जब यहां मेरठ के सूरजकुंड पार्क जाएंगे तो आपको वह ऐतिहासिक पल भी अनुभव होगा. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले जिन साधु बाबा का उल्लेख किया जाता है. इतिहासविद डॉ नवीन गुप्ता के अनुसार वह शुरुआत में सूरजकुंड परिसर में ही रहा करते थे. जहां से क्रांति की ज्वाला उत्पन्न करते थे. जब इसकी जानकारी अंग्रेजी हुकूमत को लगी तो उन्हें शहर छोड़ने का आदेश जारी किया था. इसके बाद वह गुपचुप तरीके से औघड़नाथ मंदिर पहुंच गए थे. जहां भारतीय सैनिकों को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह करने के लिए जागरुक करते थे.

मेरठ का ऐतिहासिक औघड़नाथ मंदिर प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के साथ-साथ धार्मिक महत्व से भी महत्वपूर्ण है. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी हुकूमत का विद्रोह भारतीय सैनिकों ने इसी मंदिर परिसर से ही किया था. जिसकी चिंगारी देश भर में देखने को मिली. यहां पर भोले बाबा स्वयं शिवलिंग है. ऐसे में देश भर से या लाखों की संख्या में पहुंचते हैं.. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सीएम योगी आदित्यनाथ, राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के साथ विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के महत्वपूर्ण पदों पर रहने वाले नेता भी यहां बाबा से आशीर्वाद प्राप्त कर चुके हैं.

मेरठ का महाभारत ही नहीं बल्कि रामायण कालीन यादों से भी नाता रहा है. जिसका उल्लेख मेरठ सदर का बिलेश्वर नाथ मंदिर से मिलता है. मान्यता है रावण की पत्नी मंदोदरी भी प्रतिदिन भोले बाबा की विधि विधान के साथ पूजा अर्चना किया करती थी. जिसके फलस्वरुप भोले बाबा ने रावण जैसा विद्वान पति उसे वरदान में दिया था. आज भी इस मंदिर को आप देखेंगे तो आपको वही प्राचीन भव्य, संस्कृति की झलक देखने को मिलेगी.

मेरठ को कलयुग की शुरुआत का मुख्य केंद्र भी माना जाता है. राजा परीक्षित के शासन से संबंधित किला परीक्षितगढ़ से ही कलयुग की शुरुआत हुई थी. जिसका गवाह श्री श्रृंगी ऋषि आश्रम को माना जाता है. आज भी यहां पर आपको विभिन्न ऐसे ही ऐतिहासिक पहलुओं से रूबरू होने का मौका मिलेगा. उत्तर प्रदेश शासन द्वारा भी इस केंद्र को पर्यटन क्षेत्र में विकसित किया जा रहा है.

बताते चलें कि भारत में सभी धर्म का सद्भाव देखने को मिलता है. ऐसे में मेरठ से 30 किलोमीटर दूर सरधना में 200 से अधिक साल पुरानी कैथोलिक चर्च भी मौजूद है. जिसकी भव्यता सुंदरता लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करती है. ताजमहल की तरह ही संगमरमर और वास्तु कला का यहां अद्भुत संगम देखने को मिलता है. यहां देश ही नहीं बल्कि विदेशी सैलानी भी बड़ी संख्या में घूमने के लिए पहुंचते है.





