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- कोरोनावाइरस टीका; कोवैक्सिन साइड इफेक्ट्स आईसीएमआर अनुसंधान रिपोर्ट विवाद
नई दिल्ली2 मिनट पहले
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भारत बायोटेक ने कोवैक्सिन बनाया है। देश में इसके 36 करोड़ डोज मौजूद हैं।
बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) के एक अध्ययन में सामने आया कि कोवैक्सिन के भी साइड इफेक्ट्स हैं। इसमें आईसीएमआर का हवाला दिया गया। अब भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने इस पर प्रतिक्रिया दी है और इसे गलत बताया है।
आईसीएमआर ने बीएचयू को एक नोटिस भेजा है। इसमें आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने लिखा है कि जिस अध्ययन में यह दावा किया गया है कि अध्ययन में वैक्सीन लेने वाले लोगों पर गंभीर दुष्प्रभाव देखे गए हैं, उन्होंने इसे पूरी तरह से रहस्यमय और गलत तथ्यों पर आधारित बताया है। आईसीएमएस सर्टिफिकेट से कोई लेना-देना नहीं है। आईसीटी मैस्टिक ने न तो इसके लिए कोई तकनीकी सहायता दी है और न ही कोई वित्तीय सहायता दी है। रिसर्च पेपर से आईसीएमआर का नाम हटा दिया जाए और एक माफ़ीनामा छाप दिया जाए।
अध्ययन में सांस का संक्रमण, रक्त क्लॉटिंग के मामले
16 मई को कोनाइक टाइम्स ने साइंस जर्नल स्प्रिंगर लिंक में प्रकाशित एक रिसर्च के हवाले से लिखा था कि भारत बायोटेक की कोरोना वैक्सीन- कोवैक्सिन के भी साइड इफेक्ट्स हैं।
शोध के अनुसार, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) में हाल ही में हुए अध्ययन के भाग में लगभग एक लोक में कोवैक्सिन के दुष्प्रभाव देखे गए।
इन लोगों में सांस संबंधी संक्रमण, रक्त का थक्का जमना और त्वचा से संबंधित संबद्धता का आकलन किया गया। वैक्सीन ने पाया कि टीनेजर्स, खास तौर पर किशोरों और किसी भी तरह की एलर्जी का सामना कर रहे लोगों को कोवैक्सिन से खतरा है।
हेल्थकेयर में देखें कोवैक्सिन से होने वाले किसके साइड इफेक्ट आए सामने…


इनमें से एक टाइटैनिक उन्हें भी खतरनाक बना देता है
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि स्टडी में पार्ट लेने वाले जिन टीनएजर्स और फिल्म को पहले से कोई एलर्जी नहीं थी और सब कुछ के बाद टाइ पार्टिमन ने उन्हें खतरनाक बना दिया था। वहीं, 0.1% सल्फेट में गुलियन बेरी सिंड्रोम (जीबीएस) की पहचान हुई।
गुलियन बेरी सिंड्रोम (जीबीएस) एक ऐसी बीमारी है जो लकवे की तरह ही शरीर के बड़े हिस्सों को धीरे-धीरे खत्म कर देती है। अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर (एनआईएनडीएस) के अनुसार, गुलियन बेरी सिंड्रोम (जीबीएस) एक रेयर न्यूरोलॉजिकल बीमारी है।
भारत बायोटेक ने कहा- कोवैक्सिन से किसी बीमारी का मामला सामने नहीं आया
कुछ दिन पहले कोवैक्सिन बनाने वाली कंपनी भारत बायोटेक ने कहा था कि उनकी बनाई गई वैक्सीन सुरक्षित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कोवैक्सिन की दो खुराकें मंगवाईं.
2 मई को कंपनी ने कहा था कि कोवैक्सिन की सुरक्षा का आकलन देश के स्वास्थ्य मंत्रालय ने किया था। कोवैक्सिन के निर्माण से लेकर अब तक इसकी आंशिक निगरानी की जा रही थी। कोवैक्सिन के ट्रायल से जुड़े सभी अध्ययनकर्ताओं और स्टूडेंट फॉलोअर्स एक्टिविटीज से कोवैक्सिन का बेहतरीन सिटकॉम रिकॉर्ड सामने आया है। अब तक कोवैक्सिन को लेकर ब्लड क्लॉटिंग, थ्रोम्बोसाइटोपिनिया, टीटीएस, वीआईटीटी, पेरीकार्डिकल्चर, मायोकार्डलिसिस जैसे किसी भी बीमारी का कोई मामला सामने नहीं आया है।
कंपनी ने कहा था कि अनुभवी इनोवेटर्स और उत्पाद निर्माता के तौर पर भारत बायोटेक की टीम ने कहा था कि कोरोना वैक्सीन का असर कुछ समय के लिए हो सकता है, पर मरीज की सुरक्षा पर असर जीवनभर रह सकता है। यही कारण है कि हमारी सभी वैक्सीन पर हमारा सबसे पहला फोकस रहता है।

कोविशील्ड को लेकर भी विवाद
कोवीशील्ड को लेकर विवाद चल रहा है कि इसके इस्तेमाल से कुछ केस में लोगों को थ्रोम्बोसिस थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम यानी टीटीएस हो सकता है। इस बीमारी से शरीर में खून के थक्के जम जाते हैं और प्लेट प्लेट की संख्या गिर जाती है। स्ट्रोक हार्ट और बीट थम्ने जैसे गंभीर खतरे हो सकते हैं।
असल में, भारत में सबसे पहली कोरोना वैक्सीन कोविशील्ड है। इसे पुणे की मस्जिद इंस्टीट्यूट ने बनाया है। कोवीशील्ड फॉर्मूला ब्रिटिश दवा कंपनी एस्ट्राजेनेका से लिया गया है। एस्ट्राजेनेका ने अब ब्रिटिश अदालत में माना कि उनके टीके के गंभीर दुष्प्रभाव हैं।
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जब ब्रिटेन में कोविड की वैक्सीन कोविशील्ड लॉन्च की गई तो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने इसे ‘ब्रिटिश विज्ञान की जीत’ बताया था। भारत में भी सबसे पहले और सबसे बड़ी इसी कोवीशील्ड की 175 करोड़ खुराकें अब तक जारी की जा चुकी हैं। इस वैक्सीन को लेकर अब बड़ा खुलासा हुआ है। कोवीशील्ड वैक्सीन बनाने वाली कंपनी एस्ट्राजेनेका ने यूके की अदालत में दिए गए बयान में माना है कि इस वैक्सीन से शरीर के किसी भी हिस्से में केमिकल युक्त ‘दुर्लभ दुष्प्रभाव’ हो सकते हैं। पढ़ें पूरी खबर…
