आज की दुनिया में जब हम 21वीं सदी की बात करते हैं, तो अक्सर लोकतंत्र, बराबरी और मानवाधिकारों की बड़ी-बड़ी बातें सुनाई देती हैं. हमें लगता है कि दुनिया आगे बढ़ चुकी है, वो पुराने राजा-महाराजाओं और गुलामी वाले दौर पीछे छूट गए हैं. लेकिन क्या वाकई ऐसा है? हाल के दिनों में दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क अमेरिका से जो आवाजें आ रही हैं, वे किसी डरावने सपने जैसी हैं. दावोस से लेकर म्यूनिख तक, अमेरिकी नेता जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, उसने पूरी दुनिया के जानकारों और आम जनता की रातों की नींद उड़ा दी है.
सामरिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने एक ऐसी बात कह दी है जो सोचने पर मजबूर कर देती है. चेलानी का मानना है कि अमेरिका अब तरक्की के रास्ते पर नहीं, बल्कि उल्टा ‘गुलामी के दिनों’ की ओर लौट रहा है. उन्होंने इसके पीछे जो संकेत दिए हैं, वे डराने वाले हैं.
जब ‘साम्राज्य विस्तार’ फिर से गर्व की बात बन गया
ट्रंप ने यहां तक कह दिया कि पुराने समय में यूरोपीय साम्राज्यों ने जो दुनिया भर में विशाल जमीनें कब्जाईं और संपत्ति बटोरी, उसमें कुछ भी गलत नहीं था. यह सिर्फ एक चलता-फिरता बयान नहीं था, बल्कि एक ऐसी सोच का प्रदर्शन था जो मानती है कि ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’.
जब रूबियो ने अफसोस जताया
रही-सही कसर मार्को रूबियो ने म्यूनिख में पूरी कर दी. उन्होंने तो खुलेआम उन गोरे उपनिवेशवादियों की तारीफों के पुल बांध दिए जिन्होंने नए महाद्वीप बसाए और दुनिया भर में विशाल साम्राज्य खड़े किए. सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि रूबियो ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद इन साम्राज्यों के खत्म होने पर अफसोस जताया. यानी जो आजादी भारत जैसे दर्जनों देशों के लिए सबसे बड़ा जश्न थी, उसे अमेरिका का नेतृत्व एक ‘नुकसान’ के तौर पर देख रहा है.
ये शब्द नहीं, बारूद की आहट हैं
जरा सोचिए, आज के दौर में क्या कोई मुल्क दूसरे मुल्क की जमीन खरीदने या कब्जाने की बात कर सकता है? लेकिन अमेरिका अब ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की बात करता है, पनामा नहर पर अपना हक जमाना चाहता है और वेनेजुएला जैसे देशों में सीधे सैन्य दखल की धमकी देता है. यह सब कुछ वैसा ही लग रहा है जैसा 19वीं सदी में राजा-महाराजा या साम्राज्यवादी ताकतें किया करती थीं. ऐसा लगता है जैसे अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता जैसी चीजें अब केवल किताबों तक सीमित रह गई हैं.
सॉफ्ट पावर का सूर्यास्त
अमेरिका की असली ताकत कभी भी केवल उसकी खतरनाक मिसाइलें या उसकी बड़ी तिजोरी नहीं रही. उसकी असली ताकत थी उसकी ‘सॉफ्ट पावर’. यानी उसकी संस्कृति, उसके नैतिक मूल्य और उसकी वो छवि कि वह दुनिया का ‘बड़े भाई’ की तरह ख्याल रखेगा. इसी साख के भरोसे दुनिया भर के देश अमेरिका के पीछे आंख मूंदकर खड़े हो जाते थे. लोग अमेरिका जाने का सपना देखते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि वहां सबके साथ बराबर का व्यवहार होता है.
लेकिन अब वो साख मिट्टी में मिल रही है. ब्रह्मा चेलानी का इशारा साफ है… जब ट्रंप नस्लीय राजनीति को हवा देते हैं या प्रवासियों के खिलाफ नफरत भरे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, तो इसका असर केवल अमेरिका के अंदर नहीं होता. एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के उन देशों में, जिन्होंने सदियों तक गोरे साहबों की गुलामी झेली है, वहां एक बहुत बुरा संदेश जाता है. उन्हें लगता है कि अमेरिका का ‘लोकतंत्र’ और ‘समानता’ का ढोल महज एक छलावा था. अमेरिका का यह नया ‘साम्राज्य प्रेम’ उन देशों के पुराने जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है.
असुरक्षा से उपजा ताकत का दिखावा
आज दुनिया देख रही है कि अमेरिका खुद को एक लीडर के बजाय एक कब्जा करने वाला दिखाने की कोशिश कर रहा है.वेनेजुएला के राष्ट्रपति को पकड़ने की कोशिश हो, क्यूबा की ऐसी घेराबंदी करना कि वहां मानवीय संकट खड़ा हो जाए, या किसी दूसरे देश के बड़े नेता की सरेआम हत्या कर देना… ये तमाम हरकतें अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाने जैसी हैं. जब कोई बड़ी ताकत अपनी साख खोने लगती है, तभी वह डर दिखाने और पुराने साम्राज्यों की दुहाई देने पर उतरती है. यह उसकी ताकत की बहाली नहीं, बल्कि उसके अंदर छिपी असुरक्षा का प्रमाण है.
सिर्फ अपने फायदे का गुलाम
चीन और रूस जैसे देश अब खुलकर अमेरिका को ‘पाखंडी’ कह रहे हैं. दुनिया के दूसरे देश, जो कभी अमेरिका के पक्के यार थे, अब डर के मारे या सावधानी के तौर पर उससे किनारा करने लगे हैं. उन्हें समझ आ गया है कि अमेरिका अब किसी का दोस्त नहीं, बल्कि सिर्फ अपने फायदे का गुलाम है.





