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BJP made Purvanchal-Bundelkhand Expressway a brand, but lost there | यूपी में भाजपा को ज्यादा नुकसान अपने ड्रीम प्रोजेक्ट पर: 22 में से 19 सीटें हारी, राम मंदिर के आसपास की 5 सीटें भी गंवाईं

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भाजपा ने जिस राम मंदिर और एक्सप्रेस-वे की लोकप्रियता को ब्रांडिंग की, वहीं की ज्यादातर गंदगी कर दी। मंदिर और एक्सप्रेस-वे के रूट में 22 संकरी सड़कें हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इनसे 17 मौतें हुईं। 2024 में भाजपा सिर्फ 3 सीट

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इन सेनाओं में फैजाबाद (अयोध्या) की सीट भी शामिल है, जहां राम मंदिर है। यहां मिली हार ने पूरे देश को चौंका दिया। आखिर ऐसा क्यों हुआ? आप यह सोच रहे हैं कि भाजपा को कैसे नुकसान हुआ।

फैजाबाद हारी, आस-पास की सिर्फ 2 सीटें भाजपा ने जीतीं

पहले अयोध्या के राम मंदिर की बात करते हैं। मंदिर फैजाबाद सीट में आता है। इसके आस-पास 8 लोकसभा सीटें हैं। यानी कुल 9 मौतें हैं। इनमें से 4 सीटें फैजाबाद, बस्ती, अंबेडकरनगर और सुल्तानपुर सपा ने जीत लीं। 3 फैसले रायबरेली, अमेठी और बाराबंकी कांग्रेस ने जीते।

भाजपा को 2 सीटें गोंडा और कैसरगंज मिली हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद, बाराबंकी, गोंडा, बस्ती और सुल्तानपुर में भाजपा ने 6 छक्के मारे थे। अंबेडकरनगर और रायपुरली कांग्रेस के पाले में गया था। निर्यातकों का कहना है कि इन रिश्तों पर जातिगत समीकरण और मौजूदा रिश्तों में निराशा का कारक चल रहा है।

पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे की 5 पानी भाजपा ने गंवाएं

पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे की बात करें तो लखनऊ से गाजीपुर के बीच कुल 9 संकरी सड़कें आती हैं। 2019 में इनमें से 6 भाजपा नेता और 3 नेता पास हुए। 2024 में इनमें से 6 सीटों फैजाबाद, सुल्तानपुर, अंबेडकरनगर, आजमगढ़, घोसी (मऊ) और गाजीपुर पर सपा ने जीत दर्ज की।

जबकि बाराबंकी और अमेठी कांग्रेस के खाते में गयी। सिर्फ लखनऊ सीट भाजपा बचाने में कामयाब रही। यहां भी रक्षामंत्री राजनाथ सिंह की जीत का मार्जिन 2019 की तुलना में 20% तक कम हो गया। विशेषज्ञों का कहना है कि इन सेनाओं में आजमगढ़ और गाजीपुर को छोड़कर बाकी सेनाओं पर ज्यादा मेहनत नहीं की गई है। इसलिए नुकसान उठाना पड़ा।

बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे जिन संकेतों से गुजरती है, वो सभी भाजपा ने गंवाई

बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे 7 गांवों की 4 दर्जन से अधिक ट्रेनें चलती हैं। 2019 में इटावा, जालौन, हमीरपुर और बांदा पर भाजपा का कब्जा था, लेकिन 2024 में इन सभी 4 सीटों पर सपा को जीत मिली। ये वही कांग्रेसी विचारधाराएं हैं, जहां इस बार चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने एक्सप्रेस-वे और विकास की खूब चर्चा की। एक्सपोर्ट्स के मुताबिक, मौजूदा प्रतिनिधियों से दुख का कारक हावी होने से भाजपा को नुकसान में रही।

