कोलकाता. पश्चिम बंगाल की राजनीति में जीरो और सिर्फ दो तीन जिलों तक सिमट गई कांग्रेस इस बार बड़ा दांव खेलने की तैयारी में है. पार्टी अपने कद्दावर नेता अधीर रंजन चौधरी को आगामी विधानसभा चुनाव में मैदान में उतारने की तैयारी में है. कांग्रेस ने अधीर रंजन चौधरी से विधानसभा चुनाव लड़ने को कहा है और पार्टी के निर्देश और स्थानीय जनता की मांग पर मुर्शिदाबाद जिले की बेहरामपुर सीट से अधीर रंजन चौधरी ने बंगाल चुनाव लड़ने का सकारात्मक सिग्नल दिया है. दरअसल कांग्रेस अपने पुराने गढ़ से बंगाल में जमीन तलाश रही है.
पिछले विधानसभा चुनाव 2021 में खाता तक न खोल पाने वाली कांग्रेस के लिए यह फैसला ‘करो या मरो’ जैसा माना जा रहा है. कभी मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों में मजबूत पकड़ रखने वाली कांग्रेस आज हाशिये पर खड़ी है. 2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ गठबंधन ने 2016 में 44 सीटें जीती थीं, जिनमें से 29 सीटें सिर्फ दो जिलों – मुर्शिदाबाद (18) और मालदा (11) – से आई थीं. इसके अलावा उत्तर दिनाजपुर, नदिया, बीरभूम और उत्तर बंगाल के कुछ हिस्सों में भी कांग्रेस का असर दिखा था.
लेकिन पांच साल बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई. बंगाल में 2021 चुनाव में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला. मुर्शिदाबाद और मालदा, जो कभी पार्टी का ‘कोर बेल्ट’ थे, वहां भी कांग्रेस पूरी तरह साफ हो गई. दोनों जिलों में टीएमसी ने जबरदस्त बढ़त बनाई, जबकि बीजेपी ने दूसरी ताकत के रूप में जगह बनाई. दोनों जिलों की 44 सीटों में से टीएमसी ने 28 और बीजेपी ने 6 सीटें जीती.
कौन हैं अधीर रंजन चौधरी!
* बंगाल से अधीर रंजन चौधरी कांग्रेस के जमीनी नेता माने जाते हैं.
* 1996 से 1999 के बीच अधीर रंजन चौधरी बंगाल विधानसभा में बतौर विधायक चुने गए.
* 1999 से 2024 तक वो मुर्शिदाबाद जिले की बहरामपुर लोकसभा सीट से लगातार 25 साल तक कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया.
* मनमोहन सिंह सरकार में 2012 से 2014 तक रेल राज्य मंत्री रहे.
* 2020 से 2024 तक पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष का जिम्मा संभाला.
* 2019 से 2024 तक लोकसभा में कांग्रेस के नेता रहे.
* 2024 के लोकसभा चुनाव में यूसुफ पठान से अधीर रंजन चौधरी हारे.
अब साल 2026 में कांग्रेस को अपने सबसे जमीनी नेता से कुछ आस जगी है.
कांग्रेस का मानना है कि अधीर रंजन चौधरी के चुनाव मैदान में उतरने से मुर्शिदाबाद, मालदा और नादिया जिले की करीब 50 सीटों पर गहरा प्रभाव पड़ेगा और कांग्रेस संगठन और कार्यकर्ता में भी जान आएगी. हालांकि, लेफ्ट कांग्रेस या कांग्रेस टीएमसी गठबंधन न होने से वोटों में बिखराव का असर बीजेपी को भी हो सकता है और इन जिलों में ममता बनर्जी की चुनौती भी बढ़ जाएगी. दरअसल, अल्पसंख्यक वोट बैंक का बड़ा हिस्सा ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC के साथ चला गया, जबकि कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन जमीनी स्तर पर असर नहीं छोड़ पाया.
ऐसे में अधीर रंजन चौधरी पर पार्टी की उम्मीदें टिकी हैं. मुर्शिदाबाद क्षेत्र में उनकी व्यक्तिगत पकड़ और संगठन पर पकड़ अब भी मजबूत मानी जाती है…कांग्रेस का आकलन है कि उनके चेहरे के सहारे पार्टी न सिर्फ अपने पुराने वोट बैंक में सेंध लगा सकती है, बल्कि कार्यकर्ताओं में भी नई ऊर्जा भर सकती है, हालांकि चुनौतियां कम नहीं हैं. TMC का मजबूत संगठन, BJP की बढ़ती पैठ और कांग्रेस की कमजोर जमीनी संरचना, ये सभी फैक्टर पार्टी के सामने बड़ी बाधा हैं.
फिलहाल इतना तय है कि बंगाल में कांग्रेस अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिए आखिरी बड़े चेहरे पर दांव लगाने जा रही है. अब यह दांव पार्टी को पुनर्जीवित करता है या फिर एक और निराशा की कहानी लिखता है, इसका फैसला आने वाले चुनाव के नतीजे बताएंगे.





