दरअसल, 2024 लोकसभा चुनाव के नतीजों से अखिलेश यादव को पक्का हो गया है कि पीडीए (पिछड़ा, दलित और माइनॉरिटी) का उनका सामाजिक समीकरण यूपी विधानसभा चुनाव में भी सियासी हवा का रुख मोड़ सकता है। अखिलेश यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि प्रतिनिधित्व की बात आएगी, तो वह पिछड़ों-दलितों में महिलाओं को मौका देने में पीछे नहीं हटेंगे।
29 मार्च को गौतमबुद्धनगर के दादरी में हुई समाजवादी समानता भाईचारा रैली से यूपी चुनाव अभियान की शुरुआत करते हुए भी अखिलेश ने कहा कि ‘पीड़ा ही वह धागा है, जो पीडीए के लोगों को एक सूत्र में बांधता है। एक तरफ अहंकारी लोग हैं, जो उपेक्षा और उत्पीड़न करते हैं और दूसरी ओर उत्पीड़ित और उपेक्षित लोग हैं। ऐसे कमजोर और गरीब लोग हर जात-धर्म में होते हैं। जिसने अत्याचार, भेदभाव और उत्पीड़न की पीड़ा नहीं झेली है, वे हमदर्दी तो दिखा सकते हैं लेकिन उस दर्द को महसूस नहीं कर सकते, जो हमारे घर को गंगाजल से धुलवाने पर हमको हुआ था, या मंदिर धुलवाने पर जो हमने महसूस किया था।’





