Fellowship: अमेरिका और कनाडा में साइंस, मैथ्स और इंजीनियरिंग के युवा टैलेंट के लिए सबसे बड़ा और सबसे प्रतिष्ठित शुरुआती करियर अवॉर्ड माना जाता है-स्लोअन रिसर्च फेलोशिप. इस साल अल्फ्रेड पी. स्लोअन फाउंडेशन ने कुल 126 शानदार शोधकर्ताओं को चुना है और इनमें से चार नाम ऐसे हैं जो भारतीय मूल के हैं. ये हैं आयुष जैन, अरुण कुमार कुचिब्होटला, अदिति रघुनाथन और आनंद नटराजन. इन चारों को दो साल के लिए 75,000 अमेरिकी डॉलर यानी करीब 63 लाख रुपये की फेलोशिप मिली है. ये पैसा पूरी तरह फ्री-फ्लो है मतलब ये लोग इसे अपनी रिसर्च में बिना किसी पाबंदी के जहां चाहें लगा सकते हैं. ये अवॉर्ड इसलिए खास है क्योंकि ये उन युवा वैज्ञानिकों को दिया जाता है जो अभी अपने करियर के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं और जिनमें आगे चलकर अपने क्षेत्र में लीडर बनने की पूरी क्षमता है. स्लोअन फेलो में पहले चुने गए लोगों में से कई ने बाद में नोबेल प्राइज, फील्ड्स मेडल और ट्यूरिंग अवॉर्ड जीते हैं यानी ये अवॉर्ड भविष्य के साइंटिस्ट सितारों का पहला संकेत होता है.
कौन हैं चारों भारतीय-अमेरिकी फेलो?
1. आयुष जैन: क्रिप्टोग्राफी और सिक्योर कंप्यूटेशन के मास्टर
कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस के असिस्टेंट प्रोफेसर आयुष जैन आज की डिजिटल दुनिया की सबसे जरूरी चीज पर काम कर रहे हैं क्रिप्टोग्राफी यानी वो तरीके जिनसे हमारा ऑनलाइन डेटा, बैंकिंग, मैसेजिंग और हर डिजिटल कम्युनिकेशन सुरक्षित रहता है. उनका फोकस उन गणितीय आधारों पर है जो भविष्य में भी हैकिंग से बचाव कर सकें. खासतौर पर वो पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी पर काम कर रहे हैं क्योंकि आने वाले क्वांटम कंप्यूटर पुरानी एन्क्रिप्शन को तोड़ सकते हैं. उनका रिसर्च सीधे साइबर सिक्योरिटी को मजबूत बनाता है.
2.अरुण कुमार कुचिब्होटला: स्टैटिस्टिक्स और भरोसेमंद प्रेडिक्शन
कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी में स्टैटिस्टिक्स एंड डेटा साइंस के एसोसिएट प्रोफेसर अरुण कुमार कुचिब्होटला अनिश्चितता और प्रेडिक्टिव लर्निंग की बुनियादी दिक्कतों को सुलझा रहे हैं. मशीन लर्निंग में सबसे बड़ी समस्या होती है मॉडल कितना सही प्रेडिक्ट कर रहा है इसकी सच्चाई कैसे पता चले. अरुण ईमानदार स्टैटिस्टिकल मेथड्स बना रहे हैं जो जटिल और बहुत सारे डेटा वाले मामलों में भी सही नतीजे देते हैं. इनका इस्तेमाल फाइनेंशियल फोरकास्टिंग, हेल्थ डेटा और इकोनॉमिक एनालिसिस में हो रहा है.
3.अदिति रघुनाथन: सुरक्षित और भरोसेमंद AI की मास्टरमाइंड
कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस की असिस्टेंट प्रोफेसर अदिति रघुनाथन आज की सबसे बड़ी चिंता पर काम कर रही हैं.AI को भरोसेमंद और सुरक्षित कैसे बनाया जाए. वो AI सिस्टम के फेल होने की वजह ढूंढती हैं और उन्हें रियल दुनिया में टिकाऊ बनाने के तरीके बनाती हैं. उनका AI Reliability Lab इसी दिशा में काम करता है. उनका रिसर्च हेल्थकेयर, फाइनेंस और ऑटोनॉमस सिस्टम्स जैसे क्षेत्रों में AI की सेफ्टी सुनिश्चित करता है. वो चाहती हैं कि AI अनप्रेडिक्टेबल हालात में भी सही और पारदर्शी तरीके से काम करे.
4.आनंद नटराजन: क्वांटम कंप्यूटिंग की सीमाएं समझने वाले
MIT में एसोसिएट प्रोफेसर और MIT के CSAIL व MIT-IBM वाटसन AI लैब में मुख्य शोधकर्ता आनंद नटराजन क्वांटम कॉम्प्लेक्सिटी थ्योरी पर काम करते हैं. ये थ्योरी ये देखती है कि क्वांटम कंप्यूटर में क्या-क्या तेजी से कम्प्यूट किया जा सकता है. उनका काम क्वांटम कंप्यूटर की असली ताकत और सीमाओं को समझने में मदद करता है. ये थ्योरेटिकल कंप्यूटर साइंस और नई क्वांटम टेक्नोलॉजी के बीच का पुल है. इसका असर क्रिप्टोग्राफी, क्वांटम सिमुलेशन और भविष्य के कंप्यूटिंग हार्डवेयर पर पड़ेगा.
स्लोअन फेलोशिप क्या है?
1955 से चल रहा ये प्रोग्राम उन युवा साइंटिस्ट्स को चुनता है जो अपने करियर के सबसे अहम दौर में हैं और जो अपने फील्ड में लीडर बन सकते हैं. चयन बहुत सख्त नामांकन और पीयर रिव्यू से होता है. पहले के स्लोअन फेलो में कई नोबेल, फील्ड्स मेडल और ट्यूरिंग अवॉर्ड विजेता शामिल हैं. ये फेलोशिप रिसर्चर्स को फंडिंग की टेंशन से आजादी देती है ताकि वो बड़े और रिस्की आइडियाज पर काम कर सकें.
ये उपलब्धि क्यों खास है?
ये चारों भारतीय-अमेरिकी शोधकर्ता ऐसे फील्ड में काम कर रहे हैं जो आने वाले सालों की टेक्नोलॉजी क्रिप्टोग्राफी, AI सेफ्टी, स्टैटिस्टिक्स और क्वांटम कंप्यूटिंग को नई दिशा देंगे.उनकी ये फेलोशिप दिखाती है कि भारतीय मूल के वैज्ञानिक वैश्विक स्तर पर कितना बड़ा प्रभाव डाल रहे हैं. पिछले कुछ सालों में भी कई भारतीय मूल के शोधकर्ता स्लोअन फेलो चुने गए हैं.ये पुरस्कार ये भी बताते हैं कि शुरुआती करियर में अच्छी फेलोशिप मिलने से कितनी तेजी से साइंस आगे बढ़ सकती है. ये लोग अब अगले कुछ सालों में अपने क्षेत्र में बहुत बड़े योगदान देंगे. चाहे सुरक्षित डिजिटल दुनिया बनाना हो, भरोसेमंद AI हो या क्वांटम कंप्यूटिंग की नई सीमाएं खोजना हो इनका काम पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा.भारतीय मूल के वैज्ञानिकों की ये कामयाबी गर्व की बात है.