अगर चुनाव में विकास फैक्टर नहीं चला, तो कौन से फैक्टर प्रभावी रहे, ये समझते हैं…

  • जातिवाद
  • ध्रुवीकरण का न होगा
  • परिस्थितियों से छुटकारा

सुल्तानपुर में ठाकुर बिरादरी की बुराइयों का नुकसान
भाजपा की सुरक्षित सीट पर 80% हिंदू आबादी है। यहां मेनका गांधी को ठाकुर बिरादरी की नाराजगी से नुकसान हुआ। 22% वोटर जाति के ज्यादातर लोग छिटक गए। क्योंकि सपा ने राम भुआल निषाद को कैंडिडेट बनाया था। मेनका गांधी को यहां 38% वोट मिले। वो चुनाव हार गईं।

बाराबंकी में भाजपा को पिछड़ों का वोट नहीं मिला
आरक्षित सीट पर 55% वोटर हैं। इसमें 13% रावत बिरादरी है। यहां कांग्रेस के तनुज पुनिया चुनाव जीते हैं। उन्हें मुस्लिम-यादव और पेपर वोटर का समर्थन मिला। भाजपा की राजरानी रावत को अपनी बिरादरी के साथ कुछ पिछड़ा वर्ग का समर्थन मिला। मगर वो चुनाव हार गईं।

अमेठी में दबंगों की राजनीति हावी रही
गांधी परिवार के गढ़ में 34% ओबीसी वोटर हैं। इसके बाद सबसे ज्यादा 26% वृद्धि हुई है। मुस्लिम 20% हैं। कांग्रेस और सपा गठबंधन की वजह से पूरा मुस्लिम वोट कांग्रेस के किशोर लाल शर्मा को मिला। संविधान बचाओ वाले दावे के असर से ज्यादातर पिछड़ा-दलित वोट भी इंडी को मिला।

फैजाबाद में भाजपा के मौजूदा सांसदों से नाराजगी
यहां जातिगत समीकरण में 21% दलित और 12% मुस्लिम हैं। सवर्ण मतदाता 18-18% ठाकुर और ब्राह्मण हैं। साथ ही पिछड़ा वर्ग की भागीदारी 22% है। यहां सपा ने सोना कार्ड खेला। अवधेश प्रसाद को कैंडिडेट बनाया गया। भाजपा के सांसद लल्लू सिंह से लोगों की नाराजगी भी थी। भारत के मुस्लिम-यादव-दलित गठबंधन के सामने हार गए।

अंबेडकरनगर में सपा को मुस्लिम-पिछड़ा और दलितों का समर्थन मिला
आइये रितेश पांडे को भाजपा ने चुनाव लड़वाया था। 2.35 लाख ब्राह्मण-ठाकुर वोटर का समर्थन तो मिला। मगर सपा मुस्लिम-पिछड़ा और दलित वोटर को अपनी तरफ करने में कामयाब रही। यहां 4 लाख वोटर हैं। 3.70 लाख मुस्लिम वोटर हैं। 1.70 लाख यादव और 1.78 कुर्मी वोटर हैं।

राम मंदिर और एक्सप्रेस-वे भाषणों में छाया रहा…

आजमगढ़ में ध्रुवीकरण नहीं हुआ, सपा ने किया हमला
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रिपब्लिकन की पारंपरिक सीट पर मुस्लिम वोट का ध्रुवीकरण नहीं हुआ। मुस्लिम-यादव वोटर ने मिलकर धर्मेंद्र यादव को जीता दिया। भाजपा के दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ को यादव ने वोट नहीं दिया। परिणाम उन्हें चुनाव में 1.61 लाख वोट से हार का मुंह देखना पड़ा। 2022 में हुए लोकसभा चुनाव में निरहुआ सिर्फ 8 हजार वोट से जीते थे।

मौ (घोसी) में जातिगत समीकरण हावी रहे
सपा के राजीव राय 1.62 लाख के बड़े अंतर से चुनाव जीते। कारण जातिगत समीकरण थे। सपा को 3.50 लाख मुस्लिम, 2.50 लाख यादव का समर्थन मिला। 5 लाख वर्ड का भी ज्यादातर वोट मिला। वहीं भाजपा के घटक दल सुभासपा के अरविंद राजभर को 1-1 लाख वैश्य, मौर्य, राजपूत, ब्राह्मण का वोट मिला। राजभर बिरादरी का 2 लाख और कुछ चौहान बिरादरी का समर्थन मिला। मगर वो हार गए।

