delhi high court on ILBS hospital: ILBS सरकारी अस्पताल, फिर पैसे लेकर इलाज क्यों! हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार से मांगा जवाब


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ILBS सरकारी अस्पताल, फिर पैसे लेकर इलाज क्यों! हाईकोर्ट ने भेजा नोट‍िस

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दिल्ली हाईकोर्ट ने आईएलबीएस अस्पताल में गरीबों को म‍िलने वाले सीमित इलाज पर दिल्ली सरकार से जवाब मांगा है. जनहित याचिका में आरोप है कि सरकारी फंडिंग के बावजूद अस्पताल में 90% बेड अमीरों के लिए आरक्षित हैं और यहां भारी कीमत चुकाकर लोग इलाज कराते हैं, जबक‍ि गरीब आदमी धक्‍के खाता है.

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द‍िल्‍ली हाईकोर्ट में आईएलबीएस अस्‍पताल से सभी मरीजों को मुफ्त इलाज न देने पर जवाब मांगा है.

Delhi High court on ILBS Hospital:  दिल्ली सरकार के जाने माने यकृत और पित्त विज्ञान संस्थान (ILBS अस्पताल) में आर्थिक रूप से कमजोर और गरीबों को मिल रहे सीमित इलाज को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा है. दायर की गई जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने दिल्ली सरकार को नोटिस भेजा है और इस मामले में अपना पक्ष रखने के लिए कहा है.

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी के उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने गैर सरकारी संगठन सोशल जूरिस्ट की ओर से दायर जनहित याचिका (पीआईएल) पर दिल्ली सरकार और आईएलबीएस को नोटिस जारी किया है. इस याचिका में आईएलबीएस को लेकर कहा गया है कि दिल्ली सरकार द्वारा वित्तपोषित अस्पताल होने के बावजूद यहां आर्थिक रूप से कमजोर यानि ईडब्ल्यूएस वर्ग के लिए आईपीडी में सिर्फ 10 फीसदी बेड जबकि बाह्य रोगी विभाग में 25 फीसदी मरीजों को ही मुफ्त इलाज मिलता है.

याचिका में आगे कहा गया है कि इस अस्पताल में 90 फीसदी भर्ती होने वाले और 75 फीसदी ओपीडी मरीज धनी और अमीर वर्ग से आते हैं जो मोटा भुगतान कर सुपरस्पेशलिटी इलाज की सुविधाएं लेते हैं. जबकि इस अस्पताल को दिल्ली की आम जनता के लिए सुपरस्पेशलिटी के तौर पर बनाया गया था.

इस बारे में एडवोकेट अशोक अग्रवाल ने बताया कि याचिका में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह सुपर स्पेशलिटी अस्पताल दिल्ली सरकार के द्वारा स्थापित किया गया था और इसका मालिकाना हक भी राज्य के ही पास है. इसके लिए फंड भी सरकार की तरफ से ही आता है. बावजूद इसके इस अस्पताल को प्राइवेट अस्पताल की तरह चलाया जा रहा है. यहां आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए इलाज की सीमाएं तय कर दी गई हैं जो किसी भी तरह से वैध नहीं है.

उन्होंने बताया कि इस अस्पताल को सरकार की ओर से लिवर की गंभीर बीमारियों जैसे हैपेटाइटिस, सिरोसिस, लिवर कैंसर आदि के स्पेशलाइज्ड इलाज करने के लिए बनाया गया था और आज तक सरकार के ही द्वारा पैसा दिया जाता है बावजूद इसके इसमें ऐसी पॉलिसी अपनाई गई है जो इसे सरकारी अस्पताल के बजाय प्राइवेट हेल्थकेयर इंस्टीट्यूशन ज्यादा बनाती है. जहां तकरीबन 90 फीसदी बेड पैसे का भुगतान करने वाले मरीजों के लिए आरक्षित हैं. यह पॉलिसी पूरी तरह मनमानी, भेदभावकारी और भारतीय संविधान के आर्टिकल 14 और 21 का उल्लंघन है.

देश में कहीं भी ऐसा कोई सरकारी अस्पताल नहीं है जहां सब कुछ सरकार का है लेकिन मरीजों का इलाज पैसे लेकर होता है और गरीब मरीजों को धक्के खाने पड़ते हैं. यह अस्पताल सरकारी होते हुए भी प्राइवेट अस्पताल की तरह काम कर रहा है जो इसकी वैधता पर सवाल उठाता है.अब इसे लेकर जारी नोटिस पर सरकार और अस्पताल को अपना जवाब कोर्ट में दाखिल करना है.

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प्रिया गौतमSenior Correspondent

प्रिया गौतम Hindi.News18.com में बतौर सीन‍ियर हेल्‍थ र‍िपोर्टर काम कर रही हैं. इन्‍हें प‍िछले 14 साल से फील्‍ड में र‍िर्पोर्टिंग का अनुभव प्राप्‍त है. इससे पहले ये ह‍िंदुस्‍तान द‍िल्‍ली, अमर उजाला की कई लोकेशन…और पढ़ें



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