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- दैनिक भास्कर राय नरेंद्र मोदी तीसरा कार्यकाल प्रधानमंत्री कैबिनेट
9 मिनट पहले
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भारत गठबंधन में लोगों ने इस बार भी विश्वास जताया, उन्होंने उनका सम्मान किया और बुधवार को बैठक करके घोषणा की कि हम सही समय का इंतजार करेंगे। इसका मतलब यह है कि यह ख़त्म हो रहा है कि फ़िहाल भारतीय गठबंधन विपक्ष में ही हटेगा। सरकार बनाने की कोई कोशिश नहीं करेंगे।
सही है, अपने भारतीय गठबंधन के पास को चारा नहीं था। नीतीश और चंद्रबाबू ने मारने से इनकार कर दिया है और इस तरह इन दोनों का पेशेंस ख़त्म होने की राह तकने के अलावा प्रेस के पास कोई चारा नहीं है। लेकिन वे विपक्ष में बैठकर स्पष्ट निर्णय भी घोषित नहीं करते तो कोई क्या कर लेता है! कम से कम फ़िहाल तो उन्होंने एक तरह की राजनीतिक ईमानदारी दिखा ही दी।
बहरहाल, तमाम शर्तें साफ होने के बाद आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पहली बार मिली-जुली सरकार बन रही है। केंद्र में यह उनकी तीसरी सरकार होगी लेकिन अभी तक वह पूर्ण बहुमत वाली सरकार ही बनेगी। निश्चित रूप से इस बार उनके सामने नई चुनौतियाँ जुड़ी हुई हैं, लेकिन जिस विश्वास के साथ वे आगे बढ़ रहे हैं, ऐसा लगता है मिली-जुली सरकार को भी भली-भाँति चलाएंगे। राजनीति में कब नरम होना और कब कठोर होना, यह वे अच्छी तरह जानते हैं।

एनडीए में शामिल सभी नेताओं ने भाजपा को समर्थन दे दिया है।
वैसे नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू की सभी मांगें इतनी आसान नहीं होंगी लेकिन कुछ कम पर इन दोनों को मनाना वे जानते हैं। नीतीश कुमार और उप राष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू पहले भी एनडीए सरकार में रह चुके हैं, इसलिए वे बड़े मंत्रालय तो मांगेंगे ही, उन मंत्रालयों में और किसी की दख़लंदाज़ी न हो, इस तरह की मांग भी रखी जा सकती है।
लगता है दख़लंदाज़ी न करते हुए भी निगरानी रखना प्रधानमंत्री को आता है। इधर भारत गठबंधन नीतीश और एम.डी.यू. को अपनी तरफ खींचने की कोशिश में लगा था, लेकिन देर शाम उसने इन दोनों को साफ़ कह दिया कि आओ तो दरवाज़ा खुला है और न आओ तो रास्ता खुला है।

भारत ब्लॉक में टीएमसी, आप, एनसीपी-एससी और सपा के बड़े नेता शामिल हैं।
उधर राष्ट्र ने तो शपथ ग्रहण की तारीख भी तय कर ली है और वह संभवतः आठ जून है। एक बार शपथ ग्रहण और मंत्रिमंडल का गठन हो जाने के बाद भारत गठबंधन के लिए कोई भी चुनौती वैसे भी नहीं रहेगी।
वैसे इस बार के चुनाव परिणाम कुछ अनोखे ही हैं। पहली बार ऐसा होता है कि चुनाव नतीजों से लेकर उसके प्रक्रिया में शामिल सभी पक्ष खुश होते हैं। दुखी होने का कारण किसी के पास नहीं है। भारत इसलिए खुश है क्योंकि उसे पूर्ण बहुमत मिल चुका है। कांग्रेस इसलिए खुश है क्योंकि वह पिछले बार से लगभग पूरे संसदीय दल पर जीत चुकी है।

चुनाव नतीजे आने के बाद 5 जून को मल्लिकार्जुन खडगे के दिल्ली वाले घर इंडिया ब्लॉक की झलक मिली।
समाजवादी पार्टी इसलिए खुश है क्योंकि उत्तर प्रदेश में उसने भारी सफलता पाई और कम से कम इस सबसे बड़े प्रदेश में भाजपा के विजय रथ को रोकने में कामयाब हो गई है। भारत गठबंधन में शामिल भाजपा, उद्धव ठाकरे और शरद पवार की पार्टी इसलिए खुश हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि चुनाव नतीजों से यह साबित हो गया है कि भाजपा और एनसीपीआइ ही हैं।
ममता बनर्जी इसलिए खुश हैं कि उन्होंने भाजपा को अपने प्रदेश में सबसे ऊंचे स्तर पर ला दिया। हालाँकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हार मान ली है कि जीते हम हैं लेकिन खुश दूसरी पार्टियाँ हो रही हैं! लेकिन सच ये है कि इस बार खुश होने के अपने-अपने कारण सबके पास हैं।
इस बार तो चुनाव आयोग भी खुश है क्योंकि किसी ने ई-मेल पर कोई सवाल नहीं उठाया। चुनाव परिणाम आने से पहले निश्चित रूप से आयोग की तरफ कुछ राजनीतिक दलों ने उँगली उठाई थी लेकिन परिणाम निश्चित होते ही सभी उँगलियाँ पीछे मोड़ ली गईं।
