23 मिनट पहले
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चुनाव घोषणा होने से पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार प्रचार के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे थे। बिना लाइन। बिना थके। उद्देश्य यही रहा होगा कि पहली दो पीढ़ियों की तरह तीसरी बार भी मजबूत सरकार आए ताकि जो देश हित के काम सोचे, वे निरंतर रूप से होते जाएं। लेकिन लगता है अब कुछ अलग ही होगा। जो मेहनत प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचार के दौरान की, अब पूरे पांच साल करनी होगी।
गठबंधन सरकार में अक्सर ऐसा ही होता है। कभी किसी सहयोगी दल को कोई आपत्ति होगी। कभी किसी सहयोगी की कोई और समस्या होगी। सभी पक्षों की एक-एक आपत्तियाँ, समस्याएँ हल करते हुए चलना होगा। हालांकि इस बार प्रधानमंत्री को गठबंधन सरकार चलाने में सहूलियत ही होगी क्योंकि उनके दो बड़े सहयोगी चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार हैं।

ये दोनों ही अपने-अपने राज्यों के मुख्यमंत्री हैं। निश्चित तौर पर वे अपने राज्यों की सहूलियत और विकास कार्यों के लिए बहुत हद तक केंद्र सरकार पर निर्भर रहेंगे। केंद्र द्वारा यह मदद राज्य सरकार को दी जाती रहेगी तो चीजें आसानी से चलती रहेंगी।
नीतीश कुमार के राज्य बिहार में तो अगले साल विधानसभा चुनाव भी होंगे। चुनाव पूर्व नीतीश अपने राज्य में विकास की नई योजनाएं लाकर जनता हितैषी सरकार की छवि बनाने की कोशिश करेंगे। इसके लिए कदम-कदम पर उन्हें प्रधानमंत्री के सहयोग की जरूरत रहेगी। इसलिए किसी के पलटी मारने की घटना किसी कारण नजर नहीं आती। सरकार चलती रहेगी।

फिर उन मुद्दों का क्या होगा, जो भाजपा सरकार अपने तीसरे कार्यकाल के लिए पहले से ही तय कर रखे थे? निश्चित ही वे सब काम उस गति से तो नहीं ही चलेंगे जो भाजपा सरकार ने सोचा था। कुछ कामों में देर होगी, कुछ को हो सकता है समय का तकाज़ा मानकर भी रुके पड़े। लेकिन इतना तय है कि लोक कल्याण के काम होते रहेंगे और उनमें कोई अड़चन नहीं आएगी।
भविष्य में, नरेंद्र मोदी को एनडीए संसदीय दल का नेता चुन लिया गया है और उन्होंने अपने सहयोगी दलों के साथ राष्ट्रपति भवन जाकर सरकार बनाने का दावा भी किया है। संभवतया नौ जून को वे पूरे मंत्रिमंडल के साथ शपथ लेंगे। तब तक हम के गठन और उसमें अपनी भूमिकाओं की सहयोगी व्यक्तियों की भी मांग को भी सुलझाया जाएगा। बहुत हद तक पनीर तय हो ही चुका है।