गाजीपुर में अफजाल ही प्रभावित, पीडीए फैक्टर चला
यहां भाजपा के पारसनाथ राय के सामने सपा के अफजाल सामने आए। यहां स्पैम का पीडीए खूब चला। रिकॉर्ड-पिछड़ा का समर्थन स्पैम को मिला। मुस्लिम और यादव पहले से ही सपा के समर्थन में थे। यही वजह है कि भाजपा के पारसनाथ शर्मा को 1.24 लाख वोट से हार मिली।

इटावा में ध्रुवीकरण नहीं हुआ
ये सपा की पारंपरिक सीट रही है। दिव्या सिंह को INDI. गठबंधन का फायदा मिला। मुस्लिम पत्रिकाओं का ध्रुवीकरण नहीं हुआ। साथ ही, संविधान वाले बयान के बाद 4.5 करोड़ मतदाता में ज्यादातर ने सपा को चुना। यही वजह है कि भाजपा के हाथ यह सीट खिसक गई।

जालौन में पुरानी भाजपा सांसद से नाराजगी
बुंदेलखंड की सीट पर सपा को सबसे ज्यादा पिछड़ा और कट्टरपंथी वर्ग का समर्थन मिला। इस सीट पर मुस्लिम सिर्फ 90 हजार और यादव 50 हजार हैं। सपा को कोर वोटर का समर्थन नहीं था। लेकिन फिर भी सपा उम्मीदवार 50 हजार के वोट मार्जिन से जीत गया, लोगों ने मौजूदा सांसद भानु प्रताप को नकार दिया।

हमीरपुर में जातिवाद का बोलबाला
यूपी में हमीरपुर सीट पर सपा को सबसे छोटी जीत मिली है। सपा ने यहां अर्जुन सिंह लोधी को टिकट दिया था। मुकाबले में भाजपा के कुंवर पुष्पेन्द्र सिंह चंदेल थे। यहां राजपूत, मल्लाह, ब्राह्मण वोट भाजपा को ही मिला। मगर 3 लाख दलित वोट, 1 लाख मुस्लिम और यादव वोट सपा को मिला। यही वजह है कि भाजपा को नुकसान पहुंचाया गया है।

बांदा में भाजपा सांसदों से नाराज थे लोग
10 साल की कब्जे वाली सीट भी भाजपा हार गई। यहां जातिगत समीकरण में भाजपा और सपा में कांटे की टक्कर थी। यहां भाजपा को मौजूदा सांसद आरके सिंह पटेल को टिकट देने का नुकसान हुआ। जनता उनसे नाराज थी। 2024 के चुनाव में लोगों ने बदलाव के लिए वोट किया।

पॉलिटिकल एक्सपोर्ट्स

एक्सपोर्ट्स बोले- 2017 में अखिलेश के विकास भी लोगों ने नकारे थे

पॉलिटिकल एक्सपोर्ट्स नवल कांत सिन्हा कहते हैं- यूपी के 2017 के विधानसभा चुनाव में देखिए, अखिलेश ने चुनाव से पहले गोमती रिवर फ्रंट, मेट्रो और जनेश्वर मिश्रा पार्क तैयार करवाए थे। पोस्टर लगवाए थे विकास पुरुषों के। मगर लोगों ने विकास को सिरमौर धर्म के आधार पर वोट दिया। अखिलेश चुनाव हार गए थे। इस चुनाव में भाजपा कार्यकर्ताओं का विरोध हुआ था। लोग बोल रहे थे कि दो बार जिन्हें जीताया, उन्हें तीसरी बार नहीं मिलेगा। इस तरह भाजपा को नुकसान पहुंचाया गया।



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