कोई सनकी ब्रिगेडियर शुरू कर सकता है परमाणु युद्ध! क्या है पाकिस्तान का ‘इनसाइडर थ्रेट’? पूर्व NSA ने किया आगाह


नई दिल्ली: श्रीलंका, चीन और पाकिस्तान में भारत के राजदूत रह चुके शिवशंकर मेनन का मानना है कि पाकिस्तान में ‘इनसाइडर थ्रेट’ यानी भीतर से पैदा होने वाला खतरा बहुत बड़ा है. दुनिया के अन्य परमाणु संपन्न देशों के विपरीत, पाकिस्तान में यह पूरा प्रोग्राम किसी चुनी हुई नागरिक सरकार के बजाय सीधे तौर पर सेना के नियंत्रण में है. मेनन के मुताबिक, जैसे-जैसे वहां समाज और संस्थाओं में कट्टरपंथ बढ़ रहा है, यह डर वास्तविक होता जा रहा है कि कोई रेडिकलाइज्ड ब्रिगेडियर या पायलट अपने स्तर पर आत्मघाती फैसला ले सकता है. मेनन पूर्व विदेश सचिव हैं और देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) भी रहे हैं. रेडिफ को दिए इंटरव्यू में मेनन ने भारत की न्यूक्लियर नीति को संतुलित बताया और कहा कि भारत इन हथियारों को केवल डिटरेंस के रूप में देखता है, न कि युद्ध के साधन के रूप में.

क्यों खतरनाक है पाकिस्तान की ‘टैक्टिकल’ परमाणु रणनीति?

मेनन ने पाकिस्तान के छोटे यानी टैक्टिकल परमाणु हथियारों (Tactical Nuclear Weapons) को बेहद अस्थिर करने वाला बताया है. आमतौर पर परमाणु हथियारों का कंट्रोल देश के सर्वोच्च नेता के पास होता है, लेकिन टैक्टिकल हथियारों के मामले में कमांड को निचले स्तर के अधिकारियों को सौंपना पड़ता है.

भारत और पाकिस्तान के बीच दूरी इतनी कम है कि चेतावनी का समय न के बराबर मिलता है. ऐसी स्थिति में अगर कमांड निचले स्तर पर गई, तो गलती या गलतफहमी की गुंजाइश बढ़ जाती है.

मेनन का कहना है कि भारत की परमाणु पनडुब्बियों के मामले में भी तकनीकी चुनौतियां हैं, लेकिन भारत ने इसके लिए कड़े प्रोटोकॉल और तकनीकी ‘फिक्सेस’ तैयार किए हैं ताकि कोई भी फैसला बिना सेंट्रल कमांड के न हो सके.

‘नो फर्स्ट यूज’ पॉलिसी: कमजोरी या समझदारी?

भारत और चीन दुनिया के ऐसे दो देश हैं जिन्होंने ‘नो फर्स्ट यूज’ (NFU) यानी पहले हमला न करने की नीति घोषित की है. मेनन ने इस नीति का पुरजोर समर्थन किया है. उनके अनुसार, भारत के परमाणु हथियार किसी देश को डराने या पारंपरिक युद्ध में अपनी कमजोरी छिपाने के लिए नहीं हैं.

इनका एकमात्र मकसद परमाणु ब्लैकमेल को रोकना और यह सुनिश्चित करना है कि कोई दूसरा देश भारत पर परमाणु हमला करने की हिम्मत न करे.

मेनन ने स्पष्ट किया कि 1971 के युद्ध के दौरान जब अमेरिका ने ‘यूएसएस एंटरप्राइज’ भेजकर भारत को परमाणु धमकी दी थी, तब से भारत ने अपनी सुरक्षा के लिए यह रास्ता चुना. अगर हम इस नीति को बदलते हैं, तो हमें अपने हथियारों की पूरी संरचना और तैनाती का तरीका भी बदलना होगा, जिसकी फिलहाल जरूरत नहीं है.





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